यह त्वचा से संबंधित विकार है जिसमें त्वचा पर एक प्रकार का छाला (Rash) होता है जो कि रोगप्रतिरोधक क्षमता की कमी से होता है। कुछ रुग्णों में त्वचा का यह विकार कुछ सप्ताह या महीनों के पश्चात स्वयं ही ठीक हो जाता है। अधिकांशतः इसकी लाक्षणिक चिकित्सा की जाती है। हालांकि रोगी को इससे असुविधा होती है पर यह खतरे से युक्त (Dangerous) नहीं होता। अलग-अलग रूग्णों में भिन्न-भिन्न कारणों से होता है।

लाइकेन प्लेनस एक विशिष्ट प्रकार का चर्म रोग है जिसमें त्वचा पर चपटे, उभार युक्त, चिकने, लाल आभायुक्त अथवा गुलाबी आभा वाले (Violet) चकत्ते प्रथम कलाई, आगे की बाँह एवं घुटनों पर निकलते हैं आर उसके बाद समस्त बाहु, पैर, टखने, जांघ, बगलों, नितम्बों एवं उदर के निम्न भागों में निकलते हैं।

Lichen planus is best regarded as reaction pattern of skin due to diverse cause such as drugs, sunlight, psychological trauma & infections- In large number of cases eruption is idiopathic.

सर्व प्रथम लाइकेन प्लेनस रोग का वर्णन William James Erasmus Wilson (1867) ने किया। अभी तक इसके कारण का पता नहीं लगा, समझा जाता है कि संभवतः नाड़ी मण्डल के विक्षोभ (Exhaustion) से या सम्भवतः अजीर्णजनित किसी विषद्रव्य (Intestinal Toxaemia) या किसी विषाणु (Virus) या किसी विषैली औषधि के अन्तश्चर्म (Dermis Layer) की सुक्ष्म रक्तवाहिनियों में अधिक मात्रा में आ जाने से वे शिथिल होकर फैल जाती है जिससे कहीं-कहीं पर अन्तश्चर्म में सूजन हो जाती है।

प्रमुख कारण :- विषाणु संक्रमण (Viral Infection), एलर्जी, तनाव व जीन्स के कारण यह त्वचा का रैश होता है। कभी-कभी यह Autoimmune रोग के अंतर्गत होता है। यह संक्रामक रोग नहीं (Non Contagious) है। बहुत कम रूग्णों में यह गंभीर (सीरियस) व वेदना युक्त स्थिती होती है। इसके उपचारार्थ औषधि व स्थानिक प्रयोग हेतु औषधि दी जाती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करने वाली (Suppress) औषधि का भी प्रयोग करते है।

लक्षण : बैगनी रंग का छाला जिसकी ऊपरी सतह सीधी होती है। यह त्वचा पर या जननांगों की त्वचा पर होता है जो कि चिपके हुए परतों (Scales) से ढका रहता है। सप्ताह या महीने तक यह पूरे शरीर में फैल जाता है व छाले की जगह खुजली भी होती है। मुंह में सफेद रंग का चट्टा होता है जिसमें वेदना या दाह युक्त फफोले होते है जो कि फुटकर Scabby बन जाते हैं।

लाइकेन प्लेनस का अधिकांशतः पाया जाने वाला प्रकार त्वचा को आकान्त करता है। कुछ सप्ताह में ये फैल जाता है। 6 से 16 माह तक रूग्ण बिलकुल ठीक हो जाता है।

सबसे कम होने वाले प्रकार त्वचा के समीप होने वाला स्थान (Areas Besides the Skin) या जननांग में होने वाले में होते है। इसके अंतर्गत छाले म्यूकस मेम्ब्रेन (Mucous Membranes), नख (Nails) व सिर की त्वचा (Scalp) में होते है। आयु के किसी भी अवस्था में यह हो सकता है। कुछ कारणीभूत घटकों की वजह से यह कुछ ही लोगों में होता है। यह स्त्री-पुरुष दोनों को समान रूप से होता है। महिलाओं को दुगुना होने की संभावना रहती है। बाल्यावस्था या वृद्धावस्था में यह बहुत कम हो जाता है। मध्य वय (Middle Age) के व्यक्ति में होता है।

प्रकार :- कारणों एवं आकार-प्रकार की दृष्टि से इनके निम्नलिखित कई प्रकार के होते हैं-

1) लाइकेन पिटिका नाइटिड्स (Lichen Nitidus)

2) रोम शैवाक या प्लैनो पिलरिस (Lichen Planopilaris)

3) समतल शैवाक (Lichen Planus)

4) यक्ष्माभ शैवाक (Lichen Scorfulosorum)

5) शोषी कठीन शैवाक (Lichen Sclerosuset Atrophicus)

6) कंटक शैवाक (Lichen Spinulosus)

7) रेखित शैवाक (Lichen Striatus)

8) उपदंशज शैवाक (Lichen Syphiliticus)

9) शीतपित्त शैवाक (Lichen Urticatus or Papular Urticaria)

अन्य (Risk Factors) : परिवार का कोई सदस्य लाइकेन प्लेनस या वायरल रोग जैसे हिपेटाइटिस सी से ग्रस्त हुआ हो तो अन्य सदस्य को अधिक होने की संभावना होती है। कुछ रासायनिक पदार्थों की वजह से भी यह होता है जो एलर्जन की तरह कार्य करते है। ये एलर्जन एन्टीबायोटिक, आर्सनिक, स्वर्णधातु, आयोडीन, मूत्रल औषधियां (Diuretics), मलेरिया की औषधि, टेट्रासाइक्लीन व भिन्न-भिन्न प्रकार की डाय इत्यादि हो सकते हैं।

निदान :- लाइकेन प्लेनस का निदान त्वचा का रैश देखकर ही हो जाता है। शरीर की त्वचा मुखगुहा या जननांगो (Genitals) पर छाला होने पर देखकर ही डॉक्टर या डर्मेटोलॉजिस्ट निदान करता है। अन्यथा बॉयोप्सी के द्वारा भी इसकी जांच होती है। इसके अलावा एलर्जी की भी जांच की जाती है। यदि लाइकेन प्लेनस का कारण संक्रमण है तो हिपेटाइटिस सी (Hepatitis C) की लेबारटरी जांच भी अवश्य की जाती है।

उपचार : लाइकेन प्लेनस के अल्प तीव्रता में रोगी कुछ सप्ताह या महिनों में स्वयं ही ठीक होता है। यदि लक्षणों के कारण रोगी असहज महसूस करता है या अधिक तकलीफ में औषधि चिकित्सा की आवश्यकता होती है। आधुनिक चिकित्सा शास्त्रानुसार इसका स्थायी इलाज नहीं है पर औषधि से लक्षणों की तीव्रता कम होती है।

औषधि में रेटीनॉइड (VIt.A से संबंधित). कार्टीकोस्टेराइड, एन्टीहिस्टेमीन, नानस्टैराइड क्रीम का प्रयोग किया जाता है। लाइट थेरेपी के अंतर्गत Ultraviolet Light से चिकित्सा की जाती है।

नाडी विक्षोभ से यह रोग होता है अतः मनः प्रसाधक औषधि से लाभ होता है। इस उद्देश्य से कोई शामक Phenobarbitone व चित्त शामक Tranquillizer औषधियों से भी लाभ होता है। रोगी की प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए उसे Vitamin B Complex कुछ काल देना चाहिए। Corticosteroids अर्थात Prednisolone उचित मात्रा में 2 सप्ताह के प्रतिदिन देने से तथा Hydrocortisone । प्रतिशत मलहम या Cream के या Prednisolone की 25% मलहम या Betamethasone की क्रीम लगाने से भी इसमें शीघ्र लाभ होता है।

उपद्रव (Complication) : लाइकेन प्लेनस यदि स्त्री जननांग में हुआ तो उसका उपचार अत्यंत मुश्किल है। इसके कारण महिला को पीड़ा, छाले व संभोग के समय असुविधा होती है। लाइकेन प्लेनस के निरंतर रहने से Squamous Cell Carcinoma का खतरा रहता है।

घरेलू उपचार

1) लाइकेन प्लेनस के उपचार के छाले को खुजलाएं नहीं।

2) ओटमील बाथ लेने से रैशेस में फायदा होता है।

3) रैश पर ठंडे पानी का लाभ होता है।

4) सनस्क्रीन लोशन का प्रयोग लाभकारी होता है।

आयुर्वेद मत

आयुर्वेदानुसार लक्षणों के आधार पर इसे किटिभ रोग माना जा सकता है। बहिश्चर्म के कोष्ठकों में वात, कफ प्रकोप जनित, जो कुछ श्याम वर्ण, रूक्ष, कोठ समीप-समीप निकल आते हैं उन्हें किटिभ कहा गया है। बहिश्चर्म के सेलों में कफ प्रकोप से तो अतिवृद्धि होती है तथा शरीर में वायु दोष की वृद्धि से इन सैलों में रूक्षता, कर्कशता के लक्षण उत्पन्न होते हैं। इस रोग में पंचनिम्बचूर्ण का प्रयोग करें या रसमाणिक्य, मल्ल सिन्दूर का एक रत्ती की मात्रा में कुछ काल तक दिन में दो बार मधु, घृत के साथ प्रयोग करें।

बाह्य उपचारार्थ उपयोगी कुछ लेप

लाक्षादि लेप – लाख, राल, कूठ, हल्दी, सफेद सरसों, त्रिकटु, मूली के बीज, चक्रमर्द के बीज सम भाग लेकर जल के साथ पीसकर लेप करें। यह दाद रोग में भी विशेष लाभकरता है।

तुम्बर्वादि उद्वर्तन – नेपाली धनिया, सरसों, कुष्ठ, चित्रक, पटोल, नीमछाल, तुलसी, सैन्धव, दोनों हल्दी, हरताल, मनसिल, वचा, चोरक, देवदारू, सारिवा समान मात्रा का चूर्ण तक्र से पीसकर लगाएं।

चक्रमर्दादि लेप – चकवंड का बीज तथा दाल चीनी को पीसकर और दूध में भावित कर गोमूत्र मिला दे और लेप करें अथवा मदार तथा वेतस के कन्द को गोमूत्र के साथ पीसकर लेप करें। यह किटिभ कुष्ठ को दूर करता है।

पिप्पल्यादि लेप – पीपर, करंज, हर्रे, कुठ, गाय का पित्त (गोरोचन) तथा चित्रक सम भाग इन सभी को अच्छी तरह से पीसकर लेप करें। यह किटिभ कुष्ठ को नष्ट करता है इसकी चिकित्सकों ने प्रशंसा की है।

गोमूत्रदि लेप – मैनसिल, कासीस तथ तुतिया को सम भाग लेकर गोमूत्र के साथ पीसकर लेप लगाएं। यह किटिभ कुष्ठ, विसर्प तथा कुष्ठ को नष्ट करता है।

इसके अलावा आरग्वध पत्र रस या जात्यादि तेल के लगाने का भी विधान है।

लाइकेन प्लेनस रोग में पंचकर्म के अंतर्गत वमन, विरेचन, बस्ति रक्तमोक्षण व तक्रधारा के श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं। जीकुमार, आरोग्यधाम में पंचकर्म द्वारा शरीर शुद्धि करने के पश्चात औषधि सेवन से उत्तम लाभ मिल रहा है। अतः लाइकेन प्लेनस असुविधाजनक जरूर होता है पर खतरे वाला नहीं। औषधोपचार व पंचकर्म से इसके रैश स्वंय ही ठीक हो जाते है।

Dr Gurmukh Mamtani (SV-67)

डॉ. जी. एम. ममतानी
एम. डी. (आयुर्वेद पंचकर्म विशेषज्ञ)
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग, जरीपटका, नागपुर

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