कैंसर पीड़ितों को मन को मजबूत रखना चाहिए। किसी ने सच ही कहा है कि आत्मविश्वास व मनोबल से व्यक्ति कोई भी असंभव कार्य शीघ्रता से कर सकता है। भारत देश में कैंसर नाम सुनकर सिर्फ मौत ही सामने नजर आती है, परंतु ऐसा नहीं है क्योंकि अमेरिका इत्यादि देशों में यह बीमारी आम लोगों में पायी जाती है लेकिन वे इससे भयभीत नहीं होते हैं परिणामस्वरुप वहां कैंसर पीड़ित अधिकांश व्यक्ति ठीक होते हुए पाए गए हैं अतः जरुरत है सिर्फ आत्मविश्वास बढ़ाने व मनोबल ऊंचा रखने की। यदि शीघ्रतातिशीघ्र रोग का निदान हो, योग्य समय पर उचित चिकित्सा शुरु की जाए और रोगी का मनोबल दृढ़ हो तो कैंसर जैसी महाभयंकर व्याधि से भी मुक्ति पाई जा सकती है।

आधुनिक युग में मनुष्य के आहार-विहार में द्रुत गति से परिवर्तन आया है। प्राचीन काल में हम स्वस्थ व प्राकृतिक जीवन जीते थे पर आज हम कृत्रिम जिंदगी जी रहे हैं। आज हमारे आहार में भी कृत्रिमता आ गई है। फ्लेवर वाला आहार हमारे भोजन का अभिन्न अंग बन गया है। ऐसे आहार से ही कैंसर लोगों को अधिकाधिक आक्रान्त कर रहा है क्यों कि आधुनिक युग की देन कृत्रिम खाद्यान्न कैंसर के कारण जैसे डिब्बा बंद पदार्थ, कोला ड्रिंक्स, तम्बाकू, शराब, मिठाई इनमें मिलाए जानेवाल रंग, चीनी, मैदा आदि का अधिकाधिक सेवन हो रहा है।

आज प्रचलित रोगों में कैंसर सबसे अधिक भयावह रोग माना जाता है। जिस किसी रोगी को यह पता चल जाए कि उसे कैंसर हो गया है, उसकी मृत्यु कैंसर से भले न हो किंतु कैंसर हुआ है यह सुनकर जो मानसिक तनाव व अवसाद निर्माण होता है उससे रोगी और परिवारजन विचलित हो जाते है। रोगी का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता रहता है, रोगी को तो जैसे हर समय आँखों के आगे अपनी मृत्यु ही नजर आती है, कैंसर का नाम सुनकर ही उसकी सॉसें रुक जाती है, जिंदगी थम सी जाती है।

कैंसर रुग्ण को मौत के डर का मुख्य कारण यह भी है कि आजकल फिल्मों व कहानियों में अधिकतर यही बताया जाता है कि कैंसर पीड़ितों की मृत्यु हो जाती है जिससे लोगों के दिमाग में यह बात बैठ चुकी है कि कैंसर होने पर मौत अटल है परंतु ऐसा नहीं है। शायद इसलिए कैंसर पीड़ितों में दवाइयां भी असर नहीं करती हैं क्योंकि यह कहा गया है कि मन ठीक नहीं रहा तो खाना भी शरीर को नहीं लगता है अतः कैंसर पीड़ितों को मन को मजबूत रखना चाहिए।

कैंसर क्या है ?

संपूर्ण मानव शरीर की रचना असंख्य कोशिकाओं (Cells) से हुई है। शरीर में प्रत्येक कोशिका अपना स्थान, नियत कार्य, निश्चित संख्या व आयुमर्यादा होती है। एक निश्चित समय के बाद हर एक कोशिका के स्थान पर दूसरी नई कोशिका आ जाती है इस प्रकार का स्थित्यंतर शरीर में अविराम रुप से चलता रहता है किंतु किसी अंग विशेष में सामान्य मात्रा से अधिक कोशिकाओं की वृद्धि हो जाती है और कोशिकाओं की संख्या में हुई इस अनियंत्रित वृद्धि को ही ‘कैंसर कहा जाता है, यह कैंसर कोशिकाएं बाद में अपने मूल स्थान से रक्त या लसिका द्वारा शरीर के अन्य भागों में भी पहुंचती हैं, परिणामस्वरूप उस जगह पर भी संख्या वृद्धि करती हैं इसे ही विक्षेप (मेटास्टेटिस) कहते हैं।

कैंसर शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है। भारत में पुरुषों में अधिकतर मुख, गले, फेफड़े व शिश्न का कैंसर तथा स्त्रियों में स्तन कैंसर व गर्भाशयग्रीवा का कैंसर प्रमुख रूप से होते हैं। इसके अलावा ऑतों, आमाशय, रक्त, मूत्राशय व मस्तिष्क का कैंसर भी होता हैं।

कैंसर शब्द ग्रीक भाषा के कन व सर शब्द के संयोग से बना है। ग्रीक भाषा में कन का अर्थ होता है केकड़ा और सर का अभिप्राय है जड़। जिस प्रकार केकड़े के शरीर के चारों ओर जड़ों जैसे पैर फैले रहते हैं वैसे ही कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं के चारों ओर उसका तंतु अथवा स्नायु जाल फैला रहता है अतः इसे महामूल भी कहा गया है इन तंतुओं द्वारा ही कोषाणुओं के विघटित सूक्ष्मांश एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

सुश्रुत ने कैंसर के छः प्रकार वातज, पित्तज, कफज, रक्तज, मांसज व मेदज बताए हैं। दूषित वातादि दोष मांस व रक्तधातु को दुषित करके शरीर के किसी भी भाग या अंग में गोलाकृति, स्थिर (अचल), अल्प पीड़ा से युक्त, गंभीर धातुओं में फैला हुआ, चिरकाल में बढ़ने वाला और मांस के जमाव से युक्त, वृद्धि को प्राप्त होकर गंभीर शोफ (सूजन) पैदा करते हैं। आयुर्वेद शास्त्र में विद्वान इसको ‘अर्बुद’ या ‘कर्कटार्बुद’ कहते हैं।

कारण : भारत में कैंसर का सबसे प्रमुख कारण तंबाकू सेवन है। धूम्रपान मंद किंतु घातक विष कहा गया है, विशेषतया मुख, ग्रीवा, फेफड़े आदि के कैंसर में तंबाकु सेवन ही मुख्य कारण है। प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि सभी प्रकार के कैंसर में 41% आहार असंतुलनजन्य होते हैं, जिसमें कम रेशेदार, अधिक वसा व प्रोटीनयुक्त आहार का सेवन भी पाचनतंत्र के कैंसर का प्रमुख कारण होता है। कृत्रिम खाद्यसामग्री, कैलोरी रहित संश्लेषित, डिब्बे में बंद पदार्थ एवं रंग, गंध, स्वादयुक्त विभिन्न रसायन मिश्रित खाद्यान्न के सेवन से भी कैंसर होने की संभावना बनी रहती है। रेडियम संपर्क से, प्रचण्ड सूर्य ताप, गोरी त्वचा के लोगों व कलकारखानों में काम करनेवाले कर्मचारियों को कैंसर होने की संभावना अधिक रहती है।
कैंसर के 10 फीसदी से कुछ ज्यादा मामलों की वजह वजन का ज्यादा होना है।
* आनुवांशिक : (5-10%)
* रोग प्रतिकारक शक्ति की कमी – यदि किसी प्रकार की रोग प्रतिरोधक शक्ति की कमी होंगी तो, उदा. एचआईवी, शरीर के अवयव प्रत्यारोपण होने पर, इन लोगों में रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती है। इन लोगों को लिम्फोमा, गर्भाशय और गुद्दा के कैंसर होने की आशंका रहती है।
* नैसर्गिक कारण – सूर्य किरण
* प्रदूषण – औद्योगिक रसायन, फेफड़े का कैंसर
* जीवन प्रणाली की वजह से होने वाला कैंसर (मोटापा, Food Habit), स्तन, गर्भाशय, आंत का कैंसर

लक्षण: अमेरीकन कैंसर सोसायटी द्वारा निर्धारित कैंसर के निम्न लक्षणों के प्रकट होते ही व्यक्ति को उनकी ओर दुर्लक्ष्य नहीं करना चाहिए। यदि निम्नोक्त कोई भी लक्षण अधिक समय तक बना रहे तो उसके लिए आवश्यक जांच अवश्य
करवाना चाहिए –
1) कोई भी व्रण (घाव) या फुंसी का बहुत अधिक दिनों तक बना रहना, फिर चाहे उसमें वेदना हो या नहीं।
2) शरीर के किसी भाग में बहुत दिनों तक किसी गांठ का एक जैसा बना रहना।
3) किसी घाव (व्रण) का तिल या मस्से के रुप में परिवर्तित होना।
4) मुख, गुदमार्ग, मूत्रमार्ग, नासा आदि मार्गों से असाधारण रक्तस्राव का होना।
5) अपचन, गुल्मयुक्त अस्थायी मलबद्धता। खाना या पानी निगलने में कठिनाई, भोजन ठीक से न पचना, उल्टी में खून का दिखना।
6) हमेशा ही खांसी बलगम होना या गला बैठना, थूक निगलने में गले में कष्ट होना, आवाज बदलना।
7) मलविसर्जन की आदतों में अस्वाभाविक परिवर्तन अथवा अधिक अतिसार होना।
8) बिना किसी कारण के शरीर का वजन घट जाना, भूख न लगना, बहुत थकान महसूस होना, बुखार रहना।
अगर आपको इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे आप तुरंत डॉक्टर की मदद लें।

विभिन्न अंगों में होने वाला कैंसर

स्तन कैंसर
महिलाओं में प्रायः रजस्राव होने के बाद 40-50 वर्ष की आयु में स्तन कैंसर होने की अधिक संभावना रहती है। मातृत्वहीन (Nullipara) व जिन्होंने बालक को स्तनपान न कराया हो, उन्हें स्तन कैंसर होने की संभावना अधिक रहती है। डिंबग्रंथि (ओवरी) से उत्सर्जित हार्मोन्स भी इस रोग को उत्पन्न कर सकते हैं।

सर्वप्रथम स्तन में छोटी, अचल गांठ आती है, प्रायः प्रारंग में वेदना नहीं होती किंतु बाद में कभी-कभी पीड़ा हो भी सकती है। प्रारंभ में बगल की रसग्रंथियां (गिल्टियां) नहीं बढ़ती किंतु कुछ दिनों बाद बगल की रस ग्रंथियां फूल जाती हैं। चुचुक से स्राव भी होता है। जिस ओर के स्तन में कैंसर की गांठ होती है, उस ओर का चुचुक ऊपर की ओर उठा हुआ दिखाई देता है। चुचुक के चारों ओर का स्तनमंडल भी प्रायः पूर्व की अपेक्षा छोटा दिखाई देता है व स्तन मंडल की त्वचा नारंगी रंग के छिलके की भांति अनियमित उबड़‌खाबड़ व स्पर्श में कठोर हो जाती है।

गर्भाशय का कैंसर
छोटी उम्र में विवाह, अधिक प्रसव, संसर्गजन्य रोग, रजस्राव के समय मैले-अस्वच्छ वस्त्रों का प्रयोग, प्रसव के दौरान गर्भाशय ग्रीवा में यदि किसी तरह का व्रण हो गया हो और वह ठीक होने से पहले ही यदि पुनः गर्भधारणा हो जाए तो ऐसी महिलाओं को 40 वर्ष की आयु के बाद गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर होने की संभावना होती है।

रजोनिवृत्ति के बाद मासिक स्राव बंद होने के पश्चात पुनः योनि से रक्तस्राव होने लगता है साथ ही गंभीर अवस्था में पूय स्राव भी बहता है और स्राव से दुर्गंध आने लगती है, पैरों व कमर में भी निरंतर वेदना बनी रहती है।

रक्त कैंसर (ल्यूकेमिआ)
एक्सरे और विकिरण प्रणाली से किरणें यदि शरीर के अंदर गहन प्रवेश कर जाए तो अस्थिमज्जा (Bone marrow) को प्रभावित करती है, जिससे उसके अंदर रक्त के कोषाणु भी प्रभावित होते हैं। मुख से रक्तस्राव, जोड़ों व पसलियों में वेदना, ज्वर का निरंतर बहुत दिनों तक बने रहना, आतों के स्वाभाविक कार्यों में फेरबदल होना (मलबद्धता अथवा अतिसार होना), प्लीहा व लसिका ग्रंथियों के आकार में वृद्धि होना, श्वासकष्ट होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं।

मुख का कैंसर
तंबाकू सेवन मुख व गले के कैंसर का मुख्य कारण है। भारत देश में मुख के कैंसर के रुग्ण अधिक मिलते हैं। मुख के भीतर कोई गांठ, घाव या व्रण बन जाना, मुख के भीतर किसी स्थान पर कोई सफेद चिन्ह बन जाना, मुख से लार टपकना व दुर्गंध आना, मुंह खोलने में कठिनाई होना, बोलने व निगलने में कठिनाई का अनुभव होना आदि लक्षण होते हैं।

फुफ्फुस कैंसर
सतत खांसी, खांसी के साथ खून, आवाज में बदलाव, श्वासकष्ट आदि लक्षण होते हैं।

पाचनतंत्र का कैंसर
आमाशय का कैंसर प्रायः पुरुषों में 40 वर्ष की आयु के बाद होता है। रोगी को पेट में वेदना होती है, कैंसर की कोशिकाओं से आमाशय घिरा रहने के कारण भूख बहुत कम हो जाती है, कमी-कभी खून की उल्टी भी होती है, दुर्बलता व भोजन न करने के कारण रक्ताल्पता भी होती है।

इसमें प्रारंभ में कोई लक्षण नहीं होता, बाद में ऑतों के कैंसर में ज्वर, अजीर्ण व पतले दस्त होते हैं, केवल पेट में असहनीय पीड़ा होती है, कभी-कभी मलद्वार से केवल रक्त या मल के साथ मिलकर रक्त भी आता है, कभी-कभी आतों में गांठ की वजह से मलबद्धता भी हो सकती है।

यकृत का कैंसर
यकृत व पित्ताशय के कैंसर में पेट के दाईं ओर असहनीय पीड़ा, रक्ताल्पता, अपचन व पेट के दाईं ओर गांठ का अनुभव होना इसका लक्षण है। यकृत में कैंसर स्वयं कम ही होता है, प्रायः अन्य अंगों के द्वारा लसिका संस्थान व रक्त के द्वारा ही विक्षेपित होता है। अतः यकृत के कैंसर में अन्य संबंधित अंगों का परिक्षण भी अवश्य करवा लेना चाहिए। यकृत के कैंसर में जलोदर व पीलिया के लक्षण भी मिलते है।

मूत्राशय व वृक्क का कैंसर
कोयले के खानों में कार्यरत श्रमिकों व रंग के कारखाने में कार्य करनेवाले कर्मचारियों को मूत्राशय का कैंसर होने की अधिक संभावना रहती है। पथरी भी यदि अधिक दिनों तक रहे तो वहां व्रण होकर कैंसर की कोशिकाएं पनपने लगती हैं। जो लक्षण मूत्राशय कैंसर के हैं अधिकतर वही लक्षण वृक्क के कैंसर में भी होते हैं। कभी-कभी मूत्र के साथ रक्त आता है। पेट के निचले हिस्से में पीड़ा होती है. मूत्राशय में गांठ की अनुभूति अपेक्षाकृत कम होती है।

शिश्न कैंसर
यह उन पुरुषों में अधिक होता है जो अपने शिश्न की स्वच्छता की ओर उचित ध्यान नहीं देते व परस्त्रीगमन व उपदंश के कारण भी शिश्न कैंसर होने की संभावना बढ़ती है। प्रारंभ में शिश्न पर एक छोटी सी गांठ आती है, धीरे-धीरे उसका रूप आकार और परिधी बदलता जाता है, पश्चात वहां से रक्त और पीप भी निकलता है, बायोप्सी द्वारा जांच करने पर निदान संभव हो सकता है।

प्रोस्टेट कैंसर
प्रायः वृद्धावस्था में जब प्रोस्टेट ग्रंथि अपने सामान्य आकार से कुछ बढ़ने लगती है तो अन्य अवयवों के साथ इसकी रगड़ होकर व्रण तैयार होकर कैंसर की गांठ बनने की संभावना रहती है। प्रारंभ में मूत्रत्याग में बाधा होती है। कभी-कभी मूत्र भीतर रुकने से पेट फूल जाता है व मूत्र त्त्याग के समय वेदना भी होती है।

वृषण कैंसर
वृषण कैंसर प्रायः बहुत कम पाया जाता है। गर्भावस्था में वृषण यदि पेट में ही पड़े रहे (Undescended Testis) तो वहां पर ये विकृत होकर कैंसर का रुप धारण कर सकते हैं। वृषण में बाहरी चोट लगना अथवा हार्मोन्स के असंतुलन के कारण भी वृषण कैंसर हो सकता है। प्रारंभ में केवल वृषण पर सूजन आती है, ज्वर प्रायः नहीं रहता है, रुग्ण कभी-कभी इसे हाइड्रोसिल समझकर निश्चिंत हो जाता है किंतु इस और सावधान रहना चाहिए क्योंकि वृषण का कैंसर शरीर में बहुत जल्दी प्रसारित होता है।

ब्रेन कैंसर इसमें मस्तिष्क या स्पाइनल कॉर्ड में टयुमर (गांठ) होता है। जिससे चक्कर, उल्टी, स्मृतिनाश, अचानक ससंबद्ध गतियां करना, ज्ञानेन्द्रियों के कार्य विकृत होना, श्वासकष्ट आदि लक्षण होते है।

इसके अलावा पैन्क्रियाज, एनोरेक्टल (गुदा), थायराइड, लिम्फोमा का कैंसर होता है।

कैंसर से बचने के उपाय

हमारे कैंसर का शिकार होने की संभावना हमारी जीवनशैली पर निर्भर होती है। तंबाखू और धुम्रपान छोड़ना बेहतर स्वास्थ्य के लिए निर्णायक फैसला साबित हो सकता है। पैसिव स्मोकिंग (किसी और के धूम्रपान का धुंआ) भी घातक है। हमेशा संतुलित आहार लें। फल और सब्जियां भरपूर खाएं। मोटापे और शराब सेवन से बचें। शारीरिक सक्रियता को बढ़ाएं। त्वचा के कैंसर से बचने के लिए अच्छी किस्म का सनस्क्रीन लोशन इस्तेमाल करें। बेहद तीखी सीधी धूप से बचें। सुरक्षित यौन संबंध रखें। एड्स ग्रस्त लोगों को लीवर, फेफड़ें, लिम्फोमा कैंसर की आशंका ज्यादा होती है। नीडल्स शेयर करने से एचआईवी, हेपेटाइटिस बी व सी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है जो लीवर कैसर के लिए जिम्मेदार हो सकता है।

टीकाकरण

हैपेटाइटिस बी का टीका अनिवार्य है. हयूमैन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) सेक्स संबंधों से फैलने वाला वायरस है जो गर्भाशय और जननांगों के कैंसर की वजह बनता है। यह गर्दन और सिर के स्क्वैमस सेल कैंसर की वजह भी बन सकता है। एचपीवी टीका 11 और 12 वर्ष आयुवर्ग के लड़के-लड़कियों को दिया जाता है। अगर किशोरावस्था में टीका न लगा हो तो 26 वर्ष या उससे कुछ वर्ष पहले तक लगाया जा सकता है।

कैंसर के स्क्रीनिंग टेस्ट?
ब्रेस्ट कैंसर का पता मैमोग्राफी से चलता है। डॉक्टर की सिफारिश के मुताबिक स्तन जांच, जेनेटिक स्क्रीनिंग, अल्ट्रासाउंड और एमआरआई कराई जा सकती है। सर्विकल कैंसर का पता ग्रीवा पर एक किस्म के धब्बे (पेप स्मियर) से चलता है। शौच में रक्त बॉवेल कैंसर का संकेत हो सकता है। कुछ के लिए सिग्मोइडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी की सिफारिश की जा सकती है। प्रोस्टेट कैंसर का पता पीएसए टेस्ट से चलता है।

प्रभावकारी चिकित्सा
आज के अत्याधुनिक युग में जहां वैज्ञानिकों ने रोबोट जैसा मानव बनाया है, कई तरह के असंभव कार्य संभव कर दिखाए हैं, घंटों का कार्य सेकंडों में कर दिखाया है, कई असाध्य बीमारीयों से मुक्ति दिलाई है इत्यादि। तो इस युग में कैंसर पीड़ितों का मृत्युदर बढ़‌ना वाकई में वैज्ञानिकों व चिकित्सकों के लिए चिंतन व चुनौती का विषय है। जरुर कहीं न कहीं चिकित्सा इत्यादि में कमी है, अतः जीकुमार आरोग्यधाम रिसर्च सेंटर के चिकित्सकों ने संशोधन की दृष्टि से गहन अध्ययन-मनन-चिंतन व मंथन कर कैंसर रुग्णों के लिए आधुनिक चिकित्सा के साथ ही साथ भारतीय चिकित्सा प्रणाली की पद्धत्तियों का समावेश किया है, जिसके आशातीत परिणाम सामने आ रहे हैं। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की किमोथेरापी, रेडियोथेरापी, शल्य क्रिया के साथ ही साथ भारतीय चिकित्सा प्रणाली की वनौषधियां, पंचकर्म, साइकोथिरेपी, नैचरोपॅथी व योगोपचार से कैंसर पीड़ितों में लाभ की दृष्टि से अच्छे सुखद परिणाम आ रहे हैं।
 
संशोधन में पाया गया है कि कैंसर पीड़ितों में रोगावस्था से अधिक उनके मन पर कुप्रभाव पड़ता है अतः रुग्णों में आत्मविश्वास व मनोबल बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। उनके मन में यह विश्वास पैदा करना चाहिए कि इसका इलाज ठीक तरह से हो रहा है व इससे निश्चित ही मुक्ति मिलेगी। मनोबल बढ़ाने के लिए आयुर्वेद में वर्णित मेद्य रसायन, पंचकर्म व योगोपचार का प्रयोग करना चाहिए। मेद्य रसायन में शंखपुष्पी, जटामाॅसी, ब्राम्ही इत्यादि औषधियों के अच्छे परिणाम मिलते हैं।
 
आयुर्वेद की एक महत्वपूर्ण शाखा ‘पंचकर्म’ के भी कैंसर के रुग्णों व अन्य असाध्य रोगों को दूर करने में प्रभावकारी परिणाम सामने आ रहे हैं। पंचकर्म एक तरह से शरीर शुद्धि का विज्ञान है, जिससे शरीर के प्रत्येक सुक्ष्म से सुक्ष्म कोशिका में संचित दुषित विषैले रोगोत्पादक पदार्थों का निष्कासन होकर रोग जड़ सहित दूर होता है. शरीर स्वस्थ व मन प्रसन्न रहता है। अतः कैंसर के रुग्णों में पंचकर्म जरूर करना चाहिए। जिससे उनकी शरीर शुद्धि के साथ मनोबल मी निश्चित ही बढ़ेगा तथा रोग जड़ से निकल जाएगा। पंचकर्म हेतु विस्तृत जानकारी लेखक द्वारा लिखित ‘पंचकर्म-स्वास्थ्य की कुंजी’ पुस्तक से प्राप्त करें।
 
कैंसर के रुग्णों में आत्मविश्वास व मनोबल बढ़ाने के लिए योगोपचार की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि योगासन का शरीर व मन दोनों पर प्रभाव पड़ता है। गले के कैन्सर में उज्जयी प्राणायाम करें, कीमो या रेडिएशन के बाद यदि शरीर में गर्मी लगती हो शीतली एवं सीत्कारी प्राणायाम बहुत लाभदायक है। अतः कैंसर के रुग्णों को मनोबल बढ़ाने के लिए निश्चित ही किसी योग विशेषज्ञ के देखरेख में योगासन, प्राणायान व ध्यान की क्रियाएं करनी चाहिए। योगासन हेतु विस्तृत जानकारी लेखक द्वारा लिखित “योगासन- ‘स्वस्थ जीवन का शिल्पकार” पुस्तक से प्राप्त करें।
 
आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में कैंसर के रुग्णों में प्रयुक्त शल्यकर्म, रेडियोथेरापी एवं किमोओथेरापी के परिणाम प्रभावकारी तो हैं लेकिन इनके अनेक उपद्रवों का सामना रुग्ण को करना पड़ता है। इनके उपद्रव स्वरूप शरीर का वजन घटना, कमजोरी Bone marrow depression, मुखपाक, त्वचा का वर्ण परिवर्तन, अम्लपित्त, कब्ज, दस्त, उल्टी, भूख न लगना, सिर के बाल झड़ना, रोगप्रतिरोधक शक्ति कम होना आदि। किमोओथेरापी से कैंसर की कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाएं भी नष्ट होती हैं। अतः इन उपद्रवों का शमन करने के लिए आयुर्वेदिक औषधियां सक्षम हैं क्योंकि ये उपद्रव स्वरुप जो लक्षण हैं वे अधिकतर आयुर्वेद में वर्णित धातुक्षय के लक्षण हैं तथा आयुर्वेद में इसके लिए दिव्य रसायन औषधियों जैसे आंवला, गुडूची, केसर, यष्टिमधु, अश्वगंधा, स्वर्णमस्म्, हीराभस्म इत्यादि का वर्णन मिलता है तथा इनसे निर्मित च्यवनप्राश है। अतः कैंसर के रुग्णों को अन्य औषधियों के साथ-साथ च्यवनप्राश या अन्य रसायन 2-2 चम्मच सुबह-शाम दूध के साथ लेना चाहिए, जिससे उपद्रवों के शमन के साथ रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़कर शरीर भी स्वस्थ रहेगा।
 
कैंसर के रुग्णों में नैचरोपैथी की मिट्टी पट्टी, एनिमा, वाष्पस्नान, फुटबॉथ, कटिस्नान-अवगाह स्नान आदि क्रियाओं से शरीर में से विजातीय पदार्थों का निष्कासन होकर शरीर स्वस्थ तरोताजा होता है।
 

भिन्न-भिन्न जडीबूटियों के Extract कैंसर में उपयोगी

रोहिणी (Helloborus niger) – प्रोस्टेट कैंसर
गुडुची (Tinospra cordifolia) – त्वचा कैंसर
भारंगी (Clerodendron serratum) – सूजन कम करने व फेफड़ों के कैंसर
बिल्व (Aegele marmelos) – ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम
गोजिव्हा (Elephantopus scaber) – ब्रेस्ट व फेफेड़ का कैंसर
अतिरोह (Soyamida febrifuga) – पेन्क्रियाज कैंसर
बिभीतकी (Terminalia chebula) – फेफड़ो का कैंसर
यष्टिमधु (Glycyrrhiga glabra) – आंतों का कैंसर
जम्बु (Eugenia jamboloa) – कोलोन कैंसर
पाठा (Cissampelos pareira) – गैस्ट्रिक कैसर
मदनफल (Randia dumetorum) – ब्रेस्ट कैंसर
कष्ठिला (Musa Sapientum) – कोलोन कैसर
गोधूम (Triticumsativum) – ब्रेस्ट, गुदगत कैंसर
विडंग (Embella ribes) – प्रोस्टेट कैंसर
हरिद्रा (Curcuma domestica) – ऊर्ध्व जत्रुगत कैंसर
 

गेंहू के ज्वारे का रस
कैंसर के रुग्णों में गेहूं के ज्वारे के रस का भी अ‌द्भुत लाभ मिलता है। गेहूं के ज्वारे का रस प्रकृति के गर्भ में छिपी औषधियों के भंडार में से मानव को प्राप्त एक अनुपम भेंट हैं। कई स्थानों पर जारी रिसर्च में अनेक असाध्य रोगों में इसके आश्चर्यजनक परिणाम देखने में आए हैं। शरीर के लिए यह एक शक्तिशाली टॉनिक है। इसमें प्राकृतिक रूप से कार्बोहाईड्रट आदि सभी विटामिन, क्षार एवं श्रेष्ठ प्रोटीन उपस्थित है। इसके सेवन से असंख्य लोगों को विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति मिली है, जैसे कैंसर के साथ ही साथ डायबिटीज, हृदयरोग, लकवा, दमा, पाचन संस्थान के विकार, संधिवात, मूत्राशयगत रोग इत्यादि। स्वाद के लिए इसमें मधु, अदरक, नागरबेल के पत्ते भी डाल सकते हैं। इस जूस में नीम, तुलसी व गिलोय के पत्तों का जूस थोड़ी मात्रा में मिलाकर पीयें।

कैंसर के रुग्णों को नित्य सुबह सदाफुली, नीम व तुलसी के तीन-तीन पत्ते खाली पेट चबाकर खाना चाहिए तथा गाजर के रस का सेवन भी फायदेमंद है।

कैंसर में गोमूत्र के प्रभावी परिणाम मिलते है। जो व्यक्ति गोमूत्र नहीं पी सकता वह शहद मिलाकर गोमूत्र सुबह खाली पेट लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़‌ती है। गोमूत्र व गिलोय का रस सभी प्रकार के कैंसर में लाभदायक है।

आयुर्वेद में कैंसर के रुग्णों के लिए कई चामत्कारिक औषधियों का वर्णन प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा विदित ग्रंथों में मिलता है तथा आज भी इन पर संशोधन जारी है। संशोधन में कैंसर को दूर करने के लिए मुख्यतः कांचनार, हल्दी, गुडूची, भल्लातक, रोहितक, यष्टिमधु, सहिजन, वरुण, घृतकुमारी, स्वर्ण भस्म, मौक्तिक भस्म, वैक्रान्त भस्म, माणिक्य रस, हीराभस्म, लाक्षाचूर्ण, पिप्पली, वंशलोचन, शिलाजीत, अभ्रक भस्म, घृतकुमारी, भल्लातक (बिबा) व लहसुन इत्यादि औषधियों के चामत्कारिक परिणाम सामने आ रहे हैं।

संजीवनी वटी 10 ग्राम, शिला सिंदूर 3 ग्राम, ताम्बे की भस्म एक ग्राम, अमृता सत्व 10 ग्राम, अभ्रक भस्म 5 ग्राम, हीरक भस्म 300 मि.ग्राम से 500 मि.ग्राम, स्वर्ण बसन्त मालती 2 ग्राम से 4 ग्राम्, मुक्ता पिष्टी 4 ग्राम, प्रवाल पंचामृत 5 ग्राम लेकर 60 पुड़िया बना लें, 1-1 पुड़िया दिन में तीन बार खाने से एक घन्टा पहले पानी या शहद के साथ लें।

अतः जीवन में आशावादी दृष्टिकोण अपनाकर शीघ्रताशीघ्र योग्य चिकित्सक के मार्गदर्शन में उपरोक्त चिकित्सोपक्रम के द्वारा आयु की वृद्धि कर सुखद जीवन जीने की आवश्यकता है। यह जान लेना भी जरूरी है कि कैंसर की रोकथाम हो सकती है। इसलिये जरूरी है कि हम अपने जीवन के सभी पहलुओं के बारे में सोचों जैसे कि खान-पान, व्यायाम और शरीर का वजन। अपने जीवन से कैंसर के कुछ मूल कारणों को दूर करके कैंसर से बचाव कर सकते हैं। आप कैंसर के शिकार नहीं विजेता हो सकते हो।

विभिन्न अंगों में होने वाला कैंसर

स्तन कैंसर
महिलाओं में प्रायः रजस्राव होने के बाद 40-50 वर्ष की आयु में स्तन कैंसर होने की अधिक संभावना रहती है। मातृत्वहीन (Nullipara) व जिन्होंने बालक को स्तनपान न कराया हो, उन्हें स्तन कैंसर होने की संभावना अधिक रहती है। डिंबग्रंथि (ओवरी) से उत्सर्जित हार्मोन्स भी इस रोग को उत्पन्न कर सकते हैं।

सर्वप्रथम स्तन में छोटी, अचल गांठ आती है, प्रायः प्रारंग में वेदना नहीं होती किंतु बाद में कभी-कभी पीड़ा हो भी सकती है। प्रारंभ में बगल की रसग्रंथियां (गिल्टियां) नहीं बढ़ती किंतु कुछ दिनों बाद बगल की रस ग्रंथियां फूल जाती हैं। चुचुक से स्राव भी होता है। जिस ओर के स्तन में कैंसर की गांठ होती है, उस ओर का चुचुक ऊपर की ओर उठा हुआ दिखाई देता है। चुचुक के चारों ओर का स्तनमंडल भी प्रायः पूर्व की अपेक्षा छोटा दिखाई देता है व स्तन मंडल की त्वचा नारंगी रंग के छिलके की भांति अनियमित उबड़‌खाबड़ व स्पर्श में कठोर हो जाती है।

गर्भाशय का कैंसर
छोटी उम्र में विवाह, अधिक प्रसव, संसर्गजन्य रोग, रजस्राव के समय मैले-अस्वच्छ वस्त्रों का प्रयोग, प्रसव के दौरान गर्भाशय ग्रीवा में यदि किसी तरह का व्रण हो गया हो और वह ठीक होने से पहले ही यदि पुनः गर्भधारणा हो जाए तो ऐसी महिलाओं को 40 वर्ष की आयु के बाद गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर होने की संभावना होती है।
रजोनिवृत्ति के बाद मासिक स्राव बंद होने के पश्चात पुनः योनि से रक्तस्राव होने लगता है साथ ही गंभीर अवस्था में पूय स्राव भी बहता है और स्राव से दुर्गंध आने लगती है, पैरों व कमर में भी निरंतर वेदना बनी रहती है।

रक्त कैंसर (ल्यूकेमिआ)
एक्सरे और विकिरण प्रणाली से किरणें यदि शरीर के अंदर गहन प्रवेश कर जाए तो अस्थिमज्जा (Bone marrow) को प्रभावित करती है, जिससे उसके अंदर रक्त के कोषाणु भी प्रभावित होते हैं। मुख से रक्तस्राव, जोड़ों व पसलियों में वेदना, ज्वर का निरंतर बहुत दिनों तक बने रहना, आतों के स्वाभाविक कार्यों में फेरबदल होना (मलबद्धता अथवा अतिसार होना), प्लीहा व लसिका ग्रंथियों के आकार में वृद्धि होना, श्वासकष्ट होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं।

मुख का कैंसर
तंबाकू सेवन मुख व गले के कैंसर का मुख्य कारण है। भारत देश में मुख के कैंसर के रुग्ण अधिक मिलते हैं। मुख के भीतर कोई गांठ, घाव या व्रण बन जाना, मुख के भीतर किसी स्थान पर कोई सफेद चिन्ह बन जाना, मुख से लार टपकना व दुर्गंध आना, मुंह खोलने में कठिनाई होना, बोलने व निगलने में कठिनाई का अनुभव होना आदि लक्षण होते हैं।

फुफ्फुस कैंसर
सतत खांसी, खांसी के साथ खून, आवाज में बदलाव, श्वासकष्ट आदि लक्षण होते हैं।

पाचनतंत्र का कैंसर
आमाशय का कैंसर प्रायः पुरुषों में 40 वर्ष की आयु के बाद होता है। रोगी को पेट में वेदना होती है, कैंसर की कोशिकाओं से आमाशय घिरा रहने के कारण भूख बहुत कम हो जाती है, कमी-कभी खून की उल्टी भी होती है, दुर्बलता व भोजन न करने के कारण रक्ताल्पता भी होती है।

इसमें प्रारंभ में कोई लक्षण नहीं होता, बाद में ऑतों के कैंसर में ज्वर, अजीर्ण व पतले दस्त होते हैं, केवल पेट में असहनीय पीड़ा होती है, कभी-कभी मलद्वार से केवल रक्त या मल के साथ मिलकर रक्त भी आता है, कभी-कभी आतों में गांठ की वजह से मलबद्धता भी हो सकती है।

यकृत का कैंसर
यकृत व पित्ताशय के कैंसर में पेट के दाईं ओर असहनीय पीड़ा, रक्ताल्पता, अपचन व पेट के दाईं ओर गांठ का अनुभव होना इसका लक्षण है। यकृत में कैंसर स्वयं कम ही होता है, प्रायः अन्य अंगों के द्वारा लसिका संस्थान व रक्त के द्वारा ही विक्षेपित होता है। अतः यकृत के कैंसर में अन्य संबंधित अंगों का परिक्षण भी अवश्य करवा लेना चाहिए। यकृत के कैंसर में जलोदर व पीलिया के लक्षण भी मिलते है।

मूत्राशय व वृक्क का कैंसर
कोयले के खानों में कार्यरत श्रमिकों व रंग के कारखाने में कार्य करनेवाले कर्मचारियों को मूत्राशय का कैंसर होने की अधिक संभावना रहती है। पथरी भी यदि अधिक दिनों तक रहे तो वहां व्रण होकर कैंसर की कोशिकाएं पनपने लगती हैं। जो लक्षण मूत्राशय कैंसर के हैं अधिकतर वही लक्षण वृक्क के कैंसर में भी होते हैं। कभी-कभी मूत्र के साथ रक्त आता है। पेट के निचले हिस्से में पीड़ा होती है. मूत्राशय में गांठ की अनुभूति अपेक्षाकृत कम होती है।

शिश्न कैंसर
यह उन पुरुषों में अधिक होता है जो अपने शिश्न की स्वच्छता की ओर उचित ध्यान नहीं देते व परस्त्रीगमन व उपदंश के कारण भी शिश्न कैंसर होने की संभावना बढ़ती है। प्रारंभ में शिश्न पर एक छोटी सी गांठ आती है, धीरे-धीरे उसका रूप आकार और परिधी बदलता जाता है, पश्चात वहां से रक्त और पीप भी निकलता है, बायोप्सी द्वारा जांच करने पर निदान संभव हो सकता है।

प्रोस्टेट कैंसर
प्रायः वृद्धावस्था में जब प्रोस्टेट ग्रंथि अपने सामान्य आकार से कुछ बढ़ने लगती है तो अन्य अवयवों के साथ इसकी रगड़ होकर व्रण तैयार होकर कैंसर की गांठ बनने की संभावना रहती है। प्रारंभ में मूत्रत्याग में बाधा होती है। कभी-कभी मूत्र भीतर रुकने से पेट फूल जाता है व मूत्र त्त्याग के समय वेदना भी होती है।

वृषण कैंसर
वृषण कैंसर प्रायः बहुत कम पाया जाता है। गर्भावस्था में वृषण यदि पेट में ही पड़े रहे (Undescended Testis) तो वहां पर ये विकृत होकर कैंसर का रुप धारण कर सकते हैं। वृषण में बाहरी चोट लगना अथवा हार्मोन्स के असंतुलन के कारण भी वृषण कैंसर हो सकता है। प्रारंभ में केवल वृषण पर सूजन आती है, ज्वर प्रायः नहीं रहता है, रुग्ण कभी-कभी इसे हाइड्रोसिल समझकर निश्चिंत हो जाता है किंतु इस और सावधान रहना चाहिए क्योंकि वृषण का कैंसर शरीर में बहुत जल्दी प्रसारित होता है।


ब्रेन कैंसर इसमें मस्तिष्क या स्पाइनल कॉर्ड में टयुमर (गांठ) होता है। जिससे चक्कर, उल्टी, स्मृतिनाश, अचानक ससंबद्ध गतियां करना, ज्ञानेन्द्रियों के कार्य विकृत होना, श्वासकष्ट आदि लक्षण होते है।

इसके अलावा पैन्क्रियाज, एनोरेक्टल (गुदा), थायराइड, लिम्फोमा का कैंसर होता है।

 

कैंसर से बचने के उपाय

हमारे कैंसर का शिकार होने की संभावना हमारी जीवनशैली पर निर्भर होती है। तंबाखू और धुम्रपान छोड़ना बेहतर स्वास्थ्य के लिए निर्णायक फैसला साबित हो सकता है। पैसिव स्मोकिंग (किसी और के धूम्रपान का धुंआ) भी घातक है। हमेशा संतुलित आहार लें। फल और सब्जियां भरपूर खाएं। मोटापे और शराब सेवन से बचें। शारीरिक सक्रियता को बढ़ाएं। त्वचा के कैंसर से बचने के लिए अच्छी किस्म का सनस्क्रीन लोशन इस्तेमाल करें। बेहद तीखी सीधी धूप से बचें। सुरक्षित यौन संबंध रखें। एड्स ग्रस्त लोगों को लीवर, फेफड़ें, लिम्फोमा कैंसर की आशंका ज्यादा होती है। नीडल्स शेयर करने से एचआईवी, हेपेटाइटिस बी व सी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है जो लीवर कैसर के लिए जिम्मेदार हो सकता है।

टीकाकरण

हैपेटाइटिस बी का टीका अनिवार्य है. हयूमैन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) सेक्स संबंधों से फैलने वाला वायरस है जो गर्भाशय और जननांगों के कैंसर की वजह बनता है। यह गर्दन और सिर के स्क्वैमस सेल कैंसर की वजह भी बन सकता है। एचपीवी टीका 11 और 12 वर्ष आयुवर्ग के लड़के-लड़कियों को दिया जाता है। अगर किशोरावस्था में टीका न लगा हो तो 26 वर्ष या उससे कुछ वर्ष पहले तक लगाया जा सकता है।

कैंसर के स्क्रीनिंग टेस्ट?

ब्रेस्ट कैंसर का पता मैमोग्राफी से चलता है। डॉक्टर की सिफारिश के मुताबिक स्तन जांच, जेनेटिक स्क्रीनिंग, अल्ट्रासाउंड और एमआरआई कराई जा सकती है। सर्विकल कैंसर का पता ग्रीवा पर एक किस्म के धब्बे (पेप स्मियर) से चलता है। शौच में रक्त बॉवेल कैंसर का संकेत हो सकता है। कुछ के लिए सिग्मोइडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी की सिफारिश की जा सकती है। प्रोस्टेट कैंसर का पता पीएसए टेस्ट से चलता है।

प्रभावकारी चिकित्सा

आज के अत्याधुनिक युग में जहां वैज्ञानिकों ने रोबोट जैसा मानव बनाया है, कई तरह के असंभव कार्य संभव कर दिखाए हैं, घंटों का कार्य सेकंडों में कर दिखाया है, कई असाध्य बीमारीयों से मुक्ति दिलाई है इत्यादि। तो इस युग में कैंसर पीड़ितों का मृत्युदर बढ़‌ना वाकई में वैज्ञानिकों व चिकित्सकों के लिए चिंतन व चुनौती का विषय है। जरुर कहीं न कहीं चिकित्सा इत्यादि में कमी है, अतः जीकुमार आरोग्यधाम रिसर्च सेंटर के चिकित्सकों ने संशोधन की दृष्टि से गहन अध्ययन-मनन-चिंतन व मंथन कर कैंसर रुग्णों के लिए आधुनिक चिकित्सा के साथ ही साथ भारतीय चिकित्सा प्रणाली की पद्धत्तियों का समावेश किया है, जिसके आशातीत परिणाम सामने आ रहे हैं। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की किमोथेरापी, रेडियोथेरापी, शल्य क्रिया के साथ ही साथ भारतीय चिकित्सा प्रणाली की वनौषधियां, पंचकर्म, साइकोथिरेपी, नैचरोपॅथी व योगोपचार से कैंसर पीड़ितों में लाभ की दृष्टि से अच्छे सुखद परिणाम आ रहे हैं।
 
संशोधन में पाया गया है कि कैंसर पीड़ितों में रोगावस्था से अधिक उनके मन पर कुप्रभाव पड़ता है अतः रुग्णों में आत्मविश्वास व मनोबल बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। उनके मन में यह विश्वास पैदा करना चाहिए कि इसका इलाज ठीक तरह से हो रहा है व इससे निश्चित ही मुक्ति मिलेगी। मनोबल बढ़ाने के लिए आयुर्वेद में वर्णित मेद्य रसायन, पंचकर्म व योगोपचार का प्रयोग करना चाहिए। मेद्य रसायन में शंखपुष्पी, जटामाॅसी, ब्राम्ही इत्यादि औषधियों के अच्छे परिणाम मिलते हैं।
 
आयुर्वेद की एक महत्वपूर्ण शाखा ‘पंचकर्म’ के भी कैंसर के रुग्णों व अन्य असाध्य रोगों को दूर करने में प्रभावकारी परिणाम सामने आ रहे हैं। पंचकर्म एक तरह से शरीर शुद्धि का विज्ञान है, जिससे शरीर के प्रत्येक सुक्ष्म से सुक्ष्म कोशिका में संचित दुषित विषैले रोगोत्पादक पदार्थों का निष्कासन होकर रोग जड़ सहित दूर होता है. शरीर स्वस्थ व मन प्रसन्न रहता है। अतः कैंसर के रुग्णों में पंचकर्म जरूर करना चाहिए। जिससे उनकी शरीर शुद्धि के साथ मनोबल मी निश्चित ही बढ़ेगा तथा रोग जड़ से निकल जाएगा। पंचकर्म हेतु विस्तृत जानकारी लेखक द्वारा लिखित ‘पंचकर्म-स्वास्थ्य की कुंजी’ पुस्तक से प्राप्त करें।
 
कैंसर के रुग्णों में आत्मविश्वास व मनोबल बढ़ाने के लिए योगोपचार की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि योगासन का शरीर व मन दोनों पर प्रभाव पड़ता है। गले के कैन्सर में उज्जयी प्राणायाम करें, कीमो या रेडिएशन के बाद यदि शरीर में गर्मी लगती हो शीतली एवं सीत्कारी प्राणायाम बहुत लाभदायक है। अतः कैंसर के रुग्णों को मनोबल बढ़ाने के लिए निश्चित ही किसी योग विशेषज्ञ के देखरेख में योगासन, प्राणायान व ध्यान की क्रियाएं करनी चाहिए। योगासन हेतु विस्तृत जानकारी लेखक द्वारा लिखित “योगासन- ‘स्वस्थ जीवन का शिल्पकार” पुस्तक से प्राप्त करें।
 
आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में कैंसर के रुग्णों में प्रयुक्त शल्यकर्म, रेडियोथेरापी एवं किमोओथेरापी के परिणाम प्रभावकारी तो हैं लेकिन इनके अनेक उपद्रवों का सामना रुग्ण को करना पड़ता है। इनके उपद्रव स्वरूप शरीर का वजन घटना, कमजोरी Bone marrow depression, मुखपाक, त्वचा का वर्ण परिवर्तन, अम्लपित्त, कब्ज, दस्त, उल्टी, भूख न लगना, सिर के बाल झड़ना, रोगप्रतिरोधक शक्ति कम होना आदि। किमोओथेरापी से कैंसर की कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाएं भी नष्ट होती हैं। अतः इन उपद्रवों का शमन करने के लिए आयुर्वेदिक औषधियां सक्षम हैं क्योंकि ये उपद्रव स्वरुप जो लक्षण हैं वे अधिकतर आयुर्वेद में वर्णित धातुक्षय के लक्षण हैं तथा आयुर्वेद में इसके लिए दिव्य रसायन औषधियों जैसे आंवला, गुडूची, केसर, यष्टिमधु, अश्वगंधा, स्वर्णमस्म्, हीराभस्म इत्यादि का वर्णन मिलता है तथा इनसे निर्मित च्यवनप्राश है। अतः कैंसर के रुग्णों को अन्य औषधियों के साथ-साथ च्यवनप्राश या अन्य रसायन 2-2 चम्मच सुबह-शाम दूध के साथ लेना चाहिए, जिससे उपद्रवों के शमन के साथ रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़कर शरीर भी स्वस्थ रहेगा।
 
कैंसर के रुग्णों में नैचरोपैथी की मिट्टी पट्टी, एनिमा, वाष्पस्नान, फुटबॉथ, कटिस्नान-अवगाह स्नान आदि क्रियाओं से शरीर में से विजातीय पदार्थों का निष्कासन होकर शरीर स्वस्थ तरोताजा होता है।
 

भिन्न-भिन्न जडीबूटियों के Extract कैंसर में उपयोगी

 
रोहिणी (Helloborus niger) – प्रोस्टेट कैंसर
गुडुची (Tinospra cordifolia) – त्वचा कैंसर
भारंगी (Clerodendron serratum) – सूजन कम करने व फेफड़ों के कैंसर
बिल्व (Aegele marmelos) – ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम
गोजिव्हा (Elephantopus scaber) – ब्रेस्ट व फेफेड़ का कैंसर
अतिरोह (Soyamida febrifuga) – पेन्क्रियाज कैंसर
बिभीतकी (Terminalia chebula) – फेफड़ो का कैंसर
यष्टिमधु (Glycyrrhiga glabra) – आंतों का कैंसर
जम्बु (Eugenia jamboloa) – कोलोन कैंसर
पाठा (Cissampelos pareira) – गैस्ट्रिक कैसर
मदनफल (Randia dumetorum) – ब्रेस्ट कैंसर
कष्ठिला (Musa Sapientum) – कोलोन कैसर
गोधूम (Triticumsativum) – ब्रेस्ट, गुदगत कैंसर
विडंग (Embella ribes) – प्रोस्टेट कैंसर
हरिद्रा (Curcuma domestica) – ऊर्ध्व जत्रुगत कैंसर
 

गेंहू के ज्वारे का रस
कैंसर के रुग्णों में गेहूं के ज्वारे के रस का भी अ‌द्भुत लाभ मिलता है। गेहूं के ज्वारे का रस प्रकृति के गर्भ में छिपी औषधियों के भंडार में से मानव को प्राप्त एक अनुपम भेंट हैं। कई स्थानों पर जारी रिसर्च में अनेक असाध्य रोगों में इसके आश्चर्यजनक परिणाम देखने में आए हैं। शरीर के लिए यह एक शक्तिशाली टॉनिक है। इसमें प्राकृतिक रूप से कार्बोहाईड्रट आदि सभी विटामिन, क्षार एवं श्रेष्ठ प्रोटीन उपस्थित है। इसके सेवन से असंख्य लोगों को विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति मिली है, जैसे कैंसर के साथ ही साथ डायबिटीज, हृदयरोग, लकवा, दमा, पाचन संस्थान के विकार, संधिवात, मूत्राशयगत रोग इत्यादि। स्वाद के लिए इसमें मधु, अदरक, नागरबेल के पत्ते भी डाल सकते हैं। इस जूस में नीम, तुलसी व गिलोय के पत्तों का जूस थोड़ी मात्रा में मिलाकर पीयें।

कैंसर के रुग्णों को नित्य सुबह सदाफुली, नीम व तुलसी के तीन-तीन पत्ते खाली पेट चबाकर खाना चाहिए तथा गाजर के रस का सेवन भी फायदेमंद है।

कैंसर में गोमूत्र के प्रभावी परिणाम मिलते है। जो व्यक्ति गोमूत्र नहीं पी सकता वह शहद मिलाकर गोमूत्र सुबह खाली पेट लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़‌ती है। गोमूत्र व गिलोय का रस सभी प्रकार के कैंसर में लाभदायक है।

आयुर्वेद में कैंसर के रुग्णों के लिए कई चामत्कारिक औषधियों का वर्णन प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा विदित ग्रंथों में मिलता है तथा आज भी इन पर संशोधन जारी है। संशोधन में कैंसर को दूर करने के लिए मुख्यतः कांचनार, हल्दी, गुडूची, भल्लातक, रोहितक, यष्टिमधु, सहिजन, वरुण, घृतकुमारी, स्वर्ण भस्म, मौक्तिक भस्म, वैक्रान्त भस्म, माणिक्य रस, हीराभस्म, लाक्षाचूर्ण, पिप्पली, वंशलोचन, शिलाजीत, अभ्रक भस्म, घृतकुमारी, भल्लातक (बिबा) व लहसुन इत्यादि औषधियों के चामत्कारिक परिणाम सामने आ रहे हैं।

संजीवनी वटी 10 ग्राम, शिला सिंदूर 3 ग्राम, ताम्बे की भस्म एक ग्राम, अमृता सत्व 10 ग्राम, अभ्रक भस्म 5 ग्राम, हीरक भस्म 300 मि.ग्राम से 500 मि.ग्राम, स्वर्ण बसन्त मालती 2 ग्राम से 4 ग्राम्, मुक्ता पिष्टी 4 ग्राम, प्रवाल पंचामृत 5 ग्राम लेकर 60 पुड़िया बना लें, 1-1 पुड़िया दिन में तीन बार खाने से एक घन्टा पहले पानी या शहद के साथ लें।

अतः जीवन में आशावादी दृष्टिकोण अपनाकर शीघ्रताशीघ्र योग्य चिकित्सक के मार्गदर्शन में उपरोक्त चिकित्सोपक्रम के द्वारा आयु की वृद्धि कर सुखद जीवन जीने की आवश्यकता है। यह जान लेना भी जरूरी है कि कैंसर की रोकथाम हो सकती है। इसलिये जरूरी है कि हम अपने जीवन के सभी पहलुओं के बारे में सोचों जैसे कि खान-पान, व्यायाम और शरीर का वजन। अपने जीवन से कैंसर के कुछ मूल कारणों को दूर करके कैंसर से बचाव कर सकते हैं। आप कैंसर के शिकार नहीं विजेता हो सकते हो।

Dr Gurmukh Mamtani

डॉ. जी. एम. ममतानी
एम. डी. (आयुर्वेद पंचकर्म विशेषज्ञ)
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग, जरीपटका, नागपुर

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