शीतपित्त एक सामान्य त्वचा संबंधी समस्या है, जिसे आम भाषा में एलर्जी या पित्ती भी कहा जाता है। इस स्थिति में त्वचा पर अचानक लाल चकत्ते, खुजली, जलन और सूजन जैसी समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। यह समस्या अक्सर किसी खाद्य पदार्थ, दवा, मौसम में बदलाव या अन्य बाहरी कारणों के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होती है। हालांकि शीतपित्त आमतौर पर गंभीर नहीं होता, लेकिन यह व्यक्ति को काफी असहज कर सकता है। समय पर पहचान और उचित देखभाल से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। इस विषय में हम जानेंगे कि शीतपित्त के कारण क्या हैं, इसके लक्षण कैसे पहचानें और किन उपायों से इससे राहत पाई जा सकती है।
शीतपित्त जिसे सामान्य भाषा में जुड़पित्ती या पित्ती उछलना कहा जाता है, आज के समय का एक सामान्य रोग है। बच्चे से लेकर वृद्धों तक यह रोग कभी भी एक संकटमय रूप में उपस्थित हो जाता है और किसी-किसी को तो इतना तीव्र होता है कि दिन का चैन और रात की नींद ही गायब हो जाती है और व्यक्ति की रोजमर्रा की दिनचर्या प्रभावित होने लगती है। शीतपित्त त्वचा पर होने वाले लाल, उभरे हुए और खुजलीदार चकत्ते है, जो अक्सर ठंड, एलर्जी या इंफेक्शन, अनुचित खानपान, रहन-सहन, बढ़ता प्रदूषण तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी होने के कारण होते हैं। जिसमें त्वचा पर जलन और चुभन महसूस होती है। आधुनिक भाषा में इसे अर्टिकेरिया कहा जाता है। शीतपित्त एक संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है शीत पित्त या शीतता से संबंधित पित्त। आयुर्वेदानुसार यह शरीर में वात और पित्त दोष के असंतुलन से होता है। आमतौर पर यह शरीर में अतिसंवेदनशीलता या एलर्जी प्रतिक्रियाओं से जुड़ा होता है। स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु आयुर्वेद में आहार-विहार, दिनचर्या-ऋतुचर्या एवं आचार-रसायन आदि पर विशेष बल दिया गया है, क्योंकि उपचार से बचाव अच्छा माना जाता है। इसी कारण व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार खान-पान तथा ऐसे आहार जो आपस में गुण-वीर्य में विरुद्ध न हों, सेवन करने को कहा गया है। परन्तु आधुनिक जीवनशैली, समयाभाव आदि के कारण व्यक्ति विरुद्ध आहार का सेवन निरंतर कर रहा है और इस वजह से व्यक्ति के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता लगातार कम होती जा रही है जिसके कारण उसे एलर्जी संबंधी बीमारियां शीघ्रता से हो रही हैं।
शीतपित्त के कारण – शीतपित्त ठंडी हवा या पानी के सीधे संपर्क में आने से, ठण्डे तथा गरम के शरीर में एक साथ प्रभाव पड़ने से एवं मसालेदार और ठंडा भोजन करने से असात्म्य-विरुद्ध भोजन के एक साथ ग्रहण करने से, कीड़े के काटने से या दवाइयों से एलर्जी, देर रात तक जागने से उत्पन्न होता है। एलर्जी शब्द आज के समय में हमें अक्सर सुनने को मिल जाता है। एलर्जी एक प्रतिक्रिया होती है, जो हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। जो भी पदार्थ हमारे शरीर के सम्पर्क में आते हैं, उसे एलर्जन कहते है अर्थात एलर्जी उत्पन्न करने वाले। यदि हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता सही है, तो हमें एलर्जी संबंधी रोग होने की आशंका कम रहती है. किन्तु गलत खानपान एवं सदवृत्त का पालन न करने से दिन-प्रतिदिन व्याधि क्षमता का हास होता जा रहा है और एलर्जी सम्बन्धी रोग दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं।
लक्षण – इसमें त्वचा में ततैया के काटने के समान लाल-लाल चकत्ते या दाने उभर आते हैं, जिसमें खुजली और जलन बहुत ज्यादा होती है। रोगी को कभी-कभी सुई चुभने के समान या बिच्छू के काटने जैसा दर्द भी होता है और लाल वर्ण के खुजली युक्त चकत्ते निकलते हैं।
चिकित्सा – शीतपित्त की चिकित्सा करने से पहले उन कारणों का पता लगाना है जिनके कारण सामान्यतः शीतपित्त की उत्पत्ति होती है। विरुद्धाहार, औषधि प्रतिक्रिया, विभिन्न रोग, दंश, विभिन्न वस्तुओं की गन्ध, स्पर्श आदि ऐसे कारण है जिन्हें आयुर्वेद तथा एलोपैथिक दोनों चिकित्सा पद्धतियां सामान्य रूप से मानती हैं अतः इन कारणों के निराकरण के बिना शीतपित्त की चिकित्सा सम्भव नहीं हो सकती। यदि किसी विशेष आहार विहार से शीतपित्त हो तो उस आहार का त्याग कर देना चाहिये। यदि किसी औषधि के दुष्प्रभाव से शीतपित्त की उत्पत्ति हुई हो तो उस औषधि का प्रयोग तत्काल बन्द कर देना चाहिये। यदि उदर में कृमियों की उपस्थिति हो तो पहले कृमिघ्न औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। यह ध्यान देने योग्य है कि उदर कृमियों को बिना निकाले शीतपित्त में लाभ नहीं होता। कुछ विशेष रोग यथा प्रवाहिका, पाण्डु, ज्वर, प्रतिश्याय आदि में लक्षणात्मक शीतपित्त हो तो मूल रोग की चिकित्सा के साथ-साथ शीतपित्त की लाक्षणिक चिकित्सा भी करनी चाहिये। रसायन द्रव्यों का सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। अतः आयुर्वेद में बताए गए रसायन द्रव्य त्रिफला आदि का सेवन करना चाहिए। पंचकर्म चिकित्सा भी इसमें कारगर उपाय है, क्योंकि पंचकर्म के द्वारा शरीर शोधित हो जाने पर उन दोषों के प्रकुपित होने की आशंका कम हो जाती है।
शीतपित्त में अन्त – प्रयोगार्थ उपयोगी औषधियाँ:- यह समस्या आमतौर पर शरीर में एलर्जी या आम या विषाक्त पदार्थों के कारण होती है। हल्दी को एन्टी एलर्जिक कहा गया है, इसी कारण शीतपित्त में हरिद्रा खंड का प्रयोग विशेष करना चाहिए। 5 काली मिर्च को घी और बुरा के साथ मिलाकर खाएं। गुलर के फलों को सुखाकर चूर्ण बनाकर सुबह शाम लेने से लाभ होता है। शीतपित्त के आयुर्वेदिक उपचार में हल्दी, नीम, गिलोय व आंवला का सेवन प्रमुख है। अविपत्तिकर चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, मंजिष्ठादि चूर्ण, कैशोर गुग्गुल, आरोग्यवर्धनी वटी, शीतपित्तान्तक रस, कामदुधा रस, सूतशेखर रस, प्रवाल पिष्टी, स्वर्णमाक्षिक भस्म, मंजिष्ठादि क्वाथ, सारिवाद्यासव, खदिरासव का प्रयोग लाभप्रद है।
उपरोक्त औषधियों का सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्शानुसार ही करना चाहिए क्योंकि औषधि निर्धारण व्यक्ति की प्रकृति को देखते हुए किया जाता है।
शीतपित्त में बाह्य प्रयोणार्य – प्रभावित त्वचा पर नारियल तेल और देसी कपूर का लेप लगाएं। सरसों, हल्दी, चकवड़ तथा तिल का कल्क सरसों के तैल के साथ मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाएं और गुनगुने पानी से नहाएं। एलोवेरा जेल या चंदन पेस्ट खुजली वाली जगह पर लगाना फायदेमंद है। नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर स्नान करने से त्वचा की खुजली व जलन में राहत मिलती है
शीतपित्त में सावधानियां पथ्य-अपथ्य पालना – किसी भी रोग की चिकित्सा के साथ-साथ पथ्य पालन का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि चिकित्सा कितनी भी की जाए, परन्तु रोग को उत्पन्न करने वाले कारणों का परित्याग न किया जाए, तो चिकित्सा असफल होती है। अतः तली हुई चीजों, विरुद्ध आहार-विहार, मिर्च-मसाले, खट्टे रसों का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। एलर्जिक भोजन जैसे फास्ट फूड व जंक फूड से परहेज करें। दही, अचार, ठंडे खाद्य पदार्थ और खट्टी चीजों से बचें, क्योंकि ये पित्त बढ़ाते हैं। अत्यधिक ठण्डा खाने के बाद तुरंत गर्म पदार्थ नहीं लेना चाहिए। दूध के साथ नमक, दही के साथ मछली आदि विरुद्ध आहार का सेवन नहीं करना चाहिए। हल्का तथा जल्दी पचने वाले आहार का सेवन एवं सद्वृत्त का पालन करें, तो शीतपित्त जैसी एलर्जी संबंधी बीमारियां व्यक्ति को प्रभावित नहीं करेगी। गर्मी से आने के बाद ठंडा पानी पीना. कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम खाने से बचें, नहाने के तुरंत बाद पंखे या एसी में न बैठें।

डॉ. सुरेश कुमार
M.D. (Ay.), P.G.D.N.Y.Sc.
प्रभारी चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय एवं योग
वेलनेस सेंटर, तेलीबाग, लखनऊ (उ.प्र.)