समयानुसार मनुष्य के जीवन में परिवर्तन होते रहते हैं जीवनशैली भी बदल जाती है परंतु आधुनिक यंत्रों के संगत में कामकाज के व्यस्त जीवन में खुद के स्वास्थ्य को प्रधानता देकर, उचित समय देकर, योग्य कार्यप्रणाली को अपनाकर स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए । अन्यथा अनेक विकारों का सामना करना पड़ता है ।
आजकल हर घर का प्रत्येक सदस्य अपने कार्य में व्यस्त रहता है। माँ-बाप स्वयं नौकरी करते हैं, वृद्ध वयस्क घर में रहते हैं तथा बच्चे स्कूल-कॉलेजों में व्यस्त रहते हैं। किसी को अपनों के साथ वक्त बिताने का मौका नहीं मिलता। घर में रहकर भी हर कोई अपने-अपने मोबाईल पर अपना-अपना कार्य करता रहता है।
समय की कमी के कारण हर कोई वाहन पकड़कर अपने स्थान पर पहुँचना चाहता है, इस तरह पैदल चलना बंद हो जाता है। स्थान पर पहुँचकर भी वह लिफ्ट से ऊपर जाना पसंद करता है और उसका शारीरिक व्यायाम बंद हो जाता है। सहकर्मियों के साथ कॅम्प्यूटर, लॅपटॉप पर काम किया जाता है। अब तो ए. आई. का प्रवेश हो जाने के कारण बुद्धि पर भी जोर नहीं दिया जाता, शारीरिक श्रम की बात ही क्या इस तरह शरीर के साथ-साथ मस्तिष्क भी कार्यहीन होने जा रहा है। वर्क फ्रॉम होम से भी ना के बराबर श्रम हो गया है।
वक्त पर काम पूरा करने के चक्कर में बाहर से कुछ मंगवाकर 2 मिनट में शरीर के अंदर ठूंसा जाता है। छोटे बच्चे खाना ना खाने पर उनके हाथ में मोबाईल पकड़ा दिया जाता है। जिससे पचनक्रिया में व्यवधान होकर अन्न का रस, रस का रक्त, मांसपेशी की कोशिका, अस्थिकोशिका इस तरह की सम्पूर्ण प्रक्रिया न होकर, उस डबाबंद जंकफूड से केवल स्नेह के अॅडिपोझ कोशिकायें बनती है जो त्वचा के नीचे जमा हो जाती है। इनसे आवश्यक पोषण नहीं मिलता। केवल शरीर स्थूल बन जाता है। पोषक खून की योग्य मात्रा ना बनने के कारण सदैव थकान महसूस होती है और पसीना आते रहता है।
कुछ लोग रात में जागजागकर रात में काम करते है साथ ही साथ ज्यादा ऊर्जा देनेवाले पेय तथा फास्ट फूड खाते रहते हैं लेकिन उसे पचाने के लिए कुछ भी हलचल ना करने के कारण केवल मोटापा आता है। निद्रा की कमी के कारण शरीर के अंतः स्त्राव भी असंतुलित हो जाते हैं, अधिक परिवर्तन से स्त्रियों में बंध्यत्व, पी. सी. ओ. एस., गर्भधारण में उपद्रव, अनियमित मासिक स्त्राव, स्तनकैसर इत्यादि विकार भी हो सकते हैं। गर्भावस्था में भी मोटापा बढ़ ही जाता है। गर्भ का वजन बढ़ना, साथ-साथ पौष्टिक पदार्थ खाना, लेकिन कोई भी शारीरिक श्रम नहीं किया गया तो शरीर और भी गोलमटोल हो जाता है।
व्याधियाँ जब इंसान को घेर लेती हैं, तब दवाईयों की जरूरत पड़ ही जाती है, जैसे तनाव निवारक औषधियाँ, कार्टिकोस्टिरॉईड इत्यादि लेनी पड़ती है। इस वजह से भी शरीर स्थूल हो जाता है। कुछ व्याधियां ऐसी होती है जिसमें शरीर बहुत अधिक गोलमटोल हो जाता है, जैसे थायरॉईड, कुशिंग सिन्ड्रोम इत्यादि। स्थूलता का मापदंड बी. एम. आई. से किया जाता है, 30 या इससे अधिक होने पर स्थूल कहा जाता है।
स्थूलता
कारण : गहरी निद्रा पूरी तरह से ना लेना, अपोषक खाना अतिमात्रा में लेना, शारीरिक श्रम ना करना, मानसिक तनाव, धूम्रपान, तंबाकू, मदिरापान करना, अतिमात्रा में अन्नप्राशन करना, अस्वच्छ परिसर में रहना, स्वास्थ्य परिक्षण ना करना, अयोग्य जीवनशैली का आचरण करना गलत संगती में रहना इत्यादि ।
लक्षण : श्वास लेने में तकलीफ होना, अधिक पसीना आना, खर्राटे मारना, शारीरिक श्रम करने में असमर्थ होना, थकान महसूस करना, संधियों तथा पीठ में दर्द होना, कार्य करने में सफल होने की विश्वास की कमी, आत्मविश्वास ना होना, खुद को अलग-थलग महसूस करना।
परिक्षण : लिपिड प्रोफाईल, टि3, टि4, टि. एस.एच., रक्त शर्करा इत्यादि
चिकित्सा : देर से सोना तथा देर से उठना यह अस्वस्थ जीवनशैली के कारण है जिससे शारीरिक तथा मानिसिक हानि होती है।
निद्रा :
* योग्य प्रमाण में गहरी निद्रा ले।
* दूरदर्शन, मोबाईल का इस्तेमाल सोने के 1 घंटा पहले बंद कर दे। 1-2 घंटा, पहले रात का हलका भोजन कर लें।
* सूर्योदय देखकर नैसर्गिक, स्वच्छ वातावरण में पैदल घूमे, नृत्य करें, खेलकूद करें, दौड़ लगाये।
* प्रिय व्यक्तियों से मिलें, सकारात्मक विषयों पर बातचीत कर हँसी-ठिठोली करें।
* धूप सेवन करें
आहार : स्वास्थ्यवर्धक कार्बोदक, प्रोटीन तथा स्नेह से संतुलित पोषक खाना खाये। शाकाहार करें।
फल – आम, पपया, संत्रा, सेब, पेरू, तरबूज
सलाद – निम्बू, ककड़ी, गाजर, बीट, मूली, टमाटर, प्याज
सब्जी – पत्तागोभी, पालक, मेथी, परवल, मूंग दाल,
तक्रसेवन – दही, नमक, जीरा, पुदीना, धनिया से बना हो। ज्वारी की भाकरी लें।
तेल – जवस
बच्चों को खाना सब्जी, सलाद, सूप इत्यादि से सजाकर देना चाहिए जिससे स्वाद तथा पोषण दोनों मिले।
गरम जल – पीने से अनावश्यक स्नेह नष्ट होता है।
* 3-3 घंटे के अंतराल पर, निर्धारित वक्त पर, रेशायुक्त हल्का खाना खाये।
* मांसाहार न करें। लालसा होने पर मछली ले सकते हैं।
* धूम्रपान, मदिरापान ना करें।
योग – प्राणायाम, ध्यान, धारणा इत्यादि के साथ आसन (त्रिकोणासन, वज्रासन इत्यादि) करे तथा सूर्यनमस्कार करें। मेडिटेशन से मानसिक तनाव पर नियंत्रण होकर शारीरिक मानसिक तथा आत्मिक शांति मिलती है।
मोटापा चिकित्सा – योग्य संतुलित आहार, स्थूलता निवारक वानस्पतिक औषधि, विहार अर्थात जीवनशैली परिवर्तन इनके कारण ही स्थूलता को दूर किया जा सकता है। मोटा होने से अच्छा है कि दुबला परंतु स्वस्थ रहे। महत्वपूर्ण उपाय यही है कि स्वस्थ मन तथा स्वस्थ शरीर को संजोकर रख जाये, जो शाकाहारी भोजन से ही प्राप्त हो सकता है।
आधुनिक मतानुसार वेट लॉस सर्जरी-बेरिअॅट्रिक सर्जरी कर सकते हैं।
1. सुखसुविधायुक्त जीवनशैली को त्यागकर शारीरिक श्रम करना चाहिए।
2. व्यायाम करना चाहिए।
3. चावल तथा आलू नहीं खाना चाहिए।
4. तली हुयी, मैदे से बनी चीजें नहीं खानी चाहिए।
5. हर रोज पेट साफ होने वाली चीजों का सेवन करना चाहिए।
6. गरम पानी के साथ मधु का सेवन कराना चाहिए। औषधियों का सेवन भी करना चाहिए।
* वरादि कषाय -1 चम्मच औषध + 4 चम्मच पानी सुबह-शाम खाली पेट लेना चाहिए।
* अयस्कृति लोध्रासव इनको एकत्र कर सुबह, दोपहर और शाम 5 चम्मच खाना खाने के बाद लेना चाहिए।
* विडंगादि चूर्ण 1-2 चम्मच पुराने मधु के साथ लेना चाहिए।

डॉ. चित्रा अशोक गणवीर
एम. डी. मुंबई