वनौषधियों से चिकित्सा प्राचीन समय से ही हमारे जीवन का हिस्सा रही है। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और पौधों में ऐसे गुण पाए जाते हैं, जो शरीर को रोगों से लड़ने और स्वास्थ्य बनाए रखने में मदद करते हैं। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में वनौषधियों का प्रयोग शारीरिक, मानसिक और त्वचा संबंधी समस्याओं के उपचार के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है। वनौषधियों के उपयोग से शरीर को पोषण मिलता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर में रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों की संभावना कम होती है। इस विषय में हम जानेंगे कि किन वनौषधियों का उपयोग किस प्रकार की समस्याओं में किया जाता है और कैसे इनका नियमित और सही प्रयोग हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी साबित होता है।

प्राचीन काल से ही मनुष्य वनस्पतियों का प्रयोग औषधि के रूप में विभिन्न रोगों के शमन के लिये करता रहा है। वर्तमान समय और निरंतर शोध के परिणामस्वरूप इसमें उपयोग करने के तरीकों में अंतर जरूर आया है। जड़ी-बूटियों की अपनी विशिष्टता के कारण वह अलग-अलग प्रभाव डालती है। यहां पर त्वचा रोगों पर प्रभावी कुछ जड़ी बूटियों को विवरण दे रहे हैं।

मंजिष्ठा

लैटिन नाम – रूबिया कॉर्डिफोलिया (Rubia cordifolia) संस्कृत मंजिष्ठा, विकसा, योजनवल्ली
हिन्दी – मंजीठ
रासायनिक संघटन – मूल में रालयुक्त सत्वपदार्थ, गोंद. शर्करा, रंजक द्रव्य तथा चूने के लवण होते है। रंजक द्रव्यों में पर्युरिन (Purpurin) – ग्लुकोसाइड-मंजिष्ठिन (Manjistin) तथा इनके अतिरिक्त जैन्थोपप्र्युरिन और स्युडोपप्र्युरिन भी होते हैं। शोथ, व्रण तथा चर्मरोगों में इसका लेप करते हैं। कुष्ठ, विसर्प आदि चर्मरोगों में दिया जाता है।

चक्रमर्द

लैटिन नाम – कैसिआ टोरा (Cassia tora)
संस्कृत – चकमर्द, दद्रुघ्न, एडगज, मेषलोचन, प्रपुन्नाड, प‌द्माट, चक्री
हिन्दी – चकवड़, पवाँड
रासायनिक संघटन  – बीजों में Rhein, Aloe&emodin और Chrysophanol तथा 7.65% गोंद पाई जाती है। पत्र में कैथार्टीन के समान एक रेचक तत्व, लाल रंजक द्रव्य और कुछ खनिज द्रव्य होते है। इसके पंचांग की भस्म में सलफेट फास्फेट, कैल्शियम, लौह, मैगनीशियम, सोडियम और पोटेशियम पाये जाते हैं।
कुष्ठ आदि त्वचा के समस्त विकारों तथा वर्ण के विकारों में बीजों का लेप करते हैं। विषों में भी इसे लेप किया जाता है। अर्श में भी लगाते हैं। बीजों को दही या कांजी में सडा कर नींबू के रस में घिस कर कुष्ठ में लेप करते हैं। विशेषतः यह दद्रु में लाभकर है। कुष्ठ में इसकी पत्तियों का साग खिलाते हैं और उसका स्वरस देते है। बीजचूर्ण का भी प्रयोग करते है।

 काकोदुम्बर

लैटिन नाम – फाइकस हिस्पिडा (Ficus hispida)
संस्कृत – काकोदुम्बर, फल्गु, मलयू, जघनेफला, मूलकर्कटी, श्वित्रभैषज्य, काष्ठोदुम्बर
हिन्दी – कठूमर
रासायनिक संघटन – इसकी छाल में टेनिन, ग्लुकोसाइड, मोम तथा सैपोनिन होत है। कुष्ठ, श्वित्र, किलास आदि विविध चर्मरोगों में मूलत्वक् एवं दुग्ध का लेप करते है। इसका दूध स्फोटजनन एवं लेखन होने से दद्रु आदि में लगाते हैं। व्रण में इसके चूर्ण या क्वाथ का प्रयोग करते है। गंडमाला में पका फल पीस कर लगाते है। मूल एवं कच्चे फल का कुष्ठ में प्रयोग करते हैं। श्वित्ररोगी को गूलर और कठगूलर का गरम काढ़ा पिलाकर धूप में बैठावें। इसमें श्विन्त्र में फोड़े उठेंगे। उनको फोड़कर वहाँ चीते या हाथी का चमड़ा तैल में मिला कर लेप करे। इस विधि से सेवन करने पर श्वित्र अच्छा होता है।
 

श्वेत निशोथ

लैटिन नाम – ओपङ्गुलिना टर्पेथम् (Operculina turpethum)
संस्कृत – त्रिवृत, त्रिभण्डी, त्रिपुटा, सरला, सुवहा, रेचनी
हिन्दी – निशोथ
रासायनिक संघटन – इसकी मूलत्वक् में एक ग्लाइकोसाइडयम राल 10% तक होती है जो भूरे-पीले रंग की, निर्गन्ध तथा तिक्तकटुरस है। इसमें टर्पेथिन (Turpethin) नामक एक ग्लुकोसाइड होता है जिसके कारण रेचन की क्रिया होती है। इसके अतिरिक्त दो और ग्लाइकोसाइड, उड़नशील तैल, पीत रंजक द्रव्य होते हैं। यह राल विदेशी जालप (Exogonium purga) की राल के समान कार्यकारी होता है और उसका उत्तम प्रतिनिधि है। लेखन कर्म के कारण यह त्वचा रोगों में उपयोगी है।
 

रुई आक (अर्क)

लैटिन नाम – कैलोटॉपिस प्रोसरा (Calotropis procera)
संस्कृत – अर्क, तूलफल, क्षीरपर्ण, अर्कपर्ण, विकीरण, आस्फोट, 
हिन्दी – अकवन 
रासायनिक संघटन – इसके दूध में ट्रिप्सिन (प्रोटीन-पाचक) नामक किण्वतत्व तथा हृदय पर कार्य करने वाले तत्व-उस्कैरिन (Uscherin), कैलोट्रोपिन (Calotropin) तथा कैलो टोक्सिन (Calotoxin) होते है। राजार्क में भी प्रायः ये ही तत्व होते है। काण्ड तथा मूल की त्वक् में एमाईरिन (Amyrin), जाइगेण्टिआल (Giganteol) तथा कैलोट्रोपिओल होते है।
 रूई आक की जड़ की छाल 4 सेर लेकर एक मिट्टी के बर्तन में डाल दे। फिर पाव भर गेहूं एक सफेद कपड़े में बांधकर उसी बर्तन का मुंह बन्द करके 15 दिन तक घोड़े की लीद में गाड दे। उसके पश्चात उस बर्तन को निकालकर, अगर उसमें कुछ पानी शेष हो तो आग पर रखकर उस पानी को सुखा लें। फिर उस हाण्डी में से गेहूं की पोटली को निकाल लें। इन गेहूं को पीसकर इनकी 61 गोलियां बना लें। इसमें से 1 गोली प्रतिदिन खाने से तथा पथ्य में नमक छोड़कर केवल गेहूं की रोटी और घी खाने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
 यह वेदनास्थापन, शोथहर, स्वेदजनन, व्रणशोधन, कुष्ठघ्न और जन्तुघ्न है।
 

खदिर

लैटिन नाम – एकेशिया कैटेचु (Acacia Catechu) |
संस्कृत – खदिर, रक्तसार, दन्तधावन, कण्टकी, बालपत्र, यज्ञिय
रासायनिक संघटन – खदिर के सारभाग से लगभग 3-10 प्रतिशत कत्था प्राप्त होता है। खदिर के सारभाग में कैटेचिन (Catechu) तथा कैटेचुटैनिक एसिड (Catechu tannic acid) क्रमशः 4-7 प्रतिशत और 50 प्रतिशत होते है। पुराने वृक्षों के कोटरों में एक स्वतः निर्मित्त निर्यास सफेद चूर्ण या स्फटिक के रूप में कभी-कभी प्राप्त होता है इसे खीरसाल (खदिरासार) कहते है। सामान्यतः सारभाग को जल में उबालकर कत्था प्राप्त करते हैं। यह उत्तम रक्तस्तम्भन एवं श्लेष्मलकला संकोचक है, अतः रक्तस्त्राव को बन्द करने के लिए इसका अवचूर्णन करते है। दन्त रोगों में मंजन के रूप में तथा व्रणों में भी प्रयुक्त है। स्वरभेद तथा कास में इसके क्वाथ का गण्डूष धारण करते है। श्वित्र में भी इसका लेप करते है। कुष्ठ के रोगियों को इसके क्वाथ से स्नान कराते है। इस प्रकार कुष्ठ, कण्डू आदि समस्त चर्मरोगों में खदिर उपयोगी है।
 

हरिद्रा

नाम – कर्कुमा लौंगा (Curcuma Longa)
संस्कृत – हरिद्रा, कांचनी, निशा, वरवर्णिनी, गौरी, मिघ्ना, योशित्प्रिया, हट्टविलासिनी
हिन्दी – हल्दी, हरदी।
रासायनिक संघटन – इसमें उडनशील तैल 5-8 प्रतिशत, कर्कुमीन (Curcumin) नामक पीतरन्जक द्रव होते हैं। इनके अतिरिक्त विटामिन ए, प्रोटिन 6. 3%, स्नेहद्रव्य 5.1%, खनिज द्रव्य 3.5% तथा कार्बोहाइड्रेट 69.4 प्रतिशत होता है।
शोथ – वेदनायुक्त विकारों में विशेषतः आघात लगने पर इसका लेप करते हैं। कुष्ठ, कण्डू आदि त्वग्दोषों में इसे लगाते हैं। वर्ण को सुधारने के लिए उबटन में भी प्रयुक्त होता है। व्रणों के पाचनार्थ इसकी पुल्टिस लगाते हैं तथा शोधन एवं रोपण के लिए इसका चूर्ण या मलहम लगाते हैं। नेत्राभिष्यन्द में इसका आश्चोतन तथा विडालक देते हैं। यकृत्प्लीहा की वृद्धि होने पर इसका लेप यकृत्प्लीहा के प्रदेश में करते हैं। अर्श में भी इसका लेप लगाते हैं। हल्दी के टुकड़े या चूर्ण को अंगारो पर रखने से जो धूम निकलता है वह मूर्च्छा, श्वास एवं हिक्का रोगों में प्रयुक्त होता है। इस धूम से वृश्चिकदंश (बिच्छु काटना) की वेदना भी शांत होती हैं। इस प्रकार कुष्ठ, कंडू, उदर्द आदि विकारों में इसका प्रयोग करते हैं।
 

भल्लातक

लैटिन नाम – सेमीकार्पस एनाकार्डियम (Semecarpus anacardium).
संस्कृत – भल्लातक, अरूश्कर, अग्निक, शोफत,
हिन्दी – अग्निमुख, भिलावा
रासायनिक संघटन – इसके फल में एक स्फोटजनक तैल 32 प्रतिशत रहता है जो ईथर में विलेय है तथा वायु के संपर्क से कृष्णवर्ण हो जाता है। फल की मज्जा में एक मधुर तैल अल्पमात्रा में रहता है। भल्लातक के विस्फोटजनक स्वरस (तैल) में फेनोल के यौगिक पाये जाते हैं। इनमें भिलावनेंल (Bhilawanol) तथा सेमिकार्पोल (Semecarpol) मुख्य हैं। 
सर्पदंश में चीरे लगाकर इसका लेप करते हैं। अर्शरोग में इसकी धूनी देने से अंकुर सूखकर गिर जाते है। योनि पर लेप करने से यह गर्भस्त्रावक होता हैं। कुष्ठ, श्वित्र, वातरक्त आदि त्वचा के विकारों में यह अतिशय उपयोगी हैं।
 

आरग्वध

लैटिन नाम – कैसिया फिस्टुला (Cassia fistula).
संस्कृत – आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरंगुल, आरेवत, व्याधिघात, तमाल, सुवर्णक, दीर्घफल, स्वर्णभूषण,
हिन्दी – अमलतास, सियरलाठी
रासायनिक संघटन – इसकी फलमज्जा में ऐन्थाक्विनोन, शर्करा 60%, पिच्छिलद्रव्य, ग्लूटीन, पेक्टिन, रंजक द्रव्य, कैलशियम ऑक्जलेट, क्षार, निर्यास एवं जल होते हैं। काण्डत्वक में 10-20% टेनिन होता है। मूलत्वक् में इसके अतिरिक्त फ्लीवेफिन तथा ऐन्थाक्विनोन होते है। पत्र और पुष्प में ग्लाइकोसाइड पाये जाते हैं।
व्रणशोथ, ग्रन्थिशोथ, वातरक्त, आमवात, संधिवात आदि शोथ-वेदनायुक्त रोगों में फलमज्जा और पत्र का लेप करते हैं। मुख तथा गले के रोगों में इसके क्वाथ से कुल्ला कराते हैं। कुष्ठ एवं कण्डू में इसके पत्र का लेप एवं उद्वर्तन करते हैं। कुष्ठ एवं दाह में इसका सेवन कराते हैं।
 

तुवरक

नाम – हिडनोकार्पस लॉरिफोलिया (Hydnocarpus laurifolia).
संस्कृत – तुवरक, कटुकपित्थ, कुष्ठवैरी
हिन्दी – चालमोगरा, पपीता
रासायनिक संघटन – बीजों में 63.25 प्रतिशत स्थिर तैल होता है जिसमें चालमोगरिक एसिड (Chaulmugric acid). हिडनो कार्पिक एसिड (Hydinocarpic acid), पामिटिक एसिड (Palmitic acid), आदि होते हैं। तुवरक तैल पीताभ या भूरा पीला तथा स्वाद में कटु होता है। इसमें एक विशिष्ट गंध भी होती हैं। यह Hydnocarpus oil के नाम से निर्धारित हैं।
 कुष्ठ, कण्डू आदि चर्मरोगों की यह रामबाण औषधी मानी जाती है। इन रोगों में इसका तैल लगाते है। व्रणों में विशेषतः क्षयजन्तुओं से उत्पन्न, गंडमाला, नाडीव्रण, अस्थिव्रण आदि में यह तैल लगाया जाता हैं। आमवात, वातरक्त आदि वेदनायुक्त रोगों में भी यह लगाते हैं। फलमज्जा की अन्तर्धूम भस्म का अंजन नेत्ररोगों में लेखन कर्म के लिए लगाते है। कुष्ठ, कण्डू (खुजली) आदि चर्मविकारों में इसके तैल और चूर्ण का सेवन कराते हैं।
 

बाकुची

लैटिन नाम – सोरेलिया कौरिलीफोलिया (Psoralia corylifolia)
संस्कृत – बाकुची, अवल्गुज, कृष्णफला, पूतिफली, कुष्ठघ्नी, हिन्दी बाकची बावची
रासायनिक संघटन – इसमें एक उड़नशील तैल 0.05 प्रतिशत, एक भूरा स्थिर तैल 10 प्रतिशत पाया जाता हैं। इसके अतिरिक्त Bakuchiol नामक एक फेनोल, कुमारिन यौगिक – Psoralen, isopsoralen, Psorelidin, isopsoralidin और Corylifolin पाये जाते हैं। बीजों का स्थिर तैल गाढ़ा तथा तीता होता हैं और रखने पर सोरेलिन जम जाता हैं।
महाकुष्ठ, क्षुद्रकुष्ठ, श्वित्र तथा खालित्य (गंजापन) में इसका लेप किया जाता है और इसका तैल भी लगाया जाता है। व्रणों में इसके चूर्ण या तैल का प्रयोग करते है। यह कुष्ठ, श्वित्र तथा सभी चर्मरोगों में प्रयुक्त होता है। तैल का इतना ही प्रयोग हो जिससे उस क्षेत्र में लालिमा हो जाय किन्तु फोड़े न निकले।
बावची के बीज 25 तोला, पंवार के बीज 5 तोला, सफेद चिरमी के बीज 2 तोला, काली मिरची 2 तोला, मसिल 3 तोला, हरताल 4 तोला ओर चित्रक की जड़ की ताजी छाल 2 तोला। इन सब चीजों को कूटकर आतशी शीशी में भरकर बालुका गर्भ यन्त्र से मंदाग्नि के द्वारा तेल निकालना चाहिए। इस तेल को नियमित रूप से लगाने से श्वेत कुष्ठ, दाद, छाजन इत्यादि रोग नष्ट होते हैं।
 

जाती (चमेली)

लैटिन नाम – जैस्मिनम ऑफिसिनेल (Jasminum officinale)
संस्कृत – जाती, सौमनस्यायनी, सुमना, चेतिका, हृद्यगन्धा
हिन्दी – चमेली
रासायनिक संघटन – इसके पत्र में राल, वेतसाम्ल (Salicylic acid), जैस्मिनीन (Jasminine), नामक क्षाराभऔर कुछ कषायद्रव्य होते हैं।
चमेली का मूल उबटन में मिला कर या अकेले लगाते हैं। इससे वर्ण सुधरता है। दन्तशूल और दन्तदौर्बल्य में चमेली की पत्तियाँ चबाते हैं। मुखरोगों (छाले) में पत्र का क्वाथ बना कर कुल्ला करते हैं। सिरदर्द तथा अन्य शूलों में मूल के क्वाथ का परिषेक या लेप किया जाता है। पक्षाघात, अर्दित आदि वात विकारों में इसके मूल का लेप करते हैं या तैल का अभ्यंग करते हैं। शिरःशूल तथा मानसिक दौर्बल्य, भ्रम, मूर्च्छा आदि में शिर पर इसका तैल मलते हैं। ध्वजभंग में इसकी जड़ का लेप शिश्न पर किया जाता है। कंडू, कुष्ठ, आदि त्वग्दोषों में पुष्प एवं पत्र का लेप त्वचा पर करते हैं। कर्णशूल, कर्णपूय आदि में पत्र से सिद्ध तैल कान में डालते है। नेत्ररोगों में पुष्पों का लेप करते हैं और उसका स्वरस नेत्रों में डालते हैं। मुत्राघात एवं रजोरोध में पत्र और पुष्प का लेप बस्तिप्रदेश में करते हैं। व्रणों के शोधन एवं रोपण के लिए इसके पत्र का क्वाथ तथा तत्सिद्ध तैल लगाते है। कुष्ठ में इसके मूल का क्वाथ देते है।
 

मदयन्तिका (मेंहदी)

लैटिननाम – लॉसोनिया इनर्मिस (Lawsonia inermis)
संस्कृत – मदयन्तिका  
हिन्दी – मेंहदी
रासायनिक संघटन – मेंहदी की पत्तियों में टेनिन 10.21% तथा लॉसोन (Lawsone) नामक मुख्य रंजक द्रव्य होता है। इनके अतिरिक्त गैलिक एसिड, ग्लुकोज, मैनिटोल, वसा, राल, म्युसिलेज तथा एक क्षाराभ होता है। इससे एक सुगन्धित तैल भी गाढ़े भूरे रंग का प्राप्त किया जाता है।
शिरःशूल, संधिशोथ तथा हाथ पैर की जलन में पत्तियों का लेप करते है। वर्ण को सुन्दर बनाने के लिए तथा रंगने के लिए स्त्रियां इसका प्रयोग करती हैं। शोथ, क्षत एवं व्रणों में इसका प्रयोग करते हैं। इससे शोथ (सूजन) कम होती है, रक्तबन्द होता है। वेदना शान्त तथा व्रण का शोधन और रोपण होता है। कुष्ठ आदि चर्मविकारों में पत्तियों का प्रलेप लाभकर है। मुख तथा गले के रोगों में इसके क्वाथ से कुल्ला करते हैं। बालों को काला करने के लिए नीलिका के साथ इसका लेप करते हैं। कुष्ठ, उपदंश आदि में पत्तियों का क्वाथ देते हैं।
 

सैरेयक

लैटिन नाम – बार्लेरिया प्रायोनाइटिस (Barleria prionitis) 
संस्कृत – सैरेयक, सहचर, झिण्टी, हिन्दी- कटसरैया
कटसरैया, पियाबासा कुष्ठ और कंडू में इसके पत्र का लेप करते हैं। शोथ, विद्रधि, गंडमाला आदि में भी पत्र का लेप करते हैं। इससे सिद्ध तैल व्रणों में लगाते हैं। पत्र स्वरस दाँतों में लगाने से दन्तशूल दूर होता है। पत्रस्वरस से सिद्ध तैल पालित्य (बाल सफेद होना) रोग में लगाते है। कुष्ठ, कण्डू आदि चर्मरोगों में यह अतीव लाभकार है।
 

बकायन

लैटिन नाम – मेलिया एजेडरैक (Melia Azedarach)
संस्कृत – महानिम्ब, रम्यक, द्रेक  
हिन्दी –  बकायन
इसकी आंतारिक त्वक में क्रियाशील तत्व होता हैं बाझ्य त्वक में शर्करा और टैनिन होता है। छाल में एज्वारिडिन तथा पैरोसिन नामक क्षाराभ भी होते हैं। फल के बाह्य अंश में बकायनिन नामक एक तिक्त पदार्थ होता है। इसके अतिरिक्त फल में एजरिडिन एक भुरा रालीय पदार्थ, एक अम्लीय पदार्थ, स्टिरॉल, टेनिन, ग्लूकोज तथा स्टार्च होते हैं। बीजों से 40% एक तैल निकलता है। छाल से एक गोंद भी नीम के समान निकलती है।
यह रक्तशोधक, कुष्ठघ्न, व्रणशोधन, व्रणरोपण, वेदनास्थापन तथा जंतुघ्न है। यह सभी प्रकार के चर्मविकारों में लाभकारी है। यह कीड़ों को भी दूर भगाता है।
 

कचनार

लैटिन नाम – बॉहिनिया वेरीगेटा (Buhinia variegata)
संस्कृत – काचनार, गण्डारि, चमरिक, युगपत्रक, कर्बुदार, स्वल्पकेसरी 
हिन्दी – कचनार
रायानिक संघटन – इसकी छाल में टैनिन (कषायद्रव्य), शर्करा और भूरे रंग की गाँद होती है। बीजों से 16.5% एक पीतवर्ण तैल निकलता है। यह व्रणशोधन, व्रणरोपण, कुष्ठघ्न एवं शोथहर है। अतः इसे कुष्ठ रोगों में दिया जाता है।
इसके क्वाथ से व्रणों एवं चर्मरोगों का प्रक्षालन करते हैं। गंडमाला में इसकी छाल का लेप करते हैं। इसकी छाल, बबूल की फली और अनार के फूलों का क्वाथ बनाकर लालाप्रसेक (लार ज्यादा आना) और मुखपाक में गण्डूष कराते हैं। गुदभ्रंश में इसके क्वाथ में परिषेक करते है। यह कुष्ठरोग में दिया जाता है।
 

लालचंदन

लैटिन नाम – टेरोकार्पस सैण्टेलिनस् (Pterocarpus santlinus)
संस्कृत – रक्तचंदन, हिन्दी लालचंदन
रासायनिक संघटन – इसमें एक लाल रंजक पदार्थ सैण्टलिन, टेरो कार्पिन, टेरोस्टिलबिन तथा होमो टेराकार्पिन होते है। यह कुष्ठघ्न है इसलिए इसे कुष्ठ रोग में देते हैं।
 

नीम

लैटिन नाम – एजाडिरेक्टा इण्डिका (Azadirachta indica)
संस्कृत – निम्ब, पिचुमर्द, अरिष्ट, हिंगुनिर्यास
हिन्दी – नीम
रासायनिक संघटन – छाल में Nimbin (0.04%), Nimbinin (0.001%). Nimbidin (0.4%), Nimbosterol (0.03%), उड़न शील तेल (0.02%), टेनिन (6%) और मार्गोसिन नामक एक तिक्त घटक होता है। बीजतैल में गन्धक के अतिरिक्त एक क्षाराभ, राल, तिक्त घटक होता है। बीजतैल में गन्धक के अतिरिक्त एक क्षाराभ, राल, ग्लाइकोसाइड तथा वसाम्ल होते है। निम्बनीरा में स्वतन्त्र एमिनोएसिड होते हैं। निम्ब के सारभाग में टेनिन, कैलशियम, पोटेशियम तथा लौह के लवण पाये जाते है। बीजों में 45% स्थिर तैल होता है।
त्वचा रोगियों के लिये प्रकृति ने विशेष रूप से नीम उत्पन्न किया है। रोगी को 12 मास नीम के पेड़ के नीचे रहना चाहिए। प्रातः काल 1 घंटाक नीम की पत्तियों का स्वरस पीना और भोजन के बाद दोनों समय 5-5 तोला नीम का मद पीने से बहुत लाभ होता है। कुष्ठ से पीड़ित रोगियों की शय्या पर नित्य नीम की ताजी पत्तियां बिछानी चाहिये। नीम के फूल, फल और पत्तियों को बराबर-बराबर लेकर खूब महीन पीस ले और शरबत की तरह पानी में घोलकर पीना आरम्भ करे। पहले 2 माशे से लेना शुरू करें और बढ़ाते-बढ़ाते 6 माशे तक बढ़ाकर 40 दिन सेवन कुष्ठ में लाभ होता है।
इसका पत्र एवं त्वक् जन्तुघ्न, व्रणपाचन, व्रणशोधन, पूतिहर, दाहप्रशमन एवं कण्डूघ्न है। बीजों का तैल-व्रणरोपण, कुष्ठघ्न एवं वेदना स्थापन है। तिक्त होने से कुष्ठघ्न एवं शीत होने से दाहप्रशमन है।
 

करंज

लैटिन नाम – पाँगेमिया पिनेटा (Pongamia pinnata)
संस्कृत – करंज, नक्तमाल, गुच्छपुष्पक, घृतपूर, स्निग्धपत्र
हिन्दी – डिठौरी, करूअइनी
रासायनिक संघटन – बीजों में तिक्त और गाढ़े रंग का तैल (करंज तैल- Pongamia oil) 27-39 प्रतिशत होता है। इसमें करंजीन (Karanjin) नामक सक्रिय तत्व होता है। जिसकी मुख्यतः जन्तुघ्न क्रिया होती है। पौंगेमाल (Pongamol) भी इसमें मिलता है। मूलत्वक में कनुगिन (Kanugin) तथा डिमोथोक्सि कुनुगिन (Demethoxy-Kanugin) नामक दो तत्व होते हैं। पुष्प में पौंगेमिन (Pongamin), क्वर्सिटिन (Quercitin) आदि तत्व होते है।
इसकी छाल और पत्र जन्तुघ्न, कण्डूघ्न एवं शोथहर है। बीजों का तैल कृमिनाशक, व्रणरोपण एवं वेदनास्थापन है। इसका चूर्ण शिरो विरेचन है। यह कुष्ठघ्न है। करंज को चित्रक के पत्ते, काली मिर्च और नमक के साथ मिलाकर दही के साथ चाटने से त्वचा रोग में लाभ होता है।
 

तुलसी

लैटिन नाम – ऑसिमम सैक्टम (Ocimum sanctum)
संस्कृत – तुलसी, सुरसा, अपेतराक्षसी, भूतघ्नी, बहुमंजरी, देवदुन्दुभि, हिन्दी- सुलभा, ग्राम्या
रासायनिक संघटन – इसकी पत्तियों तथा पुष्पमंजरी से एक लवंगगन्धि उड़नशील तैल (0.1-0.23%) प्राप्त होता है। इसमें फीनोल 45-76% तथा अल्डीहाइड 15-25% होता है। बीजों से एक स्थिर तैल 17.8% निकलता है। इनके अतिरिक्त पौधे में क्षाराम, ग्लोइकोसाइड और टेनिन होते हैं। पत्तियों में ऐस्कार्बिक एसिड और कैरोटिन होते है।
यह जन्तुघ्न, वेदनाहर, शोथहर, त्वग्दोषहर तथा शिरोविरेचन है। यह त्वग्दोषहर है। तुलसी के पत्तों को खायें और त्वचा पर मलें तो अवश्य आराम होता है।
 

अंकोल

लैटिन नाम – एलेजियम सल्विफोलियम (Alangium salvifolium)
संस्कृत – अंकोल, अंकोट, दीर्घकील, ताम्रफल, गुप्तस्नेह, हिन्दी अंकोल
रासायनिक संघटन – इसकी छाल में एलेजीन (Alangine) नामक एक तिक्त 0.8% पाया जाता है।
इस वृक्ष के जड़ की छाल, जायफल, जावित्री और लौंग, प्रत्येक 5-5 रत्ती लेकर चूर्ण करके देने से कोढ बढ़ना बन्द हो जाता है। इसी प्रकार बढ़िया हरताल को अंकोल के तेल में घोंटकर टिकडी बनाकर एक हाँडी की राख भर कर उस पर वह टिकडी रखकर उपर से फिर राख भर कर 12 प्रहर को आंच देने से भी भस्म होती है। वह भस्म कुष्ठ के असाध्य दर्दो में लाभ पहुंचाती है।
वेदनाप्रधान रोगों तथा व्रण में इसका तैल लगाते हैं और चूहे, साँप, कुत्ते आदि के काटने पर दंशस्थान पर छाल का लेप करते हैं। इससे विष दूर हो जाता है और पीड़ा शोथ आदि शान्त हो जाते है। कुष्ठ, विसर्प, फिरंग आदि त्वग्दोषों में इसका प्रयोग करते है।
 

अन्य वनौषधिया

त्वचा रोग में उपयोगी वनौषधियों का वर्णन संक्षिप्त रूप में निम्नलिखित है।
सरपुंखा (शरपुंखा) – इस वनस्पति के पत्तों का रस पीने से गलित त्वचा में लाभ होता है।
कटहल (फणस) – पका फल त्वचा रोग में उपयोगी माने जाते हैं।
दारूहल्दी – दारूहल्दी के कल्क को गोमूत्र के साथ घोलकर पीने से कुष्ठ का नाश होता है।
हरीतकी – सोंठ, मरिच, पीपल, गुड़, तिल तैल के साथ हरीतकी का एक मास तक सेवन कराने से त्वचा रोग का नाश होता है।
इन्द्रायण – यह वनस्पति कड़वी, चरपरी, शीतल रेचक तथा त्वचा रोग में उपयुक्त होती है।
काली जीरी – काली जीरी में आंवला और खैरसार के क्वाथ दिये जाने से त्वचा रोग में आराम पड़ता है।
गोरखमुण्डी – 1 भाग मुण्डी और आधा शीशी समुद्रशोथ का चूर्ण बनाकर 2 माशे से 9 माशे तक की मात्रा में लेने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
जटामांसी – इस वनस्पति को खिलाने से और जख्म पर इसका लेप करने से दाह और पीडा कम होती है और कुष्ठ रोग दूर होकर त्वचा की कांति सुधारती है।
 

बाह्य प्रयोग

लेप, प्रदेह और तैल, कुष्ठ नाशक उपयुक्त औषधि
केला – केले का खार और हल्दी का लेप करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
अंजीर – श्वेत कुष्ठ के आरम्भ में ही अंजीर के पत्तों का रस लगाने से उसका बढ़ना बन्द होकर आराम होने लगता है।
गुंजा – सफेद कुष्ठ में इन बीजों को चित्रक की जड़ के साथ लेप किया जाता है।
चित्रक – मण्डल कुष्ठ (सोरिएसिस) में चित्रक का लेप या मालिश करने पर मण्डल कुष्ठ में लाभ होता है।
चित्रक की छाल को दूध या जल के साथ पीसकर कुष्ठ और दूसरे प्रकार के त्वचा रोगों पर करना चाहिए अथवा इन्हीं चीजों के साथ पीसकर, पुल्टिस बनाकर तब तक बंधा रखना चाहिए जब तक कि छाला उठ न जाए। छाला उठने पर उसको खोल लेना चाहिए। इस छाले के आराम होने पर श्वेत कुष्ठ के दाग मिट जाते हैं।
सफेद कनेर – सफेद कनेर की जड़, कुटजफल, करंज के फल, दारूहल्दी की छाल और चमेली की नयी पत्तियों का लेप कुष्ठ नाशन के लिये सुप्रसिद्ध है।
शिरीष की छाल शिरीष की छाल, कपास के फूल, अमलतास की पत्तियों, काकमाची की पत्तियों इनको अलग-अलग पीसकर बनाये गये 4 प्रकार के लेप कुष्ठ नाशक होते हैं।
 

तैल का प्रयोग

1. ज्योतिष्मति – श्वेत कुष्ठ में ज्योतिष्मति को 21 दिन तक गौमूत्र से भिगोकर उसका तेल निकालकर लगाने से श्वेत कुष्ठ मिटता है।
2. काजू – इसके छिलके से एक प्रकार का तैल प्राप्त किया जाता है। जो दाहक होता है और शरीर पर लगाने पर पीलापन पैदा कर देता है। इसे कुष्ठ और चर्मरोग में प्रयोग लाते हैं। इस तैल का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए।
3. चालमोगरा – चालमोगरा का तैल चर्मरोग के लिए एक रामबाण औषधि है। अगर इसका विधिपूर्वक उपयोग किया जाये तो कुष्ठ के समान भयंकर रोग भी दूर हो जाते हैं।
4. कलौंजी – कलौंजी 5 तोले, दारूहल्दी की जड़ 5 तोले, गन्धक 2 तोले, नारियल का तैल 500 ग्राम, इन सब चीजों को कूट पीसकर बोतल में डालकर कार्क लगा कर 7 दिन तक धूप में रखा रहने दें और दिन में 2 बार हिला दिया करें, इस तैल की मालिश करने से कुष्ठ आदि चर्मरोग मिटते हैं।
5. नीम तैल – नीम के बीजों के तेल की मालिश करने से कुष्ठ और त्वचा के सभी रोग अच्छे होते हैं।
इस प्रकार शास्त्रों में अनेक वनौषधियों का वर्णन है जो मिन्न-भिन्न त्वचा रोग में उपयोगी है। रोगानुसार इन औषधियों का सावधानी पूर्वक प्रयोग किया जाए तो निश्चित ही स्वस्थ, सुंदर व तेजोमय त्वचा हो सकती है।
 
स्वास्थ्य वाटिका डेस्क

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