इसकी आंतारिक त्वक में क्रियाशील तत्व होता हैं बाझ्य त्वक में शर्करा और टैनिन होता है। छाल में एज्वारिडिन तथा पैरोसिन नामक क्षाराभ भी होते हैं। फल के बाह्य अंश में बकायनिन नामक एक तिक्त पदार्थ होता है। इसके अतिरिक्त फल में एजरिडिन एक भुरा रालीय पदार्थ, एक अम्लीय पदार्थ, स्टिरॉल, टेनिन, ग्लूकोज तथा स्टार्च होते हैं। बीजों से 40% एक तैल निकलता है। छाल से एक गोंद भी नीम के समान निकलती है।
यह रक्तशोधक, कुष्ठघ्न, व्रणशोधन, व्रणरोपण, वेदनास्थापन तथा जंतुघ्न है। यह सभी प्रकार के चर्मविकारों में लाभकारी है। यह कीड़ों को भी दूर भगाता है।
कचनार
लैटिन नाम – बॉहिनिया वेरीगेटा (Buhinia variegata)
संस्कृत – काचनार, गण्डारि, चमरिक, युगपत्रक, कर्बुदार, स्वल्पकेसरी
हिन्दी – कचनार
रायानिक संघटन – इसकी छाल में टैनिन (कषायद्रव्य), शर्करा और भूरे रंग की गाँद होती है। बीजों से 16.5% एक पीतवर्ण तैल निकलता है। यह व्रणशोधन, व्रणरोपण, कुष्ठघ्न एवं शोथहर है। अतः इसे कुष्ठ रोगों में दिया जाता है।
इसके क्वाथ से व्रणों एवं चर्मरोगों का प्रक्षालन करते हैं। गंडमाला में इसकी छाल का लेप करते हैं। इसकी छाल, बबूल की फली और अनार के फूलों का क्वाथ बनाकर लालाप्रसेक (लार ज्यादा आना) और मुखपाक में गण्डूष कराते हैं। गुदभ्रंश में इसके क्वाथ में परिषेक करते है। यह कुष्ठरोग में दिया जाता है।
नीम
लैटिन नाम – एजाडिरेक्टा इण्डिका (Azadirachta indica)
संस्कृत – निम्ब, पिचुमर्द, अरिष्ट, हिंगुनिर्यास
हिन्दी – नीम
रासायनिक संघटन – छाल में Nimbin (0.04%), Nimbinin (0.001%). Nimbidin (0.4%), Nimbosterol (0.03%), उड़न शील तेल (0.02%), टेनिन (6%) और मार्गोसिन नामक एक तिक्त घटक होता है। बीजतैल में गन्धक के अतिरिक्त एक क्षाराभ, राल, तिक्त घटक होता है। बीजतैल में गन्धक के अतिरिक्त एक क्षाराभ, राल, ग्लाइकोसाइड तथा वसाम्ल होते है। निम्बनीरा में स्वतन्त्र एमिनोएसिड होते हैं। निम्ब के सारभाग में टेनिन, कैलशियम, पोटेशियम तथा लौह के लवण पाये जाते है। बीजों में 45% स्थिर तैल होता है।
त्वचा रोगियों के लिये प्रकृति ने विशेष रूप से नीम उत्पन्न किया है। रोगी को 12 मास नीम के पेड़ के नीचे रहना चाहिए। प्रातः काल 1 घंटाक नीम की पत्तियों का स्वरस पीना और भोजन के बाद दोनों समय 5-5 तोला नीम का मद पीने से बहुत लाभ होता है। कुष्ठ से पीड़ित रोगियों की शय्या पर नित्य नीम की ताजी पत्तियां बिछानी चाहिये। नीम के फूल, फल और पत्तियों को बराबर-बराबर लेकर खूब महीन पीस ले और शरबत की तरह पानी में घोलकर पीना आरम्भ करे। पहले 2 माशे से लेना शुरू करें और बढ़ाते-बढ़ाते 6 माशे तक बढ़ाकर 40 दिन सेवन कुष्ठ में लाभ होता है।
इसका पत्र एवं त्वक् जन्तुघ्न, व्रणपाचन, व्रणशोधन, पूतिहर, दाहप्रशमन एवं कण्डूघ्न है। बीजों का तैल-व्रणरोपण, कुष्ठघ्न एवं वेदना स्थापन है। तिक्त होने से कुष्ठघ्न एवं शीत होने से दाहप्रशमन है।
करंज
लैटिन नाम – पाँगेमिया पिनेटा (Pongamia pinnata)
संस्कृत – करंज, नक्तमाल, गुच्छपुष्पक, घृतपूर, स्निग्धपत्र
हिन्दी – डिठौरी, करूअइनी
रासायनिक संघटन – बीजों में तिक्त और गाढ़े रंग का तैल (करंज तैल- Pongamia oil) 27-39 प्रतिशत होता है। इसमें करंजीन (Karanjin) नामक सक्रिय तत्व होता है। जिसकी मुख्यतः जन्तुघ्न क्रिया होती है। पौंगेमाल (Pongamol) भी इसमें मिलता है। मूलत्वक में कनुगिन (Kanugin) तथा डिमोथोक्सि कुनुगिन (Demethoxy-Kanugin) नामक दो तत्व होते हैं। पुष्प में पौंगेमिन (Pongamin), क्वर्सिटिन (Quercitin) आदि तत्व होते है।
इसकी छाल और पत्र जन्तुघ्न, कण्डूघ्न एवं शोथहर है। बीजों का तैल कृमिनाशक, व्रणरोपण एवं वेदनास्थापन है। इसका चूर्ण शिरो विरेचन है। यह कुष्ठघ्न है। करंज को चित्रक के पत्ते, काली मिर्च और नमक के साथ मिलाकर दही के साथ चाटने से त्वचा रोग में लाभ होता है।
तुलसी
लैटिन नाम – ऑसिमम सैक्टम (Ocimum sanctum)
संस्कृत – तुलसी, सुरसा, अपेतराक्षसी, भूतघ्नी, बहुमंजरी, देवदुन्दुभि, हिन्दी- सुलभा, ग्राम्या
रासायनिक संघटन – इसकी पत्तियों तथा पुष्पमंजरी से एक लवंगगन्धि उड़नशील तैल (0.1-0.23%) प्राप्त होता है। इसमें फीनोल 45-76% तथा अल्डीहाइड 15-25% होता है। बीजों से एक स्थिर तैल 17.8% निकलता है। इनके अतिरिक्त पौधे में क्षाराम, ग्लोइकोसाइड और टेनिन होते हैं। पत्तियों में ऐस्कार्बिक एसिड और कैरोटिन होते है।
यह जन्तुघ्न, वेदनाहर, शोथहर, त्वग्दोषहर तथा शिरोविरेचन है। यह त्वग्दोषहर है। तुलसी के पत्तों को खायें और त्वचा पर मलें तो अवश्य आराम होता है।
अंकोल
लैटिन नाम – एलेजियम सल्विफोलियम (Alangium salvifolium)
संस्कृत – अंकोल, अंकोट, दीर्घकील, ताम्रफल, गुप्तस्नेह, हिन्दी अंकोल
रासायनिक संघटन – इसकी छाल में एलेजीन (Alangine) नामक एक तिक्त 0.8% पाया जाता है।
इस वृक्ष के जड़ की छाल, जायफल, जावित्री और लौंग, प्रत्येक 5-5 रत्ती लेकर चूर्ण करके देने से कोढ बढ़ना बन्द हो जाता है। इसी प्रकार बढ़िया हरताल को अंकोल के तेल में घोंटकर टिकडी बनाकर एक हाँडी की राख भर कर उस पर वह टिकडी रखकर उपर से फिर राख भर कर 12 प्रहर को आंच देने से भी भस्म होती है। वह भस्म कुष्ठ के असाध्य दर्दो में लाभ पहुंचाती है।
वेदनाप्रधान रोगों तथा व्रण में इसका तैल लगाते हैं और चूहे, साँप, कुत्ते आदि के काटने पर दंशस्थान पर छाल का लेप करते हैं। इससे विष दूर हो जाता है और पीड़ा शोथ आदि शान्त हो जाते है। कुष्ठ, विसर्प, फिरंग आदि त्वग्दोषों में इसका प्रयोग करते है।
अन्य वनौषधिया
त्वचा रोग में उपयोगी वनौषधियों का वर्णन संक्षिप्त रूप में निम्नलिखित है।
सरपुंखा (शरपुंखा) – इस वनस्पति के पत्तों का रस पीने से गलित त्वचा में लाभ होता है।
कटहल (फणस) – पका फल त्वचा रोग में उपयोगी माने जाते हैं।
दारूहल्दी – दारूहल्दी के कल्क को गोमूत्र के साथ घोलकर पीने से कुष्ठ का नाश होता है।
हरीतकी – सोंठ, मरिच, पीपल, गुड़, तिल तैल के साथ हरीतकी का एक मास तक सेवन कराने से त्वचा रोग का नाश होता है।
इन्द्रायण – यह वनस्पति कड़वी, चरपरी, शीतल रेचक तथा त्वचा रोग में उपयुक्त होती है।
काली जीरी – काली जीरी में आंवला और खैरसार के क्वाथ दिये जाने से त्वचा रोग में आराम पड़ता है।
गोरखमुण्डी – 1 भाग मुण्डी और आधा शीशी समुद्रशोथ का चूर्ण बनाकर 2 माशे से 9 माशे तक की मात्रा में लेने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
जटामांसी – इस वनस्पति को खिलाने से और जख्म पर इसका लेप करने से दाह और पीडा कम होती है और कुष्ठ रोग दूर होकर त्वचा की कांति सुधारती है।
बाह्य प्रयोग
लेप, प्रदेह और तैल, कुष्ठ नाशक उपयुक्त औषधि
केला – केले का खार और हल्दी का लेप करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
अंजीर – श्वेत कुष्ठ के आरम्भ में ही अंजीर के पत्तों का रस लगाने से उसका बढ़ना बन्द होकर आराम होने लगता है।
गुंजा – सफेद कुष्ठ में इन बीजों को चित्रक की जड़ के साथ लेप किया जाता है।
चित्रक – मण्डल कुष्ठ (सोरिएसिस) में चित्रक का लेप या मालिश करने पर मण्डल कुष्ठ में लाभ होता है।
चित्रक की छाल को दूध या जल के साथ पीसकर कुष्ठ और दूसरे प्रकार के त्वचा रोगों पर करना चाहिए अथवा इन्हीं चीजों के साथ पीसकर, पुल्टिस बनाकर तब तक बंधा रखना चाहिए जब तक कि छाला उठ न जाए। छाला उठने पर उसको खोल लेना चाहिए। इस छाले के आराम होने पर श्वेत कुष्ठ के दाग मिट जाते हैं।
सफेद कनेर – सफेद कनेर की जड़, कुटजफल, करंज के फल, दारूहल्दी की छाल और चमेली की नयी पत्तियों का लेप कुष्ठ नाशन के लिये सुप्रसिद्ध है।
शिरीष की छाल शिरीष की छाल, कपास के फूल, अमलतास की पत्तियों, काकमाची की पत्तियों इनको अलग-अलग पीसकर बनाये गये 4 प्रकार के लेप कुष्ठ नाशक होते हैं।
तैल का प्रयोग

1. ज्योतिष्मति – श्वेत कुष्ठ में ज्योतिष्मति को 21 दिन तक गौमूत्र से भिगोकर उसका तेल निकालकर लगाने से श्वेत कुष्ठ मिटता है।
2. काजू – इसके छिलके से एक प्रकार का तैल प्राप्त किया जाता है। जो दाहक होता है और शरीर पर लगाने पर पीलापन पैदा कर देता है। इसे कुष्ठ और चर्मरोग में प्रयोग लाते हैं। इस तैल का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए।
3. चालमोगरा – चालमोगरा का तैल चर्मरोग के लिए एक रामबाण औषधि है। अगर इसका विधिपूर्वक उपयोग किया जाये तो कुष्ठ के समान भयंकर रोग भी दूर हो जाते हैं।
4. कलौंजी – कलौंजी 5 तोले, दारूहल्दी की जड़ 5 तोले, गन्धक 2 तोले, नारियल का तैल 500 ग्राम, इन सब चीजों को कूट पीसकर बोतल में डालकर कार्क लगा कर 7 दिन तक धूप में रखा रहने दें और दिन में 2 बार हिला दिया करें, इस तैल की मालिश करने से कुष्ठ आदि चर्मरोग मिटते हैं।
5. नीम तैल – नीम के बीजों के तेल की मालिश करने से कुष्ठ और त्वचा के सभी रोग अच्छे होते हैं।
इस प्रकार शास्त्रों में अनेक वनौषधियों का वर्णन है जो मिन्न-भिन्न त्वचा रोग में उपयोगी है। रोगानुसार इन औषधियों का सावधानी पूर्वक प्रयोग किया जाए तो निश्चित ही स्वस्थ, सुंदर व तेजोमय त्वचा हो सकती है।
स्वास्थ्य वाटिका डेस्क