
हमारे शरीर के बाहरी जख्मों और अंदरूनी जख्मों का आसानी से उपचार किया जा सकता है। जैसे हाथ में या पैरों में चोट लग जाये तो हम बाहर से दवाई या मलम लगा कर ठीक कर सकते है या पेट या सिर दर्द हो तो दवाई खाकर ठीक हो सकते है लेकिन मेंटल हेल्थ प्रॉब्लेम का वैसा नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या काफी देर से पता चलती है, जब आपका दैनंदिन जीवन प्रभावित होता है। मानसिक स्वास्थ्य का मतलब होता है भावनात्मक, मानसिक तथा सामाजिक सुदृढता। यह मनुष्य की सोचने, समझने और महसूस करने और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करता है।
आजकल इस स्पर्धात्मक दुनिया में सब दौड़ रहे हैं, जिससे सभी का मानसिक स्वास्थ्य खराब हो रहा है। मानसिक समस्या आपके जीवन को प्रभावित करती है। नकारात्मक सोच और अति विचार करने की आदत जिसे हम व्अमतजीपदापदह कहते हैं। ये मानसिक स्वास्थ्य बिगाड़ने के सबसे बडे कारण है। अगर ये समस्या अधिक बढ़ जाये तो हमारे शरीर और मन पर उनका बहुत प्रभाव पड़ता है। नकारात्मक विचार ही कई समस्याओं का कारण होते है जैसे चिंता होने वाली शारीरिक और मानसिक बिमारी, डिप्रेशन, स्ट्रेस , आत्मविश्वास की कमी। नकारात्मक सोच एक फंगस की तरह काम करती है जो आपके मन को कुंठित करता है। इस वजह से आपके सहज जीवन में बारबार रूकावटें पैदा करती है। जीवन किसी का भी और कभी भी सरल नहीं होता। वो अनिश्चितताओं से भरा होता है। अगर हम नकारात्मक सोच लेकर बैठे कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा या कुछ अच्छा नहीं हो सकता तो जीवन आगे कैसे बढेगा, हमारा विकास कैसे होगा?
नकारात्मक सोच से हमारे जीवन का आनंद खत्म हो जाता है। बार-बार कुछ बुरा होगा ऐसे सोचने से एक भय का वातावरण निर्माण होता है और इंसान हमेशा दुःख मे रहने लगता है फिर इंसान को मन का रोग हो जाता है।
ऐसे बहुत से लोग है जो जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते क्योंकि वो नकारात्मक ही सोचते रहते हैं जो उन्हें मानसिक तौर से अपाहिज बनाती है।
मन और तन दोनों जुड़े हुए होते है। जैसा मन वैसा तन, जैसी सोच पालेंगे वैसे ही नये कोषों का निर्माण होगा। जो मन से नकारात्मक हो गया वो शरीर से भी हो जाता है। लंबे समय तक अगर नकारात्मक सोच रही तो शरीर आलसी बनता है, स्फुर्ति रहित होता है। बीपी बढ़ता है, हृदय पर उसका प्रभाव पड़ता है। नर्वस सिस्टम पर भी प्रभाव होता है, तनाव, अनिद्रा, दुःस्वप्न(बुरे सपने) जैसे लक्षण होने लगते है क्योंकि नकारात्मक सोच यह हमेशा चिंता और निराशाजनक ही होती है। इसलिए इन्सान दुसरे के मुकाबले खुद को कम समझने लगते है।
नकारात्मक विचार क्यों आते हैं ?
बीते हुए कल के बारे मे सोचना और अफसोस करना। जीवन में अच्छे बुरे पल तो आते ही है और सबको दोनों परिस्थितियों का सामना तो करना ही पड़ता है। व्यक्ति का व्यक्तित्व और स्वभाव यह 20% आनुवांशिकता और 80% आसपास, घर व स्कुल के माहौल से बनता है। हर व्यक्ति का कठिन परिस्थिती में सामना करने का एक तरीका होता है। कई बार व्यक्ति से गलतियां होती है लेकिन इंसान गलती करे, उससे सीखे और आगे बढ़े यह नहीं कर पाना, और उस घटना को लिपट कर बैठे रहता है और कुछ समय बाद वो बुरा समय भी निकल जाता है लेकिन व्यक्ति खुद को कोसता रहता है। बुरा समय, वो घटना याद करके दुखी होता है और नकारात्मक सोचने लगता है और फिर वो उसकी आदत बनने लगती है।
नकारात्मक माहौल में ही रहना
दुनिया में हर तरह के लोग होते हैं। अगर आप नकारात्मक सोच रखने वाले लोगों के साथ ज्यादा रहते हैं तो आपकी सोच भी नकारात्मक बनती है। आप नियमित रूप से हर घटना और हर परिस्थिती को नकारात्मक ही देखना शुरू करते हैं।
अगर हमारे माहौल के लोगों को नियमित रूप से अगर टीका टिप्पणी करने की आदत हो या यही जताते रहे कि ये बुरा है, इसमें ये कमी है, ये अच्छा ही नहीं है या ये अच्छा नहीं बना, या ये अच्छा नहीं दिखता, या नियमित रूप से नुक्स निकालने वाला माहौल है तो नकारात्मक सोचने की आदत बन जाती है।
खुद पर विश्वास ना होना
हमेशा खुद के लिए कम ही सोचना और यही सोचना कि “मैं कुछ कर ही नहीं सकता,” “मुझ से कुछ अच्छा होगा ही नहीं या मैं कुछ भी करूं गलत ही हो जाता है।” तो नकारात्मकता बढ़ती जाती है। इन्सान चाह कर भी केवल नकारात्मक विचारों और कम आत्मविश्वास के वजह से नकारात्मक भावना में अटक जाता है और चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता।
बहुत चिंता करने की आदत
चिंता करना एक नैसर्गिक प्रक्रिया है लेकिन बारबार हर छोटी बातों को लेकर चिंता करना अच्छी बात नहीं। आनेवाला कल कैसे होगा या कोई भी जीव का कैसे होगा यह किसी को भी पता नहीं होता लेकिन लोगों को अति चिंता करने की आदत के वजह से नकारात्मकता ज्यादा बढ़ती है और नकारात्मक विचार बढ़ने से कई चिंताओं की मानसिक बीमारियां होती है।
नकारात्मक घटना को स्वीकार न करना
व्यक्ति नकारात्मक घटना को स्वीकार नहीं करते, वो यही सोचते रहते है कि ये ऐसे कैसे हो गया? तो मेरे साथ होना नहीं चाहिये था। मेरे ही साथ क्यों हुआ? नकारात्मक कोई भी बात मेरे साथ तो होनी ही नहीं चाहिये। इस अस्वीकार से नकारात्मक सोच बढ़ती है।
अपनी नकारात्मक सोच को कैसे बदले
1. बीते हुए वक्त के बारे मे ना सोचे, जो भी हो गया वो हो गया, अब वहां से आगे कैसे बढ़ना है, इसके बारे में सोचना शुरू करे।
2. नकारात्मक लोगों के साथ ज्यादा ना रहें। सकारात्मक ओर हंसमुख लोगों के साथ ज्यादा रहें।
3. नकारात्मक, कठिन परिस्थिती, व्यक्ति या घटना को स्वीकार करें। मनुष्य का जीवन अप्रत्यक्षित होता है, कभी भी किसी के साथ कुछ भी हो सकता है। जब हम ऐसी परिस्थितियों को स्वीकार करते है। तो ही हम आगे का सकारात्मक विचार कर सकते है।
4. जीवन की समस्याओं को ले कर ना बैठे, उसे सुलझाने का प्रयास करें।
5. नकारात्मक विचार बिल्कुल ही नहीं आयेगा ऐसा नहीं हो सकता है। अगर आएंगे तो उसे किसी के साथ बात करके निकाले या उन्हें लिखें।
7. किताबें, टी.वी., मोबाईल मे प्रेरणा देनेवाले कार्यक्रम देखें या पढ़े।
8. हंसना भी बहुत जरूरी है। लाफ्टर थेरपी भी अपनाएं। सारा दिन उदास और गंभीर ना रहे। हंसते रहे, छोटी छोटी बातों का जोक बनाकर खुद भी हंसते रहे और दूसरों को भी हंसाते रहे।
9. दिनभर काम में व्यस्त रहे, अगर आप व्यस्त रहे तो नकारात्मक सोच के लिए वक्त ही नही मिलता।
10. अपने शौक जारी रखे। अपने हॉबीज को बनाए रखे, उसे छोड़ ना दे क्योंकि अपने हॉबीज को जीते हुए व्यक्ति बहुत रिलॅक्स रहता है।
11. अपने परिवार को वक्त दे, उनके साथ अच्छा वक्त बिताएं।
12. फिर भी अगर नकारात्मक विचार कम न हुए उन विचारों के वजह से बहुत ज्यादा परेशान है तो आप अपना रोज का काम ठीक से नही कर पा रहे तो, आपका काम में ध्यान नहीं लग रहा तो, जरूर इसे नॉर्मल ना समझे। तब व्यक्ति ने मनोवैज्ञानिक को जरूर दिखाएं।
13. खेल, गाना, नृत्य मे रूचि लें। अगर आपको कोई भी खेल मे रूचि है तो जरूर खेलें। इनडोर, आऊटडोर कोई भी खेल खेलें। उससे नकारात्मक सोच कम करने में बहुत फायदा होता है। साथ में ही गाना सुने या गाये या नृत्य करें। यह आपके मनःस्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है।
14. स्वस्थ आहार रखें, अच्छा खाना खाएं। कई बार अच्छा आहार ना होने के कारण शरीर में कई चीजों की कमी हो जाती है और फिर उदास लगना, आलसी लगना, काम में मन न लगना, याद न रहना, आत्मविश्वास कम होना, चिड़चिड़ करना, बहुत गुस्सा करना और बहुत खुद के लिए नकारात्मक विचार आना शुरू हो जाते है। इसलिए अच्छा और संतुलित आहार होना बहुत जरूरी है।
15. घटना, परिस्थीतियों को देखने का नजरिया बदलना होगा। नकारात्मकता से कुछ हासिल नहीं होता अपना दृष्टिकोण सकारात्मक करना चाहिए।

डॉ. रूपाली सरोदे
क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट
वर्धा


