2) मात्रा विरुद्ध – घी और शहद का समान मात्रा में सेवन विष के समान है परन्तु अलग अलग दोनों अमृत के समान है।
3) दोषों को दृष्टि से विरुद्ध – वात प्रकृति के व्यक्ति को वात बढ़ाने वाले पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को पित्त बढ़ाने वाले और कफ बढ़ाने वाले पदार्थ कफ प्रकृति वाले व्यक्ति को नुकसान करते है।
4) मौसम की दृष्टि से विरुद्ध – ठंडी में सुखे पदार्थ खाना सेहत के लिए हानिकारक है।
5) संस्कार या पाक दृष्टि से विरुद्ध – जैसे खट्टे पदार्थों को तांबे या पीतल के बर्तन में पकाकर खाना।
6) पाचक अग्नि के दृष्टि से – मंद अग्नि वाले व्यक्ति को भारी चिकनाई युक्त और तीक्ष्ण अग्नि वाले को अल्प आहार नुकसान करता है।
7) वीर्य के दृष्टि से – उष्ण पदार्थ, ठंडी तासीर वाले पदार्थों के साथ मिलाकर खाना, अनानास अथवा मौसंबी को दही और लस्सी के साथ खाना, फ्रूट सलाद। यहाँ तक कि वीर्यविरूद्ध का सबसे बड़ा उदाहरण चाय है जिसमें चायपत्ती की तासीर गर्म और दुध की तासीर ठंडी होती है। दूध के साथ मछली का सेवन बहुत हानिकारक है। दही के साथ खीर, दूध, गर्म पदार्थ, खीरा, खरबुजा आदि न खाएं। खीर के साथ कटहल खटाई (नींबु, आम), सत्तु, शराब आदि न खाएं।
8) क्रम विरुद्ध – दूध पीने के बाद खट्टे फलों (नींबू, संतरा, मौसंबी अथवा खट्टी सब्जियों) का सेवन न करें। नहाने के पहले भोजन करना या भोजन करने के बाद नहाना क्रम विरूद्ध. है।
9) पाचन के आधार पर – जिन व्यक्तियों को कब्ज की शिकायत हो, ऐसे लोगों को ठंडे और रूखे खाद्य पदार्थ का सेवन और जिन्हें बार बार पैखाना आता हो उन्हें उष्ण खाद्यपदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
10) शारीरिक अवस्था की दृष्टि से विरुद्ध – मोटे व्यक्तियों द्वारा ज्यादा स्नेहयुक्त पदार्थों का सेवन और दुबले व्यक्तियों द्वारा बहुत कम मात्रा में और रुखे आहार का सेवन हानिकारक है।
11) सात्म्य विरुद्ध – जिस व्यक्ति को जैसा आहार अनुकुल हो गया है (सात्म्य), उसे विपरीत आहार का सेवन हानि करता है।
12) परिहार विरुद्ध – मांस आदि खाने के बाद, उष्ण आहार का सेवन या खीर आइसक्रीम और लस्सी के बाद ठंडे पानी का सेवन परिहार विरूद्ध है।
13) पाक विरुद्ध – अधपका भोजन या अतिरिक्त पकाकर भोजन खाना पाक विरूद्ध है। चायनिस डिशेस पूरा ही विरूद्ध है, क्योंकि उनमें सब्जियाँ पूरी पकाई नहीं जाती।
14) हृदय विरुद्ध – जो आहार मनो अनुकूल न हो वह हृदय विरूद्ध है और अनमने मन से चिड़चिड़ करते हुए, नाराज होते हुए या भोजन के दोष देखते हुए खाने से वह पूरी तरह पचता नहीं है और अपचन जैसी बीमारीयां भी कर देता है।
15) संपद विरुद्ध – जिस आहार में अति रस हो या पूर्ण रूप से रस उत्पन्न नही हुआ है, ऐसे आहार का सेवन करना।
16) पाक विरुद्ध – दूषित या अनुचित लकड़ी या बर्तनों में आहार को पकाना और आधाकच्चा और जला हुआ आहार सेवन करना पाक विरूद्ध है।
17) उपचार विरुद्ध – स्नेहन स्वेदन करवाने के बाद तुरंत शीतल जल का सेवन, खाने के बाद निरूह बस्ति लेना और निरन्न अनुवासन बस्ति लेना सब उपचार विरूद्ध है।
18) विधी विरुद्ध – एकांत में, बिना हाथ पैर धोए, बेमन से भोजन विधी विरूद्ध है।
इष्ट जनों के साथ, स्वच्छ होकर, अग्नि और देवता. गौ आदि को अर्पण करके तन्मना होकर आहार को पुष्टिकारक और स्वास्थ्यवर्धक है ऐसे भाव से, जमीन पर बैठकर यदि भोजन किया जाए तो उस आहार के अमृतरूपी लाभ होते हैं।
खाना बनाते समय भी किन किन चीजों का उपयोग साथ में कर रहे है, उसका ख्याल रखना बहुत जरुरी है, जैसे आजकल कई बार पनीर बनाते समय दुध में रंग मिलाकर, पनीर में लगाकर रख देते है और उसी सब्जी में फिर पकाते दही का प्रयोग करते है, यह सब गलत है क्योंकि आहार जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, उसी पर संपूर्ण स्वास्थ्य टिका है। इसलिए खाना पकाते समय, खाना परोसते समय और खाना खाते समय बड़ी सावधानी रखनी चाहिए। किन किन पदार्थों को मिलाकर खाएं अथवा किसे आपस में नहीं मिलाना है इसकी जानकारी अवश्य होनी चाहिए, तभी हम आहार से संपूर्ण स्वास्थ्य लाभ ले सकेंगे।

डॉ. नम्रता चौरागडे
भोपाल