वनौषधियों से चिकित्सा प्राचीन समय से ही हमारे जीवन का हिस्सा रही है। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और पौधों में ऐसे गुण पाए जाते हैं, जो शरीर को रोगों से लड़ने और स्वास्थ्य बनाए रखने में मदद करते हैं। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में वनौषधियों का प्रयोग शारीरिक, मानसिक और त्वचा संबंधी समस्याओं के उपचार के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है। वनौषधियों के उपयोग से शरीर को पोषण मिलता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर में रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों की संभावना कम होती है। इस विषय में हम जानेंगे कि किन वनौषधियों का उपयोग किस प्रकार की समस्याओं में किया जाता है और कैसे इनका नियमित और सही प्रयोग हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी साबित होता है।
प्राचीन काल से ही मनुष्य वनस्पतियों का प्रयोग औषधि के रूप में विभिन्न रोगों के शमन के लिये करता रहा है। वर्तमान समय और निरंतर शोध के परिणामस्वरूप इसमें उपयोग करने के तरीकों में अंतर जरूर आया है। जड़ी-बूटियों की अपनी विशिष्टता के कारण वह अलग-अलग प्रभाव डालती है। यहां पर त्वचा रोगों पर प्रभावी कुछ जड़ी बूटियों को विवरण दे रहे हैं।
मंजिष्ठा
लैटिन नाम – रूबिया कॉर्डिफोलिया (Rubia cordifolia) संस्कृत मंजिष्ठा, विकसा, योजनवल्ली
हिन्दी – मंजीठ
रासायनिक संघटन – मूल में रालयुक्त सत्वपदार्थ, गोंद. शर्करा, रंजक द्रव्य तथा चूने के लवण होते है। रंजक द्रव्यों में पर्युरिन (Purpurin) – ग्लुकोसाइड-मंजिष्ठिन (Manjistin) तथा इनके अतिरिक्त जैन्थोपप्र्युरिन और स्युडोपप्र्युरिन भी होते हैं। शोथ, व्रण तथा चर्मरोगों में इसका लेप करते हैं। कुष्ठ, विसर्प आदि चर्मरोगों में दिया जाता है।
चक्रमर्द
लैटिन नाम – कैसिआ टोरा (Cassia tora)
संस्कृत – चकमर्द, दद्रुघ्न, एडगज, मेषलोचन, प्रपुन्नाड, पद्माट, चक्री
हिन्दी – चकवड़, पवाँड
रासायनिक संघटन – बीजों में Rhein, Aloe&emodin और Chrysophanol तथा 7.65% गोंद पाई जाती है। पत्र में कैथार्टीन के समान एक रेचक तत्व, लाल रंजक द्रव्य और कुछ खनिज द्रव्य होते है। इसके पंचांग की भस्म में सलफेट फास्फेट, कैल्शियम, लौह, मैगनीशियम, सोडियम और पोटेशियम पाये जाते हैं।
कुष्ठ आदि त्वचा के समस्त विकारों तथा वर्ण के विकारों में बीजों का लेप करते हैं। विषों में भी इसे लेप किया जाता है। अर्श में भी लगाते हैं। बीजों को दही या कांजी में सडा कर नींबू के रस में घिस कर कुष्ठ में लेप करते हैं। विशेषतः यह दद्रु में लाभकर है। कुष्ठ में इसकी पत्तियों का साग खिलाते हैं और उसका स्वरस देते है। बीजचूर्ण का भी प्रयोग करते है।
काकोदुम्बर
रासायनिक संघटन – इसकी छाल में टेनिन, ग्लुकोसाइड, मोम तथा सैपोनिन होत है। कुष्ठ, श्वित्र, किलास आदि विविध चर्मरोगों में मूलत्वक् एवं दुग्ध का लेप करते है। इसका दूध स्फोटजनन एवं लेखन होने से दद्रु आदि में लगाते हैं। व्रण में इसके चूर्ण या क्वाथ का प्रयोग करते है। गंडमाला में पका फल पीस कर लगाते है। मूल एवं कच्चे फल का कुष्ठ में प्रयोग करते हैं। श्वित्ररोगी को गूलर और कठगूलर का गरम काढ़ा पिलाकर धूप में बैठावें। इसमें श्विन्त्र में फोड़े उठेंगे। उनको फोड़कर वहाँ चीते या हाथी का चमड़ा तैल में मिला कर लेप करे। इस विधि से सेवन करने पर श्वित्र अच्छा होता है।
श्वेत निशोथ
रासायनिक संघटन – इसकी मूलत्वक् में एक ग्लाइकोसाइडयम राल 10% तक होती है जो भूरे-पीले रंग की, निर्गन्ध तथा तिक्तकटुरस है। इसमें टर्पेथिन (Turpethin) नामक एक ग्लुकोसाइड होता है जिसके कारण रेचन की क्रिया होती है। इसके अतिरिक्त दो और ग्लाइकोसाइड, उड़नशील तैल, पीत रंजक द्रव्य होते हैं। यह राल विदेशी जालप (Exogonium purga) की राल के समान कार्यकारी होता है और उसका उत्तम प्रतिनिधि है। लेखन कर्म के कारण यह त्वचा रोगों में उपयोगी है।
रुई आक (अर्क)
खदिर
हरिद्रा
भल्लातक
आरग्वध
तुवरक
बाकुची
जाती (चमेली)
मदयन्तिका (मेंहदी)
सैरेयक
बकायन
कचनार
लालचंदन
नीम
करंज
तुलसी
अंकोल
अन्य वनौषधिया
बाह्य प्रयोग
तैल का प्रयोग

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