आहार-नियन्त्रण के साथ-साथ नियमित व्यायाम करना जरूरी है। व्यायाम करने से कैलोरी का व्यय होता है जिससे वजन कम होता है। नियमित व्यायाम करने से चयापचय की क्रिया तीव्र होती है जिसके कारण वसा का उचित व्यय होता है । प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा मोटापे से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके लिए उपवास, मालिश, मिट्टी चिकित्सा, जल चिकित्सा आदि का प्रयोग किया जाता है। इसके अन्तर्गत गर्म ठण्डा स्नान, वाष्प स्नान, धूप स्नान, कटि स्नान, गीली चादर लपेटना, वैज्ञानिक मालिश, एनिमा आदि का सहारा लिया जाता है।

कुछ लोग मोटापा को अच्छे स्वास्थ्य की निशानी मानते हैं लेकिन मोटापा एक अभिशाप है। मोटापे से ग्रसित लोग अपने दैनिक रोजमर्रा के कार्यों का निर्वाहन भी ठीक से नहीं कर पाते हैं इसके साथ ही साथ डायबिटीज, हाईब्लडप्रेशर, गठिया, हृदयरोग, कैंसर आदि से भी ग्रसित हो जाते हैं। यह मोटापा आजकल स्त्री, पुरुषों यहां तक कि बच्चों को भी अपनी गिरफ्त में ले रहा है।

आयुर्वेद में इस व्याधि को “मेदोरोग” कहते है। मेदोरोग वह अवस्था है जिसमें अत्यधिक मेद (वसा या चर्बी) का संचय शरीर में हो जाता है। इसे आधुनिक माषा में Obesity कहा जाता हैं। जो शरीर में लिए गए आहार एवं ऊर्जा के व्यय की असंतुलित स्थिति का परिणाम है जिससे शरीर में अत्यधिक मात्रा में वसा का संचय हो जाता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति का शरीर मोटा, मारी तथा बेडौल हो जाता है। व्यक्ति का शारीरिक वजन उसकी लंबाई के अनुसार होना चाहिए। शरीर के वजन तथा लंबाई के अनुपात के आधार पर वैज्ञानिकों ने स्वस्थ होने तथा मोटापे के मानक निर्धारित किए है जिसे बॉडी मास इण्डेक्स कहते है। व्यक्ति का वजन (किलोग्राम में) को उसकी लंबाई (मीटर में) के वर्ग से भाग देने पर बी.एम.आई. निकल जाता है। यदि बी.एम.आई. 20-23.5 के बीच आता है तो व्यक्ति का वजन सामान्य है यदि 28 से ज्यादा है तो मान लेना चाहिए कि वह मोटापे से ग्रसित है।

कारण :– आजकल ‘फास्टफूड” मोटापा बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे है। तरह-तरह के व्यंजन लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ इसमें उपस्थित अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, वसा शरीर में जमा होकर शरीर को मोटा कर रहे हैं। “फास्टफूड” की श्रेणी में वे व्यंजन आते हैं जिसमें कार्बोहाइड्रेट, वसा तथा शर्करा अधिक मात्रा में होती है तथा रेशे (फाइबर), विटामिन्स तथा खनिज बेहद कम मात्रा में होते हैं। इसके अंतर्गत पिज्जा, बर्गर, पेस्ट्रीज, केक, चाऊमीन, चिप्स, चाकलेट, कोल्डड्रिंक आदि आते हैं। इनमें कैलोरी अधिक तथा पोषक तत्व नगण्य होते हैं। यह सब बच्चों को भी मोटा तथा थुलथुल बना रहा है। साथ ही उन्हें युवावस्था में वह रोग हो रहे जो कभी बुढ़ापे में होते थे। बच्चों का शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है। इस प्रकार आधुनिक जीवन शैली, अत्यधिक आहार का सेवन करना, शारीरिक श्रम या व्यायाम न करना, वसा तथा अधिक कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थों तथा मीठे पदार्थों का अधिक सेवन से मोटापा बढ़ता है। मोटापा वंशानुगत भी होता है। अंतस्रावी ग्रन्थियों जैसे थाइरॉइड, पिट्यूटरी आदि की विषम क्रिया के फलस्वरूप शरीर की चयापचप क्रियाएँ अनियंत्रित होने से भी वसा का संचय अधिक मात्रा में होने लगता है। अनेकों दवाएँ जैसे स्टीराइड, इन्सुलिन, गर्भनिरोधक दवाएँ भी मोटापे का कारण हैं। स्त्रियों में गर्भावस्था तथा प्रसव के पश्चात् किए गए विश्राम तथा दूध, घी मेवों आदि के अधिक सेवन तथा पुरुषों में शराब के अधिक सेवन से मोटापा बढ़ता है। मानसिक तनाव का पाचन तंत्र एवं हार्मोन्स के स्राव पर बुरा प्रभाव पड़ता है इससे शारीरिक क्षमता कम हो जाती है जिसके कारण शरीर में वसा जमा होने लगता है।

आयुर्वेदानुसार व्यायाम न करना, दिवास्वप्न (दिन में सोना), श्लेष्मल आहार (कफवर्धक पदार्थ), मधुर पदार्थों का अतिसेवन, स्निग्ध (चिकने, तले मुने) पदार्थों का अधिक सेवन, अचिन्ता (चिन्ता न करना) आदि कारणों से मेदोरोग या मोटापा उत्पन्न होता है। इसके अलावा बीजदोष (माता-पिता से संतान में आना), सुखासीन जीवन बिताना, शारीरिक श्रम बिल्कुल न करना आदि कारणों से मेदोरोग होता है। कफ तथा मेदोवर्धक आहार विहार से मेद (वसा) की वृद्धि होती है इस बढ़े मेद से स्रोतो में मार्गावरोध उत्पन्न होता है जिससे एक और दूसरी धातुओं को ठीक प्रकार से पोषण नहीं मिलता और दूसरी ओर मार्गावरोध से वायु प्रकुपित होती है। यह वायु कोष्ठ में जाकर कोष्ठाग्नि को अधिक प्रदीप्त करती है। जिससे रोगी को भूख अधिक लगती है और आहार रस का निर्माण भी होता है परंतु यह आहार रस जब धातुओं में जाता है तब मेद भी अधिक बन जाता है और अन्य धातुओं को पूर्ण पोषण नहीं मिल पाता है। इस प्रकार अन्य धातुओं की एक प्रकार की क्षयात्मक स्थिति से पुनः वातप्रकोप हो जाता है और पूर्ववत् चक्र चालू रहता है। इस प्रकार समानवायु द्वारा अग्नि संधुक्षण से खूब भूख लगती है और रोगी बहुत आहार लेता है और पचा जाता है और उससे मेदो धातु की ही अधिक उत्पत्ति होती है और इस प्रकार यह दूषित चक्र चलता रहता है साँस फूलती है, वह अधिक श्रम नहीं कर पाते है, प्यास तथा भूख अधिक लगती है। रोगी भूख सहन नहीं कर सकता है पसीना अधिक आता है इससे शरीर से दुर्गन्ध आती है। आलस्य अधिक रहता है तथा नींद भी ज्यादा आती है। रोगी में केवल मेद की ही अधिक वृद्धि होती है तथा अन्य धातुओं की कमी रहती है। धातुओं की विषमता के कारण मोटा शरीर दिखने पर भी उसे कमजोरी महसूस होती है। आयु का ह्रास होता है अर्थात् बुढ़ापा जल्दी आता है।

लक्षण :- मेदोरोग से ग्रसित व्यक्ति में संपूर्ण शरीर में विशेषतः पेट पर तथा नितम्ब में वसा का संचय होता है जिससे वह भारी हो जाते हैं तथा चलने पर अधिक हिलते हैं। अधिक चलने पर साँस फूलती है, वह अधिक श्रम नहीं कर पाते है. प्यास तथा भूख अधिक लगती है। रोगी भूख सहन नहीं कर सकता है पसीना अधिक आता है इससे शरीर से दुर्गन्ध आती है। आलस्य अधिक रहता है तथा नींद भी ज्यादा आती है। रोगी में केवल मेद की ही अधिक वृद्धि होती है तथा अन्य धातुओं की कमी रहती है। धातुओं की विषमता के कारण मोटा शरीर दिखने पर भी उसे कमजोरी महसूस होती है। आयु का ह्रास होता है अर्थात् बुढ़ापा जल्दी आता है। मैथुनशक्ति कम हो जाती है। मोटापा उपद्रव स्वरूप अनेक बीमारियों तथा परेशानियों को जन्म देता है जैसेः- हृदयरोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कोलेस्ट्राल में वृद्धि, मासिक धर्म में विकृति, स्त्रियों में गर्भधारण में देरी, साँस फूलना, जोड़ों में दर्द, पित्ताश्मरी, शरीर से बदबू आदि। रोगी को एग्जीमा जैसे त्वचा रोग हो जाते है। यह रोग धनी परिवारों में अधिक होता है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक होता है।

चिकित्सा :- आयुर्वेद में किसी भी रोग की चिकित्सा करने में निदान परिवर्जन को महत्त्व दिया गया है। निदान परिवर्जन का तात्त्पर्य उन कारणों को त्यागना या दूर करना है जिस कारण रोग हुआ है। सबसे पहले जीवन शैली में परिवर्तन लाकर आहार-विहार पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसमें औषध चिकित्सा से अधिक महत्त्वपूर्ण आहार-विहार का पालन करना है। निदान परिवर्जन जैसे अधिक भारी तथा चिकनाई युक्त पदार्थों, मिठाइयों का अधिक सेवन करना, सुपाच्य भोजन निश्चित समय से न लेना, दिन में सोना, व्यायाम न करना, सतत बैठकर काम करना आदि का त्याग करना चाहिए।

आहार ऐसा करना चाहिए जो हल्का तथा आसानी से पचने वाला हो। अधिक रेशेदार भोजन करना चाहिए। हरी सब्जियाँ, फल अधिक मात्रा में लेना चाहिए, लेकिन मीठे फल जैसे आम, केला आदि कम लेने चाहिए। जूस की बजाय फलों का सेवन करना चाहिए जिससे फाइबर शरीर में पहुँच सकें। रोटी जौं, चना, गेहूँ की खानी चाहिए तथा उसके आटे का चोकर नहीं निकालना चाहिए। चावल का प्रयोग नहीं या थोड़ी मात्रा में पुराने चावल का सेवन करना चाहिए। दालों में मूंग, मौठ, कुलथी की दाल का प्रयोग करना चाहिए। अरहर तथा उड़द की दाल कम मात्रा में खानी चाहिए। सब्जियों में बथुआ, पालक, मेथी, चौलाई, मूली, टमाटर, पत्तागोभी, परवल, तोरई, करेला का प्रयोग करना चाहिए। सुबह खाली पेट शहद ठण्डे पानी में घोल कर पीने से वजन घटता है लेकिन शहद असली होना चाहिए। इसके पीने से शरीर में लेखन कर्म होता है जिससे वजन कम होता है। सप्ताह में एक बार उपवास रखना चाहिए। उपवास का मतलब यह नहीं कि दिनभर भूखे रहें तथा रात में खूब तला-भुना, मीठा आहार करें बल्कि उपवास में सिर्फ जल या फलों का सेवन करना चाहिए।

आहार-नियन्त्रण के साथ-साथ नियमित व्यायाम करना जरुरी है। व्यायाम करने से कैलोरी का व्यय होता है जिससे वजन कम होता है। नियमित व्यायाम करने से चयापचय् की क्रिया तीव्र होती है जिसके कारण वसा का उचित व्यय होता है। प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा मोटापे से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके लिए उपवास, मालिश, मिट्टी चिकित्सा, जल चिकित्सा आदि का प्रयोग किया जाता है। इसके अन्तर्गत गर्म, ठण्डा स्नान, वाष्प स्नान, धूप स्नान, कटि स्नान, गीली चादर लपेटना, वैज्ञानिक मालिश, एनिमा आदि का सहारा लिया जाता है। इन सबको प्राकृतिक चिकित्सक की सलाह पर करना चाहिए।

पंचकर्म चिकित्सा मेदो रोग में अत्यन्त लाभकारी है। यह आयुर्वेद की शरीर शोधन की प्रक्रिया है।

औषधि चिकित्सा के अंतर्गत त्रिफला चूर्ण, त्रिकटु चूर्ण, मेदोहर गुग्गुल, गोक्षुरादि गुग्गुल, पुनर्नवादि गुग्गुल आरोग्यवर्धनीवटी, शुद्ध शिलाजीत, विडंगादि लौह, त्र्यूंषणादि लौह, फलात्रिकादि क्वाथ, लोहासव आदि औषधियों का प्रयोग मोटापा की चिकित्सा में किया जाता है। इसके अलावा यदि मोटापा का कारण अंतस्त्रावी ग्रंथियों के स्राव का असंतुलन है तो उसकी भी चिकित्सा कराई जानी चाहिए। मोटापा कम करने तथा अन्तः स्रावी ग्रन्थियों के स्रावों  को सन्तुलित करने के लिए योग चिकित्सा प्रभावी माध्यम हैं क्योंकि इनसे शारीरिक तथा मानसिक दोनों पहलुओं का उपचार होता है। इसके अंतर्गत ग्रामरीः नाड़ीशोधन, उज्जायी प्राणायाम तथा पश्चिमोत्तासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन, शलभासन तथा सूर्य नमस्कार लाभकारी है। औषधियां, पंचकर्म तथा योगासनों का प्रयोग चिकित्सक के परामर्शानुसार करते हुए अपना वजन नियन्त्रित करें व स्वस्थ जीवन व्यतीत करें।

डॉ. बाबीता केन

डॉ. बबीता केन

एम. डी. (आयुर्वेद) प्रभारी चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय,
तातोमुरैनी, सुल्तानपुर (उ.प्र.)
नवनाथ हर्बल्स नाशिक

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