“सुंदर और साफ त्वचा पाने के लिए केवल बाहरी देखभाल ही नहीं, बल्कि अंदरूनी संतुलन भी जरूरी है। योग एक ऐसा तरीका है, जो शरीर, मन और त्वचा तीनों को स्वस्थ बनाता है। आइए जानते हैं कि कैसे योग व प्राकृतिक चिकित्सा मुहांसों की समस्या को जड़ से सुधारने में मदद कर सकती है।”

अधिकांश युवाओं को मुँहासों से परेशानी होती है, चेहरे का आर्कषण कम हो जाता है अनेक बाह्य उपायों से चेहरे के मुँहासे समाप्त करने दवाइयाँ, लोशन, क्रीम आदि लगाने के उपरांत भी विशेष लाभ नहीं प्राप्त होता है। यह सभी उपाय ऊपरी तौर पर होते है इसलिए पूर्ण रूप से लाभप्रद नहीं होते। आधुनिक चर्मरोग विशेषज्ञों का कहना है कि त्वचा अधिक तैलीय (ऑयली) होती है, परन्तु तैलीय त्वचा होने के पीछे प्रमुख कारण उन्हें ज्ञात नहीं होते है। प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग विशेषज्ञों के अनुसार इसका प्रमुख कारण कब्जियत है, भोजन चबाकर न खाना युवाओं की प्रमुख आदत होती है, पर्याप्त पानी न पीना, फलों के रसों के प्रति कोई रूचि न लेना, भोजन करते समय अधिक पानी पीना और रेशेयुक्त आहार न होना कब्जियत के मुख्य कारण होते हैं। इसके अतिरिक्त व्यायाम का भी अभाव होता है। युवाओं में व्यायाम के प्रति अरूचि तथा आलस्य होता है।

योगाभ्यास मुँहासों की रोकथाम के लिए अति उपयुक्त होता है। प्राकृतिक चिकित्सा में सादे पानी से चेहरे को दिन में तीन-चार बार धोने के पश्चात् चेहरा पोछे बिना ही सूखने दिया जाए, इससे चेहरे का तेल घुल जाता है और मुँहासों का उभरना कम हो जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रेशेदार भोजन करना लाभप्रद होता है, फलों का उपयोग दैनिक जीवन में पर्याप्त मात्रा में करना चाहिए। बीस मिनट प्रतिदिन ठण्डे पानी की पट्टी पेडू पर रखना अति उत्तम होता है, कुनकुने पानी से सप्ताह में दो बार एनिमा भी लेना लाभप्रद है, गरम और ठण्डे पानी से 15-15 मिनट कटिस्नान करना उपयुक्त होता है. सप्ताह में तीन बार कटिस्नान पर्याप्त होता है।

योगाभ्यास में निम्न प्रयोग करने चाहिए तीस दिन में एक बार दीर्घ शंखप्रक्षालन करना चाहिए। इसके अन्तर्गत 20 से 25 गिलास गर्म पानी में नमक-निम्बू मिलाकर (हृदयरोगी तथा उच्चरक्तचाप वाले नहीं करें) प्रातःकाल उठते ही यह पानी 4 गिलास पीकर तिर्यकताड़ासन, कटिचक्रासन, उदराकर्षणासन एवं तिर्यक भुजंगासन 10-10 बार करने के बाद शौच के लिए जाना चाहिए। उपरान्त फिर 3-4 गिलास वही पानी पीकर टहलने के बाद पुनः शौच को जाना चाहिए। इस प्रकार 4-5 बार शौच जाने एवं पानी पीने से गुदाद्वार से पिया हुआ पानी निकलने लगता है। इस क्रिया में लगभग डेढ़ से दो घण्टे का समय लगता है इसके पश्चात् सम्पूर्ण दिन विश्राम करें और भूख लगने पर ही घी खिचडी का सेवन करें।

प्रतिदिन प्रातःकाल 1-2 गिलास जल सेवन के उपरान्त अग्निसार क्रिया का प्रयोग करने से कब्जियत कम हो जाती है और पेट साफ होने में मदद मिलती है। खड़े होकर घुटनों को हल्का मोड़कर सामने झुकते हुए हाथों को घुटनों पर रखें, सामने देखते हुए श्वास बाहर निकाल कर बाह्य कुंभक करें और जब तक श्वास बाहर रूकी रहती है, तब तक पेट को गहराई से आगे-पीछे चलाये, लगभग 25-30 बार पेट को चलाने के बाद खड़े होकर 4-5 बार लम्बा गहरा श्वास-प्रश्वास करें, उपरान्त क्रिया को 4-5 बार दोहराना चाहिए। इससे कब्ज दूर होकर पेट का मोटापा कम होता है आँतों की सुजन यदि हो तो कम होकर पाचन प्रणाली सुचारू रूप से चलने लगती है, चेहरे की रौनक बढ़ती है।

शशांकासन से भी कब्जियत कम होती है और चेहरे की ओर रक्तसंचार बढ़ता है अतः मुहाँसे और उसके बाद के दाग मिटाने में यह आसन बेजोड़ है, इसके अनुसार दोनों घुटने मोड़कर जमीन पर आसन बिछाकर बैठे इसे व्रजासन कहते हैं इसके उपरान्त दोनों हाथों को उपर उठाकर सामने झुके और दोनों हाथों को जमीन पर फैलाये ताकि कोहनियाँ सीधी रहे। नाक या माथा जमीन पर बिना पुट्टे उठाये लगाने की चेष्टा करें। 20-25 श्वास-प्रश्वास होने तक इस आसन की स्थिति में रूके फिर उपर उठे, एक बार इसे दोहरायें।

वक्रासन भी कब्जियत मिटाने में सक्षम है, पैर फैलाकर जमीन पर बैठाकर दाहिना पैर मोड़कर बाँये घुटने के पास जमाकर खड़ा रखे, दाहिना हाथ पीठ के पीछे जमीन पर रखें। बाँया हाथ खड़े घुटने के उपर से निकाल कर बाँये घुटने को पकड़कर गर्दन, सिर, छाती दाँये तरफ घुमाकर 10-15 श्वास-प्रश्वास करें, इस प्रकार दूसरी तरफ से करें, इससे पेट के अंगों को सक्रिय बनाकर कब्जियत दूर होने में मदद मिलती है।

धनुरासन भी पेट का मोटापा कम करते हुए कब्जियत मिटाता है, जमीन पर दरी डालकर पेट के बल लेट जाये, घुटनों से दोनों पैर मोड़कर टखनों को पकड़कर गर्दन, सिर, छाती और घुटनों को उपर उठाये और 15-20 श्वास-प्रश्वास करे फिर धीरे-धीरे नीचे शरीर को उतारे 2-3 बार दोहराना लाभप्रद है।

उत्तानपादासन कब्जियत मिटाने में लाभप्रद है। पीठ के बल लेटकर हाथों को बगल में रखें। गर्दन नहीं उठाते हुए दोनों पैरों को घुटनों से सीधे रखते हुए अगूंठे दिखने लगे इतनी उँचाई पर उठाकर रखे और 10-15 श्वास-प्रश्वास करे, 3 बार इस आसन को दोहराना लाभप्रद है। कब्जियत दूर करने के साथ ही केन्द्रिय नाड़ी संस्थान को सबल करता है, परिणाम में आत्मबल बढ़ाता हैं।

पवनमुक्तासन अन्त में लाभप्रद है। पीठ के बल लेटे-लेटे पैरों को घुटनों से पकड़कर दोनों हाथों से छाती की तरफ खींचते हुए ठोढ़ी घुटनों से लगाने का प्रयास करते हुए 10-15 श्वास-प्रश्वास करें, इसे दो बार दोहरायें पेट की वायु को निकलते हुए कब्जियत कम करने में मददगार है।

शवासन का अभ्यास अन्त में अवश्य करना चाहिए, कमर के बल गर्दन, सिर सीधी दिशा में रखकर आँखे बन्द करें। शरीर ढीला छोड़े, पैरो में एक-डेढ़ फीट का अन्तर रखें। लम्बी गहरी दस श्वास लेना छोड़ना करें। फिर आँखे बंद रखते हुए तीस साधारण श्वास-प्रश्वास नाक के सिरे पर ध्यान करते हुए विश्राम करें।

प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणवायु का संचार रक्त में सुचारू रूप से नाड़ी शोधन या अनुलोम-विलोम को दस बार 1:2 के अनुपात में करना चाहीये। इसी प्रकार कपालभाति क्रिया सौ बार या डेढ़ सौ बार करना चेहरे की कान्ति बढ़ाने में लाभप्रद हैं। भस्त्रिका प्राणायाम में दस बार जल्दी-जल्दी, लम्बी-गहरी श्वास-प्रश्वास करने के बाद आन्तरिक (श्वास रोकना) कुम्भक करें और यथाशक्ति अन्दर रोकने के बाद धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़े और इस प्रक्रिया को तीन बार दोहराने से पर्याप्त लाभ मिलता है।

उपरोक्तानुसार योगाभ्यास एवं प्राकृतिक जीवनपद्धति को अपनाने से मुँहासों का रोग जड़ से समाप्त हो जाता है।

डॉ. बी. के. बांदे, इंदौर

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