गुरु नानक देव जी के पांचवे स्वरुप श्री गुरु अरजनदेव महाराज ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब की रचना की जिन्हें आगे चलकर दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंदसिंघजी ने गुरु गद्दी दी। गुरुजी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्वयं रचित श्री सुखमनी साहिब, बावन अखरी, बारह माहा आदि बाणियों को सम्मिलित किया है। गुरुजी की प्रसिद्ध रचना श्री सुखमनी साहिब के नियमित पाठ से अनेक दुख-दर्द दूर होकर सुखों की प्राप्ति होती है। इतिहास में इस संबंध में अनेक साखियां आती हैं जिसमें से एक साखी इस प्रकार है-
वजीर खां, जहांगीर बादशाह का सेनापति (अहिलकार) जिसे जलोदर नामक रोग था। दूर-दूर से अच्छे से अच्छे वैद्यों को बुलवाकर इलाज करवाया परंतु लाभ नहीं हुआ। इस रोग के कारण वजीर खां दिन-रात तड़पता रहता था।
गुरुजी का एक प्रेमी सिख श्री सुखमनी साहिब का पाठ रोज गाकर करता हुआ वजीर खां के मकान से गुजरता था। जितनी देर वजीर खां के कानों में श्री सुखमनी साहिब के पाठ की आवाज आती थी उतने समय तक उसे बिमारी की पीड़ा नहीं होती थी। आखिर एक दिन वजीर खां ने गुरु के सिख को अपने पास बुलाकर कहा कि वह जो कलाम रोज अमृतवेले में पढ़ते हुए यहां से जाते हो वह कलाम मेरे पास बैठकर रोज सुनाया करो ताकि मेरा रोग दूर हो जाए। सिख यह बात मानकर रोज नियमित श्री सुखमनी साहिब का पाठ वजीर खां को सुनाया करता था। जिससे वजीर खां को काफी आराम हो गया।
एक दिन वजीर खां ने पूछा कि जिन्होंने यह कलाम लिखी है वे कहां रहते हैं? उनका नाम क्या है? एक बार मुझे भी उनके दर्शन करवाओ। सिख ने कहा इस कलाम का नाम “श्री सुखमनी साहिब” है और इनके रचियता हमारे गुरुदेव श्री गुरु अरजनदेवजी जो अमृतसर में रहते हैं। वजीर खां और सिख दोनों अमृतसर पहुंचे और गुरुजी के दर्शन कर भेटा रखकर नमस्कार किया। वजीर खां ने हाथ जोड़कर वेनती की कि हे प्रभुजी आपकी कलाम में वह ताकत है जिसका मैं बयान नहीं कर सकता। मुझे जलोदर का रोग है जितना समय मैं आपकी यह कलाम सुनता रहता हूं उतना समय मुझे आराम रहता है। अब आप ऐसी कृपा करो कि मुझे हमेशा इस रोग से मुक्ति मिले। गुरुजी ने अपने परम सिख बाबा बुढ्ढाजी का प्रताप बढ़ाने के लिए वजीर खां को इशारा करके कहा- आप बाबा बुद्धाजी के पास चले जाओ, वे आपका रोग दूर करेंगे। वजीर खां ने बाबा बुढ्ढाजी के पास जाकर माथा टेककर वेनती की कि जलोदर रोग ने मुझे बहुत दुखी किया है, आप कृपा करके मेहर करो। बाबा बुढ्ढाजी उस समय संगत से सेवा करवा रहे थे। उन्होंने गुस्से में कहा कि दूर हट जाओ, हमारी सेवा में विघ्न मत डालो परंतु वजीर खां फिर भी हाथ जोड़कर नम्रता से बाबा बुढ्ढाजी के पास ही खड़ा रहा। सेवा करते वक्त बाबा बुद्धाजी की नजर वजीर खां पर गई। उन्होंने खाली टोकरी उसके पेट पर ऐसी मारी जिससे पेट का सारा पानी निकल गया और वजीर खां के सारे दुख-दर्द दूर हो गए एवं जलोदर के रोग से मुक्त हो गया।
श्री सुखमनी साहिब गुरु महाराज की प्रमुख रचना है। सुखमनी का शाब्दिक अर्थ है सुखों की मणी अर्थात खुशियों का खजाना। गुरु अरजन देवजी ने श्री रामसर मंजी साहिब वाले स्थान पर बैठकर सारी सुखमनी साहिब उच्चारण की और उसका महातम बताया है कि जो भी सिख श्री सुखमनी साहिब का पाठ करेगा उसके 24000 श्वास सफल हो जाएंगे व उसके सारे पाप निवृत्त होकर वह जनम-मरण से मुक्त हो जाएगा। श्री गुरु अरजनदेवजी द्वारा रचित श्री सुखमनी साहिब के नियमित पठन से आत्मिक शांति, चार पदार्थों की प्राप्ति व मुक्ति मिलती है। दुख रोग दूर हो जाते हैं- “दूख रोग बिनसे भै भरम” एवं उसकी सभी मनाकामनाएं पूरी होती हैं “सरब इछा ताकी पूरन होइ”। श्री सुखमनी साहिब के नियमित पठन से मृत्यु का ज्ञान चालीस दिन पूर्व ही हो जाता है ऐसा महापुरुषों से सुना है। इसलिए प्रत्येक सिक्ख को श्री सुखमनी साहिब का पाठ नियमित रुप से करना चाहिए। श्री सुखमनी साहिब का पाठ करने वाला सभी लोकों में प्रधान पुरुष के रुप में अवतरित होता है। वह उच्च स्थान जो परमपद है को प्राप्त होगा व आवागमन के चक्कर से मुक्त रहेगा।
श्री सुखमनी साहिब में गुरुजी ने कहा है कि यदि यह जीव सुखी होना चाहता है एवं कलियुग की तकलीफें उसे व उसके शरीर को न सताए अर्थात दुखी न हो एवं दुख न भोगे तो उसे तीन प्रकार से प्रभुस्मरण करना पड़ेगा क्रमशः तन अर्थात शरीर से, मन को भी परमात्मा के नाम से जोड़ना पड़ेगा व प्रभु के गुणगायन करना होगा- “सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ, कलि कलेस तन माहि मिटावउ”।
गुरुजी इस संसार में करीब 43 वर्ष रहे, उन्होंने ज्येष्ठ सुदी 4 संवत 1663 को अपनी शहीदी दी जिसकी अंग्रेजी समकक्ष तारीख इस वर्ष 18 जून 2026 गुरुवार को है। गुरुजी के शहीदी स्थल पर उनकी याद में गुरुद्वारा ढेहरा साहिब, लाहौर का निर्माण किया गया है।
ऐसे महान सद्गुरु को उनकी शहीदी दिवस पर हमारा शत-शत प्रणाम ।