फंगल इन्फेक्शन एक सामान्य लेकिन परेशान करने वाली त्वचा संबंधी समस्या है, जो फंगस नामक सूक्ष्म जीवों के कारण होती है।  यह संक्रमण त्वचा के किसी भी हिस्से में हो सकता है, विशेष रूप से उन स्थानों पर जहां नमी अधिक रहती है, जैसे कि पैर, बगल और त्वचा की सिलवटें। इसके कारण त्वचा पर खुजली, लाल चकत्ते, जलन और कभी-कभी बदबू जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। अस्वच्छता, पसीना, तंग कपड़े पहनना और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली फंगल इन्फेक्शन के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। हालांकि यह समस्या आमतौर पर गंभीर नहीं होती, लेकिन समय पर ध्यान न देने पर यह बढ़ सकती है और फैल भी सकती है। इस विषय में हम जानेंगे कि फंगल इन्फेक्शन के कारण, लक्षण और इससे बचाव तथा उपचार के प्रभावी उपाय क्या हैं।

दुनियाभर में होने वाले इन्फेक्शन में सबसे सामान्य फंगल इन्फेक्शन है। शरीर के ऊतकों में किसी फफूंद या फंगस के बढ़ने और फैलने पर फंगल इंफेक्शन होता है। फंगस एक माइक्रोस्कोपिक जीव है जो वातावरण में मौजूद होता है और नमी मिलने पर सक्रिय हो जाता है। फंगल इन्फेक्शन मुख्य रूप से शरीर के गम, नम और पसीने वाले हिस्सों में तेजी से फैलता है। ये शरीर के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित करता है जैसे कि त्वचा, मुंह, गला, बगल, पीठ, गर्दन, पैर के अंगूठे के बीच, एड़ी, पैरों व ऊंगलियों के नाखून, आंखें, कान, जठरांत्र मार्ग, फेफड़ों, जननांग आदि। इसे दाद, खाज, खुजली, रिंगवॉम, कैंडिडा या एथलीट्स फुट आदि नामों से जाना जाता है। त्वचा हमारे शरीर की बाहरी कवच होता है। यह शरीर को कई बैक्टी रयल और फंगल इनफेक्शन से सुरक्षा प्रदान करती है। जब शरीर की इम्यूनिटी कमजोर होती है या त्वचा लगातार गीली रहती है, तब फंगस को पनपने का पूरा मौका मिल जाता है।

फंगल इन्फेक्शन का कारण

बरसात के मौसम में व नमी वाले वातावरण में फंगल इन्फेक्शन मुख्य रूप से फैलता है। इसी कारण से बरसात में ज्यादातर लोग फंगल इन्फेक्शन से ग्रसित रहते हैं। बार-बार पसीना आना और कपड़े देर तक गीले रहना, टाइट कपड़े पहनना, जिससे त्वचा में हवा न पहुंचे, बिस्तर, तौलिए या कपड़े ठीक से न धोना तथा शरीर की इम्यूनिटी का कमजोर होना, डायबिटीज या हार्मोनल असंतुलन, बार-बार ऐंटीबायोटिक या स्टेरॉइड लेना, प्रोसेस्ड फूड और शुगर की अधिकता में फंगल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

आयुर्वद के अनुसार, फंगल इन्फेक्शन ‘क्षुद्र कुष्ठ के अंतर्गत आता है। यह तब होता है जब शरीर में कफ और पित्त दोष असंतुलित हो जाते हैं और आम (टॉक्सिन्स) जमा हो जाता है। इससे त्वचा में खुजली, जलन, लालिमा और रैशेज हो जाते हैं। यह रोग सिर्फ बाहरी नहीं होता, इसकी जड़ें हमारी पाचन शक्ति, रक्त शुद्धता और त्वचा की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली से जुड़ी होती हैं। जब तक शरीर के दोष संतुलित नहीं होंगे, पाचन अग्नि मजबूत नहीं होगी और आम (टॉक्सिन्स) बाहर नहीं निकलेगा तब तक कोई भी रोग पूरी तरह से ठीक नहीं हो सकता। फंगल इन्फेक्शन भी इसी सिद्धांत का हिस्सा है। फंगल इन्फेक्शन वर्तमान समय की एक आम लेकिन जिद्दी समस्या बन चुकी है।

फंगल इन्फेक्शन के प्रकार

नाखून में फंगल इन्फेक्शन – नाखून में फंगल इन्फेक्शन नाखून के अगले हिस्से से प्रारम्भ होकर संपूर्ण नाखून में फैल जाता है। फलस्वरूप नाखून के आसपास की त्वचा मोटी हो जाती है। 

दाद – इसमें त्वचा में रंग के आकार के चकत्ते पड़ जाते हैं। इसमें अत्यधिक खुजली तथा जलन होती है एवं त्वचा में लाल रंग के चकत्ते हो जाते हैं। दाद मुख्य रूप से जननांगों, जोड़ों के पास एवं ऐसे स्थान पर, जहां पसीना अधिक आता है, वहां होते हैं।

एथलीट फुट (Tinea Pedis) – पैर की अंगुलियों के बीच अत्यधिक नमी एवं उष्णता के कारण व्यक्ति मुख्य रूप से टीनिया पेडिस नामक फंगल संक्रमण से ग्रसित हो जाते हैं। खुजली होना, त्वचा का फटना, जलन इत्यादि इसके मुख्य लक्षण हैं। इसमें पैर में सफेद दरार पड़ जाती है, खुजली होती है तथा पैर की त्वचा परतदार या पपड़ी के रूप में निकलने लगती है।

टिनिया केपिटिस : यह बाहरी त्वचा का फंगल संक्रमण है। मुख्य रूप से यह सिर में होता है। इसमें सिर में एक या अनेक चकत्ते बन जाते हैं, जिससे बाल भी झड़ने लगते हैं। इसमें मुख्य रूप से खुजली, जलन, दाने तथा पपड़ी जम जाती है। यह प्रमुखतया लड़कों में पाया जाता है एवं किशोरावस्था में मुख्य रूप से होता है।

टिनिया वर्सिकलर – यह मुख्यतः कंधे की त्वचा पर होता है। इससे लड़के एवं लड़कियों दोनों ही प्रभावित होते हैं।

टिनिया करूरिस – यह जननांगों का फंगल इन्फेक्शन है। यह स्त्री-पुरूष दोनों में होता है, परन्तु पुरुषों में ज्यादातर दिखाई देता है। इसमें खुजली, जननांगों के पास जोड़ों में दाह होता है। यह मुख्य रूप से जंघा, आंतरिक त्वचा एवं जननांगों के पास जोड़ों में होता है, परन्तु फैलता हुआ गुदा के पास तक पहुंच जाता है। संक्रमण से ग्रसित त्वचा में पपड़ी जमने लगती है तथा फटने लगती है।

प्रमुख प्राकृतिक और आयुर्वेदिक उपाय

नीम – नीम में एंटीफंगल, एंटीबैक्टीरियल और रक्तशोधक गुण होते हैं। सुबह खाली पेट 4-5 नीम की कोमल पत्तियाँ चबाएँ। नीम की पत्तियाँ पानी में उबालकर उस पानी से स्नान करें या प्रभावित स्थान को धोएं।

एलोवेरा – ताजा एलोवेरा जेल खुजली और जलन को शांत करता है।

हल्दी और नारियल तेल – हल्दी पाउडर में नारियल तेल मिलाकर संक्रमित जगह पर दिन में दो बार लगाएँ। हल्दी एंटीसेप्टिक होती है व नारियल तेल स्किन को नमी देता है। 

सेब का सिरका – इसे पानी के साथ पतला करके त्वचा पर लगाने से पीएच संतुलन बना रहता है, फंगस कम होता है।

टी ट्री ऑयल – नारियल तेल के साथ मिलाकर लगाने से यह फंगस को तेजी से नष्ट करता है।

लहसुन – लहसुन का पेस्ट एंटीफंगल के रूप में काम करता है। लहसुन मिले पानी में पैर भिगोने से पैरों के फंगल इंफेक्शन जैसे कि एथलीट फुट के इलाज में मदद मिल सकती है। जैतून के तेल में लहसुन को भिगोकर उस तेल को सीधा संक्रमित हिस्से पर लगा सकते हैं। ये फंगस को बढ़ने से रोकता है।

आयुर्वेदिक औषधियां

त्रिफला चूर्ण, गुडुची चूर्ण, पंचनिम्बादि चूर्ण, मंजीष्ठादि चूर्ण, गिलोय सत्व, गंधक रसायन, गंधक वटी, आरोग्यवर्धिनी वटी, खदिरादि वटी, कैशोर गुग्गुल, अमृतादि गुग्गुल, सप्तविशति गुग्गुल, पंचतिक्त घृत गुग्गुल, विडंगलोह, एलोवेरा रस, सारिवाद्यासव, खदिरारिष्ट, पटोलादि क्वाथ, निम्बादि क्वाथ, महामजिष्ठादि क्वाथ आदि। ये आयुर्वेदिक औषधियाँ शरीर से टाक्सिन्स निकालती है, खून को साफ करती हैं, त्वचा को पोषण देती हैं और पाचन में सुधारकर त्वचा विकारों में लाभकारी होती हैं। ये औषधियाँ सिर्फ लक्षण नहीं मिटाते बिल्क शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करके भविष्य में भी इन्फेक्शन से बचाते हैं।

बाह्यः प्रयोग हेतु आयुर्वेदिक औषधियां

मरिच्यादि तैल, महामरिच्यादि तैल, तुवरक तैल, करज तैल, निम्बादि तैल आदि। आयुर्वेदिक डॉक्टर के परामर्शानुसार ही उपरोक्त औषधियों का सेवन करना चाहिए।

फंगल इन्फेक्शन से बचाव

आयुर्वेद के अनुसार, किसी भी रोग की रोकथाम इलाज से ज्यादा जरूरी है। अगर आप रोजाना की आदतों में थोड़ा सुधार करें. तो फंगल इन्फेक्शन दोबारा होने की संभावना बेहद कम हो जाती है।

संक्रमित व्यक्ति के कपड़े, टॉवेल और मोजे धूप में सुखाएं। फंगल इन्फेक्शन नमी वाली जगहों पर पनपता है, इसलिए शरीर को हमेशा साफ और सूखा रखें। नहाने के बाद शरीर को पूरी तरह सुखाएँ। नाइलॉन, पॉलिस्टर के बने कपड़े एवं अंडर गारमेंट न पहनें। सूती, ढीले. साफ और सूखे कपड़े पहनें। पसीने के बाद तुरंत कपड़े बदलें। पैरों को साफ एवं खुले वातावरण में रखें और ऐसे जूते या सैंडिल पहने, जिससे पसीना कम आए। टैलकम पाउडर का प्रयोग न करें। शरीर को हाइड्रेट रखें और रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पिएँ। दही, खट्टी चीजें, बासी या तला-भुना खाना और मीठा खाने से बचें क्योंकि ये कफ दोष बढाते हैं और फंगल संक्रमण को बढ़ावा दे सकते हैं। स्ट्रेस और नींद की कमी से इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, इन्हें संतुलित रखें। डायबिटीज, मोटापा या हार्मोनल असंतुलन वाले लोगों में फंगल इन्फेक्शन तेजी से फैलता है और जल्दी ठीक नहीं होता। आयुर्वेद में ऐसी स्थितियों में पंचकर्म, शोधन चिकित्सा और रोग के अनुसार औषधि चयन कर शरीर को अंदर से साफ किया जाता है।

डॉ. बाबीता केन (SV-67)

डॉ. बबीता केन
एम. डी. (आयुर्वेद) रसशास्त्र एवं भैषज्य
कल्पना प्रभारी चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय,
तातोमुरैनी, सुल्तानपुर (उ. प्र.)

G Kumar Arogyadham, Sex Samasya (SV-67)
(SV-67)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top