अत्यधिक पसीना आना एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ विकार है, जिसे चिकित्सा भाषा में Hyperhydrosis कहा जाता है। सामान्य रूप से पसीना आना एक प्राकृतिक तरीका है, लेकिन जब यह आवश्यकता से अधिक होने लगे और बिना किसी स्पष्ट कारण के हो, तो यह एक समस्या का संकेत बन जाता है। व्यक्ति को अत्यधिक पसीना आने से उसके दैनिक जीवन, आत्मविश्वास और सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अतः अत्यधिक पसीना आना केवल एक शारीरिक समस्या नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण विकार माना जाता है, जिसके कारणों और उपचार को समझना आवश्यक है।
आयुर्वेदानुसार शरीर के तीन मल बताए गए है स्वेद, मूत्र, पुरीष। स्वेद अर्थात पसीना। यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। एक उचित मात्रा में पसीना शरीर से बाहर निकलना नॉर्मल कहा गया है जबकि अधिक मात्रा व्याधियों का कारण हो सकता है।
पसीना आना एक ऐसी प्रक्रिया है जो ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम के नियंत्रण में रहती है। पसीना आना शरीर के तापमान को नियंत्रण में रखने के लिए एक प्रकार की रक्षात्मक प्रणाली है। किसी भी वजह से शरीर के बहुत ज्यादा गर्म होने की स्थिति में पसीना आना स्वाभाविक है लेकिन बहुत ज्यादा पसीना आना जो आवश्यकता से अधिक हो उसे हाइपरहाइड्रोसिस कहा जाता है और यह वाकई कष्टप्रद है। यह सभी उम्र के लोगों और महिला-पुरुष दोनों को प्रभावित करता है। भले ही यह, एक सामान्य समस्या हो लेकिन लोग अब भी इस स्थिति के बारे में बात करने में हिचकिचाते हैं और इसके लिए उचित रूप से मेडिकल सहायता नहीं लेते हैं।
पसीना शरीर के विभिन्न हिस्सों में होता है जिसमें कांख (बगलों), हथेली, तलवे, माथे और अन्य हिस्से शामिल हैं। लगभग 3% आबादी इससे प्रभावित होती है। बहुत ज्यादा पसीना आना दैनिक जीवन की विभिन्न गतिविधियां करते हुए ढेर सारी दिक्कतें पैदा करता है। उदाहरण के लिए पसीने भरे हाथ से पकड़ बनाने में दिक्कत होती है। गाड़ी चला रहे हों और अधिक पसीना आए तो स्टेयरिंग पकड़ने में दिक्कत होती है। लंबे समय तक कांख में पसीना आने से बदबू पैदा होती है और कपड़ों पर दाग-धब्बे भी आ जाते हैं। अधिक पसीने से त्वचा नम रहती है जिससे फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण होने की आशंका बढ़ जाती है। इस स्थिति से निजात न मिल पाने की वजह से निराशा, आत्मविश्वास की कमी, अवसाद पैदा हो सकता है।
अधिक पसीना आने के कारण
हार्मोनल स्थिति – महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान व मेनोपॉज के समय फिजियोलॉजिकली अधिक पसीना आता है इसके अलावा गर्भाशय को शल्य चिकित्सा द्वारा निकालने के बाद होने वाली रजोनिवृत्ति भी इसका कारण हो सकती है। एस्ट्रोजन युक्त उत्पादों का उपयोग और हाल ही में हुई प्रसूति के कारण भी बहुत पसीना आ सकता है।
अन्य हॉर्मोनल रोग – थायरॉयड फंक्शन, न्यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर से भी बहुत अधिक पसीना निकल सकता है. महिलाओं में एस्ट्रोजन और पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन की कमी से अत्यधिक पसीना आ सकता है।
संक्रमण – मलेरिया, टाइफाइड, स्क्रब टाइफस भी हो सकता है. जोड़ों का दर्द, पीठ दर्द, हाल ही में दांतों का इलाज करवाया हो तो हृदय के वाल्व में संक्रमण हो सकता है, अगर वाल्व मूलतः सामान्य नहीं है तो भी अधिक पसीना आ सकता है।
न्यूरोलॉजिकल समस्याएं – रीढ़ की हड्डी में चोट, स्ट्रोक और कुछ अन्य न्यूरोलॉजिकल विकार अत्यधिक पसीना आने का कारण बन सकते हैं। इसके अलावा ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम डिसॉर्डर व पेरिफेरल नर्वस डिसॉर्डर के कारण भी पसीना अधिक आ सकता है।
औषधियों के कारण पसीना – ब्लड शुगर को कम करने वाली एंटी डायबिटिक दवाएं पसीने का कारण बन सकती हैं। इंसुलिन स्रावित करने वाले ट्यूमर हाइपोग्लाइसेमिया और अत्यधिक पसीना आने का कारण बन सकते हैं। दवाएं जो ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती हैं जैसे कि एंटीडिप्रसेंट्स, एंटीकोलाइनेस्टेरेस, प्रोप्रेनॉलोल, पाइलोकार्पिन आदि। इसके अलावा मानसिक तनाव व एन्जाइटी में कुछ लोगों को पसीना आता है जैसे परीक्षा के समय, इन्टरव्यू के समय इत्यादि ।
रोग के कारण
डायबिटीज मेलिटस, हाइपरथायरॉइडिज्म, हृदय रोग, प्रोस्टेट कैंसर, किडनी, मोटापा, कैंसर इत्यादि रोगों के कारण अधिक पसीना आता हैं।
हाइपरहाइड्रोसिस 2 प्रकार होते हैं-
प्राथमिक हाइपरहाइड्रोसिस – कारण अज्ञात होता है।
द्वितीयक हाइपरहाइड्रोसिस – प्रायः दवाइयों के साइड इफेक्ट, न्यूरोलॉजिकल बीमारियां, चिंता से संबंधित होता है।
प्राथमिक हाइपरहाइड्रोसिस आमतौर पर कम उम्र (25 वर्ष या उससे कम) के लोगों में होता है, जिसमें 6 महीने से अधिक समय तक पसीना आता है और शरीर के दोनों तरफ दिखाई देता है। इसमें पारिवारिक इतिहास भी हो सकता है। हथेलियों में पसीना आना सबसे आम है। अक्सर यह युवा छात्रों में देखा जाता है, जो लिखते समय अपने हाथ गीले कर लेते हैं।
द्वितीयक हाइपरहाइड्रोसिस बाद में जीवन में होता है, पूरे शरीर में पसीना आता है और यह किसी अंतर्निहित कारण से जुड़ा होता है। दोनों ही स्थितियों में यह सामाजिक झिझक और सौंदर्य संबंधी चिंताओं का कारण बनता है। कई लोग शर्मिंदगी के कारण हाथ मिलाने से भी बचते हैं। इसका निदान लक्षणों और क्लिनिकल जांच के आधार पर किया जाता है।
आयुर्वेदिक उपचार
शतावरी – 1-2 ग्राम चूर्ण, घी या दूध के साथ लें।
गुडूची – 1-2 ग्राम चूर्ण, पानी के साथ लें।
चंदनबलालाक्षादि तेल – बाहरी उपयोग के लिए
आंवला चूर्ण – 1 चम्मच, पानी के साथ सेवन करें।
त्रिफला चूर्ण – 1 चम्मच, गुनगुने पानी के साथ लेने से लाभहोता हैं।
चंदनासव – 20 मि. ली. सुबह-शाम लेने से पसीना आना कम होता है।
आधुनिक चिकित्सा शास्त्रानुसार जब दवाओं या जेल से लाभ न मिले, सामाजिक शर्मिंदगी हो, जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो या सौंदर्य संबंधी चिंता हो, तब लंबे समय तक समाधान के लिए सर्जरी की सलाह दी जाती है।

डॉ. अंजू ममतानी
'जीकुमार आरोग्यधाम',
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग,
जरीपटका, नागपुर