त्वचा रोग से ग्रस्त अनेक रुग्ण वर्षों से चिकित्सा कर करके परेशान हैं। एक डॉक्टर बदल कर दूसरा डॉक्टर, एक औषधि के बाद दूसरी औषधि व आए दिन नए-नए ऑइटर्मेन्ट व क्रीम लगाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। ऐसे रुग्णों के लिए आयुर्वेद में त्वचा रोग का कारण दूषित आहार विहार के कारण उत्पन्न रक्त का अशुद्ध होना है। इसके लिए अनेक रक्तशोधक औषधियां वर्णित है परंतु औषधि लेने के पूर्व यदि पंचकर्म द्वारा शरीर शुद्धि की जाए तो औषधि के शत प्रतिशत लाभ मिलते है।

आजकल मनुष्य के खान पान में पहले से काफी अंतर आ गया हैं। अनियमित जीवन, अव्यवस्थित खानपान आम बात हो गई है। आज छोटे-छोटे बच्चों को भी चटपटा खान पान पसंद हैं। घर का नाश्ता, भोजन की पौष्टिकता से परिचित होते हुए भी जीभके चटोरे पन व स्वाद के वशीभूत होकर दिन प्रतिदिन भिन्न-भिन्न व्यंजन लेना पंसद करते है। आज कल के आहार में मिलावटी व कृत्रिम रासायनिक पदार्थों का समावेश हो गया है। पिज्जा, बर्गर, चायनिज, जंक फुड का सेवन आजकल तो आम बात हो गई है। खोमचे वालों को शाम के समय देखिए। एक भी खोमचे वाला खाली नजर नहीं आएगा। इससे ही पता चलता है कि स्वाद लोलूपता इंसान को पसंद हैं। साथ ही असमय उठना, सोना, व्यायाम् का अभाव, तेज रफ्तार जिंदगी व मानसिक तनाव के कारण आज नित नये रोग पनप रहे हैं। त्वचा रोग भी इन्हीं अव्यवस्थित जीवन शैली का परिणाम है।

भिन्न-भिन्न त्वचा रोगों के लिए आयुर्वेद में प्रचलित औषधियां है। जिनके सेवन से रुग्ण को निश्चित ही लाभ मिलता है। आयुर्वेद में त्वचा रोग का कारण दूषित आहार विहार के कारण उत्पन्न रक्त का अशुद्ध होना है। इन सब कारणों से दोष दूषित होकर रक्त धातु से मिलकर त्वचा मांस आदि में विकृति उत्पन्न करते हैं। ऐसे रुग्णों को औषधियां लेने पर तात्कालिक आराम तो मिलता है परंतु पूरी तरह से रोग नहीं जाता अतः पंचकर्म करने से दोष जड़ से दूर होकर रोग जड़ से मुक्त होते देखे गए हैं। अतः त्वचा रोगों में पंचकर्म अवश्य करना चाहिए। आयुर्वेद में त्वचा रोग के लिए अनेक रक्तशोधक औषधिंया वर्णित है परंतु औषधि लेने के पूर्व यदि पंचकर्म द्वारा शरीर शुद्धि की जाए तो औषधि के शत प्रतिशत लाभ मिलते है। पंचकर्म अर्थात ऐसे 5 कर्म जिससे शरीर का शोधन हो, ये 5 कर्म है- वमन, विरेचन, बस्ति, नस्य, रक्तमोक्षण ।

वमन कर्म – शरीर के ऊर्ध्व भाग से दोषों का बाहर निकलना वमन कर्म के अंतर्गत आता है। वमन कर्म में उल्टी कराकर दोष को बाहर निकालते है। वमन कर्म के लिए मुख्यतः मदनफल चूर्ण, शहद, यष्टीमधु फाण्ट का प्रयोग करते है। वमन के पूर्व स्नेहन स्वेदन अवश्य करते है। चर्मरोगों में शीतपित्त, एक्जिमा, मुंहासे, सोरायसिस, हाथीपांव, सफेद दाग, चेहरे या शरीर पर दाह या खुजली में वमन कर्म करने से उत्तम लाभ की प्राप्ति होती है। मुख्यतः कफज चर्म रोगों में वमन के अच्छे परिणाम मिलते है।

विरेचन कर्म – शरीर के अधोमार्ग से दोषों का बाहर निकालना विरेचन कर्म कहलाता हैं। सामान्य भाषा में इसे जुलाब देना कहते हैं। विरेचन के लिये हरितकी, निशोथ या अमलतास जैसी वनौषधियों का प्रयोग करते हैं। विरेचन के पूर्व भी स्नेहन स्वेदन करना आवश्यक हैं। एलर्जी, हाथीपांव, सोरायसिस, श्वेत कुष्ठ, मुंहासे, एक्जिमा, शीतपित्त में विरेचन के लाभ मिलते हैं। पित्तदोष प्रधान चर्मरोगों में विरेचन कर्म के श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं।

सभी प्रकार के त्वचा विकारों में रस रक्त मांस की दुष्टि के साथ-साथ कफ पित्त दोष की अधिकता होती हैं। अतः दोषो का शोधन आवश्यक हैं। अनुभव से पाया गया हैं कि वमन की अपेक्षा विरेचन से त्वचा विकार में अधिक लाभमिलता हैं। विरेचन के लिए बाहवा मगज प्रधान विरेचन औषधि का त्वचा विकारों में इसका प्रयोग करना चाहिए। कृमि होने पर कपिला चूर्ण, वात का संबंध होने पर कुटकी, सोनामुखी, हरितकी द्रव्यों का प्रयोग करें। पित्त बढ़ने पर बाहवा मगज, गुलाब की कली, त्रिफला चूर्ण, यष्टीमधु जैसी सौम्य औषधियों का प्रयोग करें। सभी प्रकार के त्वचा रोग में महातिक्तघृत का अवश्य प्रयोग करें। अतः सभी त्वचा विकृतियों में विशेष रुप से विरेचन चिकित्सा करनी चाहिए क्योंकि विरेचन से पित्त नष्ट होता हैं।

बस्ति कर्म – यह एक प्रकार का मेडिकेटेड एनिमा हैं। शरीर का स्नेहन, स्वेदन कर तत्पश्चात गुदा मार्ग द्वारा औषधि प्रविष्ट कराते है। इसे ही बस्ति कहते है। मलबद्धता के कारण होने वाले चर्मरोग में बस्ति कर्म के बेहतर परिणाम प्राप्त होते है। आयुर्वेद मे बस्ति को आधी चिकित्सा कहा है।

कई बार त्वचा विकार में कुछ समय तक रोगी को अच्छा लगता है व फिर त्वचा विकार होता हैं क्योंकि त्वचा में होने वाले रोग जिद्दी होते हैं। ऐसे विकारों में गोमूत्र व नीम के पत्तों का रस, त्रिफला, दशमूल का काढ़ा की बस्ति देने पर रोग का आक्रमण बार-बार नहीं होता एवं पूरे शरीर में होने वाले अनेक काले दाग, एक्जिमा, गजकर्ण, खुजली में पक्वाशय गत निरुह बस्ति देने से लाभ होता हैं।

सफेद दाग के रुग्णों में कई बार कृमि विघात की चिकित्सा करनी पड़ती हैं। ऐसे समय करंज तेल की बस्ति देने से सफेद दाग के रुग्णों को लाभ मिलता हैं व कृमि की औषधि कम देनी पड़ती हैं।

नस्य कर्म – नासा मार्ग (नाक) में तेल की 2-2 बूंद शास्त्रोक्त विधि से प्रविष्ट करना नस्य कर्म कहलाता है। औषधि डालने के पूर्व चेहरे का स्नेहन स्वेदन (मालिश सिकाई) आवश्यक है। नस्य का प्रभावी लाभ ऊर्ध्व जत्रुगत विकारों में विशेष रूप से मिलता है। नस्य के लिए अणु तेल, षडबिंदू तेल का प्रयोग किया जाता है। बालों का झड़ना व असमय बाल सफेद होने से रोकने के लिए प्रतिदिन अणु तेल या घृत का नित्य नस्य करना चाहिए।

रक्तमोक्षण – त्वचा रोग का मुख्य कारण दूषित रक्त होता है। इस दूषित रक्त को विशेष पद्धति से निकालना ही रक्तमोक्षण है। दूषित रक्त निकल जाने पर त्वचा रोग से मुक्ति मिलती है। जीकुमार आरोग्यधाम में जलौका (Leech) के द्वारा दूषित रक्त का निर्हरण करते है। त्वचा रोग मे इसके अत्यंत प्रभावी परिणाम मिलते है। रक्तमोक्षण के द्वारा सोरायसिस, विसर्प (Erysepals), पीड़िका (Boils), सफेद दाग, एक्जिमा, विद्रधि (Abscess) व अर्बुद (Tumour) में बेहतर परिणाम होता है।

तक्रधारा – इस उपक्रम में आंवला का भिन्न-भिन्न रोग अनुसार औषधि द्रव्य का चयन किया जाता हैं।

क्वाथ व खट्टे ताक की धारा एक विशेष यंत्र से प्रभावित अंग पर गिराते हैं। सोरायसिस व सफेद दाग जैसे त्वचागत विकारों पर तक्रधारा के चमत्कारिक परिणाम मिलते है। इस विधि से धारा 8 दिन से 1 माह तक चिकित्सक परामर्शानुसार दी जाती है। तक्रधारा से बालों के सफेद होना व झड़ना दूर होते है।

यदि त्वचा गत रोग वात प्रधान हो तो तिक्तरस युक्त खदिरादिघृत का स्नेहपान कराएं। कफ प्रधान हो तो वमन कराएं। पित्त प्रधान हो तो त्रिवृत्तादि से विरेचन करें। रक्तमोक्षण भी कर सकते हैं। वात प्रकोप देखकर मदनफल-कुटज क्वाथ से निरुह बस्ति दें। करंज तेल, मदनफल सिद्ध तेल से अनुवासन बस्ति दें। सोरायसिस में प्रस्तर व नाड़ी स्वेद करें । कृमि व कफ प्रधान त्वचा रोग में विडंग चूर्ण व तेल का नस्य दें। साथ ही अभ्यंग, वमन, विरेचन, रक्तमोक्षण करें।

इस प्रकार उपरोक्त पंचकर्म की क्रियाओं की त्वचा रोग में अहम भूमिका है। जिस प्रकार मैले वस्त्र को रंगने के पूर्व उसे साफ धोया जाता है। उसी प्रकार औषधि देने के पूर्व पंचकर्म द्वारा शरीर शुद्ध करने से औषधि शीघ्र लाभ देती है।

Dr Anju Mamtani

डॉ. अंजू ममतानी
'जीकुमार आरोग्यधाम',
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग, जरीपटका, नागपुर

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