सीओपीडी या क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज एक पुरानी सूजन संबंधी फेफड़ों की बीमारी है, जो फेफड़ों में वायु प्रवाह में बाधा उत्पन्न करती है। इसमें व्यक्ति को सांस लेने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई व्यक्तियों को इस बीमारी के बारे में तब तक पता नहीं चलता जब तक कि इसके लक्षण उनके जीवन को काफी हद तक बदल नहीं देते। सीओपीडी को दुनिया में मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण माना गया है। आयुर्वेद में सीओपीडी का संबंध “तमक श्वास” नामक श्वास विकार से है। चिकित्सकों के पास ऐसे अनेकों रोगी चिकित्सा के लिए आते हैं, जिन्हें तीन मुख्य तकलीफ होती हैं लंबे समय से सांस लेने में कठिनाई, लंबे समय से चली आ रही खाँसी तथा लंबे समय से कफ या बलगम निकलने की समस्या। रोगी व रोग की परीक्षा करने पर पता चलता है कि ऐसे रोगी, जीर्ण श्वासवह स्रोतोरोध (क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज COPD) से पीड़ित होते हैं। इसमें दो रोग को जोड़ कर एक नाम दिया गया है जीर्णकास (Chronic bronchitis) तथा उरःक्षत (Emphysema)। इन दोनों में श्वासनलिकाओं में पुरानी सूजन (Chronic inflammation) मुख्य विकृति होती है।

वर्तमान में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण अधिकांश लोग इस रोग से पीड़ित हो रहे है। सीओपीडी से हृदय रोग, फेफड़ों के कैंसर और कई अन्य स्थितियों के विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। सीओपीडी फेफड़ों से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है, जिसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है हालांकि, उचित उपचार एवं स्वस्थ जीवनशैली को अपनाकर इसके लक्षणों और आगे बढ़ने वाले खतरों को कम किया जा सकता है।

सीओपीडी के कारण

सीओपीडी के सबसे अधिक मामले धूम्रपान के कारण होते हैं क्योंकि सिगरेट व तम्बाकू के धुएं से निकलने वाले जहरीले तत्त्वों के संपर्क में लंबे समय तक रहने से फेफड़ों को नुकसान पहुंचता हैं। धुएं से निकलने वाले जहरीले तत्व वायुमार्ग की दीवारों में जलन और सूजन पैदा करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पुरानी श्वसन संबंधी बीमारियाँ होती हैं। वायु प्रदूषण के लगातार संपर्क में रहने से सीओपीडी विकसित हो सकता है, विशेष रूप से आनुवंशिक रूप से प्रवृत्त या पूर्व धूम्रपान करने वालों में। निर्माण, खनन और कृषि सहित ऐसे व्यवसायों में काम करने वाले कर्मचारी जो धूल, रसायनों और धुएं के संपर्क में आते हैं, उनमें सीओपीडी विकसित हो सकता है। एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार, अल्फा-1 एंटीट्रिप्सिन की कमी, सीओपीडी का एक कारण है जिसमें शरीर में एक प्रोटीन की कमी होती है जो फेफड़ों को क्षति से बचाता है। इसकी कमी वाले लोगों को धूम्रपान न करने पर भी सीओपीडी विकसित हो सकता है। दूसरों के सिगरेट के धुएं के संपर्क में आने से भी सीओपीडी का खतरा बढ़ सकता है। सामान्य श्वसन संक्रमण जैसे कि तपेदिक, कोविड-19, निमोनिया विशेष रूप से बचपन के दौरान, फेफड़ों के विकास और कार्य को प्रभावित कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वयस्कता में सीओपीडी का खतरा बढ़ जाता है। पहले से मौजूद ब्रोन्कियल अस्थमा जिसका उचित उपचार नहीं किया गया था।

सीओपीडी के लक्षण

सीओपीडी धीरे-धीरे विकसित होता है और इसके लक्षण शुरुआत में स्पष्ट हो सकते हैं। फिर भी, जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, लक्षण अधिक गंभीर होते जाते हैं और दैनिक गतिविधियों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं। सीओपीडी के प्रमुख सामान्य लक्षणों में से एक है लगातार खांसी, जो बलगम उत्पन्न करती है यह अक्सर सुबह के समय अधिक, विशेष रूप से क्रोनिक ब्रोंकाइटिस वाले व्यक्तियों में होती है। सीओपीडी रोगियों में वायुमार्ग संकुचित हो जाने के कारण सांस लेते समय, विशेष रूप से सांस छोड़ते समय, सीटी जैसी आवाज आना और घरघराहट होना। थोड़ा परिश्रम के बाद भी थकान या सांस फूलना सीओपीडी का एक अन्य सामान्य लक्षण है। सीओपीडी रोगियों में तीव्र श्वसन संक्रमण जैसे- निमोनिया या ब्रोंकाइटिस का खतरा बढ़ जाता है जिससे लक्षण और भी गंभीर हो सकते हैं। जैसे-जैसे सीओपीडी उन्नत अवस्था में पहुंचता है. रोग के परिणामस्वरूप निचले अंगों में सूजन के साथ द्रव का संचय हो सकता है।

सीओपीडी की रोकथाम व उपचार

सीओपीडी की रोकथाम का सबसे अच्छा उपाय है जिन कारणों से सीओपीडी हुआ है उन कारणों को दूर करना हालाँकि आनुवंशिकता जैसे कुछ कारकों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, लेकिन जीवनशैली में कई बदलाव करके इस बीमारी के विकास को रोका जा सकता है। धूम्रपान छोड़ने से बीमारी की प्रगति को धीमा करने और फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार करने में मदद मिल सकती है। अच्छा पोषण और शारीरिक गतिविधियां फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ा सकता है और सीओपीडी के विकास को रोक सकता है।

आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श अनुसार निम्न उपचार व आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन करने पर सीओपीडी के लक्षणों और समस्या बढ़ने के खतरों को कम किया जा सकता है।

सीओपीडी से ग्रसित व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी का अनुभव होता है। इस स्थिति से बचने के लिए रात में सोते वक्त घी का प्रतिमर्श नस्य लें।

सीओपीडी के रोगियों को वायु प्रदूषण बढ़ने पर गुड़ का सेवन करना चाहिए। गुड़ के सेवन से हमारे शरीर में मौजूद दूषित पदार्थ दूर हो सकते हैं।

सीओपीडी के लक्षणों को कम करने के लिए दिन में 2 से 3 बार तुलसी और अदरक की चाय का सेवन कर सकते हैं।

सीओपीडी के रोगियों को सूखी खांसी होने पर मुलेठी का प्रयोग कर सूखी खांसी को दूर किया जा सकता है। जब रोगी के सीने से कफ नहीं निकलता है, तो मुलेठी का प्रयोग लाभदायक हो सकता है।

पिप्पली व सैंधव चूर्ण को गर्म पानी के साथ देने से और सोंठ, मिश्री को पुराने गुड़ में मिलाकर देने से सीओपीडी में लाभ होता है।

धतूरे के पत्ते एवं मुलेठी चूर्ण को कड़ाही में गर्म करने से उठे धुएं की भाप लेना श्वास वाहिनियों का संकोच नष्ट कर ब्रॉन्कोडायलेटर के रूप में काम करता है।

गुडुची, वासा, पुनर्नवा, भारंगी, पुष्करमूल, अश्वगन्धा, अर्जुन, खदिर, ब्राह्मी, कुटकी, दशमूल, सितोपलादि चूर्ण, तालिसादि चूर्ण, श्रृंग्यादि चूर्ण, हरिद्रादि चूर्ण, हरिद्रा खण्ड, श्वासान्तक वटी, संशमनी वटी, गिलोयधन वटी, वासावलेह, अगस्त्यहरितकी, कफकेतु रस, कफकुठार रस, श्वासकुठार रस, श्वासकासचिन्तामणि रस, चन्द्रामृत रस, त्रिभुवन कीर्ति रस, कनकासव, द्राक्षासव, अर्जुनारिष्ट, अश्वगंधारिष्ट, दशमूलारिष्ट, वासारिष्ट, वासाधृत, तालीसादि घृत, वंशलोचन, शिलाजतु, गोदन्ती भस्म, अभ्रक भस्म, श्रृंग भस्म, टंकण भस्म, ताम्र भस्म, शंख भस्म, मुक्ताशुक्ति, स्वर्णमाक्षिक, मयूरपिच्छ भस्म, शुद्ध स्फटिका, श्वेत पर्पटी आदि औषधियों का सेवन चिकित्सक के परामर्शानुसार करने से सीओपीडी में लाभ पहुंचता है।

सीओपीडी में उपयोगी योगासन व प्राणायाम

नियमित योग-प्राणायाम करने से श्वसन क्षमता में सुधार होता है। सूर्य नमस्कार, सुखासन, पवन मुक्तासन, सर्वांगासन, सुप्त वज्रासन, उष्ट्रासन, हस्त उत्तानासन, मत्स्यासन, पादहस्तासन, बद्ध प‌द्मासन, नाड़ी शोधन, कपालभाति, भस्त्रिका, भ्रामरी प्राणायाम सीओपीडी रोगियों के लिए लाभदायक होते हैं, जो योग्य योग चिकित्सक के परामर्श अनुसार करने चाहिए।

क्या खाएं

मांसपेशियों को मजबूत रखने और संक्रमण से लड़ने के लिए भोजन में पर्याप्त प्रोटीन शामिल करें। विटामिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थ, आंवला, अमरूद, सेब, अंगूर, अंजीर आदि फल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, शिमला मिर्च, सीताफल, गाजर तथा साबुत अनाज, लहसुन, प्याज, हल्दी, अदरक, सोंठ, लौंग, काली मिर्च, पिपली, चित्रक, दालचीनी फेफड़ो के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं। उचित मात्रा में पानी पीयें, जिससे रक्त संचरण बेहतर होता है और फेफड़ों को हाइड्रेटेड रखता है। अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए किसी डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ से सलाह लें सकते हैं।

क्या न खाएं

दूध और दूध से बने उत्पाद जैसे मक्खन, पनीर, दही, नमक का सेवन कम करें, फास्ट फूड व तले हुए और चिकनाई वाले खाद्य पदार्थ, अचार, चाय, कॉफी, शीतल पेय, आइसक्रीम, शक्कर व मैदे से बने पदार्थ के सेवन से बचना चाहिए। खाने में रिफाइंड का प्रयोग न करें। धूम्रपान, शराब के सेवन से बचें। फेफड़ों को उत्तेजित करने वाली वस्तुएं जैसे धुआं और वायु प्रदूषण के संपर्क में न रहें और ठंडी हवा से बचना चाहिए।

 
Writer Suresh Kumar

डॉ. सुरेश कुमार
M.D. (Ay.), P.G.D.N.Y.Sc.
प्रभारी चिकित्साधिकारी राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय एवं योग वेलनेस सेंटर, तेलीबाग, लखनऊ (उ.प्र.)

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