ग्रीष्म ऋतु में बढ़ती गर्मी और उमस के कारण त्वचा कई तरह की समस्याओं का सामना करती है। इस मौसम में त्वचा अधिक पसीना और तैलीय हो जाती है, जिससे मुंहासे, दाने, खुजली, सनबर्न और फंगल इन्फेक्शन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसके अलावा, धूप और प्रदूषण का सीधा असर त्वचा को रूखा, संवेदनशील और डल बना सकता है । हालांकि, कुछ सरल सावधानियों और घरेलू उपायों के माध्यम से इन त्वचाविकारों से राहत पाई जा सकती है। सही आहार, पर्याप्त पानी का सेवन, हल्के और प्राकृतिक स्किनकेयर उत्पादों का उपयोग, और नियमित साफ-सफाई से त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाए रखा जा सकता है। इस विषय में हम जानेंगे कि ग्रीष्म ऋतु में त्वचा की देखभाल कैसे करें और किन उपायों से त्वचा संबंधी समस्याओं को रोका जा सकता है।
अप्रैल-मई का महीना आते ही चारों ओर फैली भीषण गर्मी से व्यक्ति बेचैन हो जाता है. दोपहर के १२ बजे के बाद बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं होती. प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भीषण गर्मी का प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है लेकिन त्वचा जो कि पूरे शरीर के अवयवों को ढाककर उसकी रक्षा करती है, ऋतु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव हमारी कोमल, नाजुक व संवेदनशील त्वचा पर पड़ता है।
व्यक्ति आदिकाल से ही सौंदर्य का उपासक रहा है। स्वस्थ, तेजयुक्त व बेदाग, कोमल त्वचा सभी को अपनी ओर आकर्षित करती है व अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोडती है। ग्रीष्म ऋतु का सबसे अधिक दुष्प्रभाव त्वचा पर पड़ता है।
गर्मियों में अत्यधिक पसीना आने से शरीर से दुर्गंध आने लगती है, त्वचा की रुक्षता बहुत अधिक बढ़ जाती है, त्वचा शुष्क होना, त्वचा पर चकत्ते आना, जख्म होना, त्वचा में दाह की अनुभूति होना, अत्यधिक खुजली होना आदि इस मौसम में आम बात है।
इस मौसम में होने वाली घमौरियों (prickly heat) खास करके सभी को बेचैन कर देती हैं। गर्मी का अत्यधिक प्रकोप होने पर छोटे छोटे सूई के नोक के जितने उभार युक्त दाने (घमौरियाँ) बहुत खुजलाने लगते हैं, त्वचा खुजलाते खुजलाते त्वचा में लाली आ जाती है और त्वचा में जलन होने लगती है। यह घमौरियाँ खासकर पीठ व हाथ पैरों पर निकलती हैं। यह अधिक खुजलाने पर फोड़ों के रूप में परिवर्तित हो जाती है।
गर्मियाँ शुरू होते ही अत्यधिक आम, दही, स्निग्ध पदार्थ, श्रम पश्चात तुरंत ठंडा पानी पीना, सतत गर्मी में घूमते रहना, ज्यादा मिर्च मसालेदार आहार खाने से शरीर में बहुत अधिक फोड़े-फुसियाँ बढ़ जाते हैं जो धीरे-धीरे समय पाकर अथवा उचित सावधानी न बरतने पर बढ़ते बढ़ते बहुत लालिमायुक्त होकर ज्यादा वेदना करते हैं व धीरे-धीरे उनमें मवाद भरने से पकने लगते हैं। ऐसी अवस्था में उनका शीघ्रातिशीघ्र उपचार करना आवश्यक हैं।
ग्रीष्मऋतु में पित्त दूषित होकर रक्त को दूषित कर त्वचागत विकार उत्पन्न करता है। अतः ग्रीष्मऋतु में त्वचागत विकारों में पित्त शामक व रक्त शुद्धि औषधियों का प्रयोग होना चाहिए, इसके लिए ग्रीष्म ऋतु में चंदनासव बहुत ही उपयोगी व प्रभावी पाया गया है क्योंकि इसमें पित्तशामक के साथ ही साथ रक्त शुद्धिकर आयुर्वेदिक औषधियों हैं। अतः ग्रीष्म ऋतु में होनेवाले त्वचागत विकारों में गंधक रसायन १ वटी सुबह शामे चंदनासव २ चम्मच के साथ नियमित २-३ माह तक सेवन करना चाहिए, ग्रीष्म ऋतु में कुछ व्यक्तियों को उष्णता के संपर्क में आने से त्वचा लाल व दाहयुक्त होती है। ऐसे समय में चंदनासव लाभकारी औषध पाई गई है।
गर्मी के प्रभाव से छोटे बच्चे भी बहुत अधिक त्रस्त होते हैं. इन दिनों उनमें विशेषकर मसूरिका रोग होता है जिसे सामान्य भाषा में माता (देवी रोग) भी कहते हैं। रोग के कीटाणु का संक्रमण होने पर 12-14 दिन बाद सर्दी लगकर सहसा ज्वर बढ़कर 103-104 F तक पहुँच जाता है. सारे बदन में दर्द, गले में दर्द के साथ खाँसी होना, प्रकाशद्वेष व वमन यह प्रधान लक्षण हैं। ज्वर आने के 3 दिन बाद माथे तथा कान के पीछे छोटे लाल रंग के उभरे हुए चकत्ते निकलते हैं जो कुछ घंटों में कठोर बन जाते हैं। फिर धीरे-धीरे हाथों कलाई, कंधे व पीठ पर शरीर के दोनों ओर समान चकत्ते निकल आते हैं, शरीर के जिस भाग में अधिक सूर्यप्रकाश पड़ता है, वहाँ अधिक चकत्ते दिखाई देते हैं। २ दिन बाद द्रव स्फोट का रूप धारण करते हैं। लगभग आठवें दिन इनमें पूय भर जाता है। फिर लगभग बारहवें दिन पूयविस्फोट सूखने लगते हैं और ये गहरे भूरे या काले छिलके एक सप्ताह तक झड़ जाते हैं। ऐसे बच्चों को योग्य चिकित्सक के मार्गदर्शन में अन्य औषधियों के साथ चंदनासव देने से बेहतर परिणाम मिलते हैं।
छोटी आयु के एक वर्ष से ऊपर निर्बल प्रकृति के बालकों में विशेषतः ग्रीष्मऋतु में रोमान्तिका (Measles) व्याधि होती है, इस व्याधि की शुरुआत तीव्र ज्वर व खाँसी के साथ होती है। आँखों से पानी आना, सारे शरीर में दर्द होना आदि लक्षण होते हैं। शुरू में यह व्याधि साधारण सर्दी के समान लगती है। आँखों की निचली पलक पर सूजन आती हैं और मुख के अंदर मोलर (molar) दंत के अंदर वाली श्लेष्मलकला पर पिन के नोक के आकार के श्वेत धब्बे कभी कभी मंडलों के ऊपर मध्य में दिखाई देते हैं। इन्हें कोपलीक चिह्न (koplik spots) कहते हैं। फिर चौथे दिन छोटी दाल के आकार के रक्त वर्ण के चकत्ते (macule) पहले माथे में बालों के आस-पास, वहाँ से गले, धड़ पर फैलते हुए दोनों पैर व तलुए, पाँचवें दिन तक सारे शरीर में प्रकट हो जाते है। फिर 2 दिन बाद जिस क्रम से ये चकत्ते निकलते हैं उसी क्रम से फीके पड़ने लगते हैं। रोमान्तिका (measles) से ग्रस्त बच्चों में त्वचा में पाए जानेवाले चकत्ते व दागों में चंदनासव से काफी राहत मिलती है।
उपाय
- ग्रीष्म ऋतु में पाये जानेवाले विविध त्वचाविकारों में अति धूप के कारण फोटोडर्माटाईटिस (Photodermatitis) वा कॉन्टैक्टडर्माटईटिस (Contact Dermatitis) व उसके फलस्वरूप वैवर्णय व दाह होता है, जिनके शमन हेतु कामदूधा रस, चंदन, रक्तचंदन, शतधौत घृत लेप आदि का उपयोग होता है। खुजली कम करने के लीए निम्ब, तुलसी, निर्गुण्डी का लेप वा पत्र का परिषेक उत्तम कार्य करता है। दद्रु तथा दारूणक अतिरिक्त स्वेद के कारण मलसंचय को दूर करने हेतु आरग्वध, चक्रमर्द लेप, पंचवल्कल, आरोग्यवर्धिनी, अभ्यंगार्थ दुर्वा तैल, भृंगामलक तैल, निंब तैल का उपयोग किया जा सकता है। व्यंग एवं वलीयाँ कम करने हेतु कुंकुमादि तैल, यष्टीमधुतैल, किंशुकादि तैल चेहरे पर लगाने हेतु उपयुक्त है। शमन औषधियों के साथ हरिद्राखण्ड एक उत्तम रसायन की तरह इन त्वचा रोगों में अत्यंत उपयुक्त है।
- ऊपर वर्णित अनेक औषधिकल्पों के साथ साथ इस ऋतु में आयुर्वेदोक्त वर्णित ऋतुचर्या का भी यथायोग्य पालन अवश्य करें। आहार में मुख्यतः अम्ल, लवण रस, तले हुए अत्युष्ण तथा विदाही अन्नपान का सेवन कम से कम करे, धूप सेवन के पश्चात तुरंत शीत जलपान एवं शीत पदार्थ सेवन त्वचा विकारों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारण है, इसे सदा वर्ज्य करे। इसके विपरीत मधुरादि रसप्रधान शीतलता प्रदान करने वाले आहारद्रव्य, सत्तु सेवन, जलप्रधान फलों का सेवन, विविध शरबत इत्यादि का प्रयोग उचित मात्रा एवं उचित समय पर अवश्य करे।
- नियमित विहार में शीतली, सीत्कारी, प्राणायाम का प्रयोग करे। प्रातः शीतल जल से स्नान, चंदनादि सुंगधि द्रव्यों का लेपन, धूप में प्रवास करते वक्त संपूर्णाग में हलके सूती के वस्त्र परिधान करे, शिर पर छत्रधारण आदि प्रतिबंधात्मक उपाय करे। शीतोष्ण व्यत्यास का सदा त्याग करे। यथोचित निद्रा का लाभ लें। भारी व्यायाम से दूर रहे।
इस प्रकार अपने शरीर को जाने, अपनी प्रकृति को परखे और आनेवाले ग्रीष्म ऋतु में अपने त्वचा का स्वास्थ्य बरकरार रखने हेतु केवल ब्युटीप्रोडक्ट्स के पीछे ना भागते हुए संतुलित आहार व विहार योग्य निद्रा, जरूरतानुसार मात्रायुक्त औषधि युक्तिपूर्वक अपने वैद्य की सलाह से प्रयोग करें।

डॉ. श्रावनी चौहान
शासकीय आयुर्वेद कॉलेज
पी. जी. स्काॅलर, नागपुर