हमारा जीवन शरीर, मन और आत्मा इन तीनों के संतुलन से चलता है। जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अच्छा भोजन और व्यायाम चाहिए, वैसे ही मन को स्वस्थ रखने के लिए शांति और संतुलन जरूरी है। आजकल की भागदौड़ वाली जिंदगी में तनाव, चिंता, क्रोध और अवसाद (Depression) जैसी समस्याएँ बहुत बढ़ गई हैं।
 
“समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्याभिधीयते”
(सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 15/41)
सुश्रुताचार्य कहते हैं – ‘जब शरीर के दोष, धातु, मल और अग्नि का संतुलन बना रहे और मन, इन्द्रिय व आत्मा प्रसन्न रहे, तभी मनुष्य स्वस्थ रहता है। केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मन का शांत और स्थिर होना भी बहुत जरूरी है।
 

मन का स्वरूप (Nature of Mind)

आयुर्वेद के अनुसार मन तीन गुणों पर टिका होता है।
*सत्व- यह गुण शांति, विवेक, ज्ञान व प्रसन्नता कर्म करता है।
*रज- यह गुण चंचलता, क्रोध, अहंकार और वासना का निर्माण करता हैं।
*तम- यह गुण आलस्य, अज्ञान, मोह का निर्माण करता हैं। जब सत्त्व गुण कम हो जाता है और रज-तम दोष बढ़ जाते है, तो मानस रोग पैदा होते हैं।
 

मानसिक रोग क्यों होते हैं?

आहार (Food habits) : ज्यादा शराब, नशा या उत्तेजक चीजों का सेवन करना। बहुत अम्लीय, नमकीन, मसालेदार और बासी (पर्युषित) अन्न खाना। असमय या गलत तरीके से भोजन करना ।
विहार (Lifestyle) : रातभर जागना, बहुत ज्यादा सोना या दिन में सोना। व्यायाम की कमी या बहुत अधिक परिश्रम करना। मोबाइल, टीवी का ज्यादा प्रयोग करना।
मानसिक कारण (Mental Causes) : डर, गुस्सा, शोक, चिंता करना। असफलता या अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का तनाव के कारण। लोभ और असंतोष के कारण।
प्रज्ञापराध (गलत सोच-आचरण) : बुरे विचार और बुरे कर्म के बारे में सोचना एवं करना। सत्य और नैतिकता से भटकना।
 

मानसिक रोगों के लक्षण

सामान्य लक्षण – मन का अस्थिर रहना, आत्मविश्वास की कमी, निराश होना या कोई कार्य करने की इच्छा न होना।
सत्त्व कम होने पर – डर, चिंता, नींद की गड़बड़ी, आत्मविश्वास की कमी रहना एवं तनाव का होना।
रज बढ़ने पर – लालच, अहंकार, अशांति एवं जल्दी गुस्सा आना।
तम बढ़ने पर – आलस्य, ज्यादा नींद, अज्ञान, उदासीनता एवं काम में रुचि न होना।
 

मानसिक रोगों के प्रकार

उन्माद (Psychosis-असामान्य व्यवहार), चिंता (Anxiety) अवसाद (Depression), अपस्मार (Epilepsy), अनिद्रा (Insomnia), स्मृतिभ्रंश (Memory loss), अतत्वाभिनिवेश (Delusion), वासनात्मक विकार

आयुर्वेद उपचार पद्धति – आयुर्वेद में मानसिक रोगों का उपचार मन, शरीर और दोष (वात, पित्त, कफ) संतुलन के आधार पर किया जाता है। इसका उद्देश्य है सत्त्व (मन की शुद्धि) बढ़ाना, रज और तम (मन के दोष) को कम करना और सर्वांगीण स्वास्थ्य प्राप्त करना हैं।

आचार्य चरक ने चरक संहिता में बताई गयी नैष्ठिकी चिकित्सा मानस विकारों की श्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति हैं। नैष्ठिकी चिकित्सा यानि जब व्यक्ति आत्मा का साक्षात्कार करता है और भोगों से विमुक्त हो जाता है, तो मन शान्त होकर विकार मुक्त हो जाता है। पतंजलि ने बताये गए पातंजल योगसूत्र में अष्टांग योग साधना से मन की शुद्धि होकर मानसिक विकार नष्ट हो जाते हैं।
आयुर्वेद में मानसिक रोगों का इलाज तीन प्रकारों से होता है।

 

सत्त्वावजय चिकित्सा (Mind Therapy)

* यह मन पर नियंत्रण करने वाली चिकित्सा है।
* ध्यान और प्राणायाम – तनाव और चिंता कम करते हैं और आरोग्य प्रदान करते हैं।
* मंत्र-जप, भजन, सत्संग-मन को शांति और सकारात्मकता देते हैं एवं मन का सात्विक भाव बढ़ाते हैं।
* संगीत, कला, हास्य-मन को प्रसन्न रखने में मदद और चिंता एवं तनावरहित वातावरण का निर्माण करते हैं
* इससे आत्मविश्वास, स्मृति और नींद में सुधार होता है।
 

युक्तिव्यपाश्रय चिकित्सा (औषधि और आहार)

औषधियों (मेध्य रसायन Brain Tonics)
* ब्राह्मी – स्मृति वर्धक, तनाव और चिंता में लाभ।
* शंखपुष्पी – नींद और अवसाद में लाभ ।
* मंडूकपर्णी – मानसिक शक्ति बढ़ाती है।
* जटामांसी – शांति और नींद लाने में मदद कराती हैं।
* अश्वगंधा – तनाव और थकान कम कराती है।
* शतावरी – ओजवर्धक होती हैं।
 

घृत और अरिष्ट

ब्राह्मीघृत, स्मृतिसागर रस, महाकल्याणक घृत, सारस्वतारिष्ट, अश्वगंधारिष्ट का उपयोग वैद्य के निर्देश अनुसार करना लाभदायक होता हैं।
 

आहार और जीवनशैली

सात्विक भोजन (दूध, घृत, ताजे फल एवं शाक) का सेवन करना। नियमित दिनचर्या का पालन करना। कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद लेना। मदिरा, मांस, बासी व तैलीय भोजन से परहेज करना। योग, प्राणायाम और हल्का व्यायाम करना । इससे दोषों का शमन होता है और सत्त्व की वृद्धि होती है। इसके परिणामस्वरूप बुद्धि, स्मृति और मनोबल में सुधार आता है। साथ ही मानसिक रोगों के लक्षण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं, जिससे व्यक्ति को मानसिक समाधान और संतुलन प्राप्त होता है।
 

दैवव्यपाश्रय चिकित्सा (Spiritual Therapy)

यह उपचार आध्यात्मिक और अलौकिक उपायों के माध्यम से मानसिक रोगों के शमन के लिए किया जाता है।
* मंत्र – जप और ध्यान-मन को स्थिर करते हैं।
* हवन, यज्ञ – वातावरण को पवित्र और शांत बनाते हैं।
* सत्संग और भजन-नकारात्मकता दूर कर सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाते हैं।
यह औषधीय उपचार और सत्वावजय चिकित्सा के प्रभाव को बढ़ाता हैं।
 

पंचकर्म चिकित्सा (शरीर और मन को शुद्ध करने की पद्धति)

* अभ्यंग (तेल मालिश) – तनाव और थकान कम होता हैं।
* शिरोधारा (तेल, दूध की धारा) – अनिद्रा, अवसाद और चिंता में लाभ होता हैं।
* नस्य (नाक में घृत डालना) – स्मृति और मानसिक शक्ति में सुधार आता हैं।
* बस्ति (एनिमा) – वात दोष का शोधन करता हैं।
 

मानसिक रोगों में योगासन

वज्रासन – खाने के बाद थोड़ी देर बैठने से पाचन और मन दोनों अच्छे रहते हैं।
बालासन – जमीन पर झुककर बैठने से तनाव कम होता है।
पश्चिमोत्तानासन – शरीर और दिमाग दोनों को आराम मिलता है।
प‌द्मासन – ध्यान व एकाग्रता बढ़ाने के लिए अच्छा होता है।
शवासन – पूरा शरीर और मन को शांति प्रदान करता हैं।
 

मानसिक रोगों में प्राणायाम

अनुलोम-विलोम – दिमाग शांत होकर चिंता कम होती है।
भ्रामरी – मन तुरंत शांत होता है, नींद और गुस्से में राहत मिलती है।
कपालभाति – शरीर और मन को प्रसन्न करता है।
उज्जायी – मन की अशांति कम होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
नाड़ी शोधन – मन और शरीर में संतुलन लाता है।
 
आयुर्वेद के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य तभी संभव है जब शरीर, मन और आत्मा तीनों का संतुलन बना रहे। आधुनिक जीवनशैली में तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं, लेकिन आयुर्वेद हमें इनसे निपटने के लिए सम्पूर्ण और प्राकृतिक उपाय देता है। आयुर्वेद शास्त्र में जो सदाचरण (सद्वृत्त) बताया गया हैं उन्हीं का पालन करने से सत्व गुण बढ़कर मनुष्य का जीवन आनंदित हो सकता हैं। ध्यान, प्राणायाम, योग, सात्त्विक आहार, आयुर्वेदिक औषधियाँ और पंचकर्म जैसी पद्धतियाँ मन को शांत करती हैं और मानसिक शक्ति को बढ़ाती हैं। इससे बुद्धि, स्मृति और आत्मविश्वास में सुधार होता है और धीरे-धीरे मानसिक रोगों के लक्षण कम होने लगते हैं।
 
सरल शब्दों में कहें तो अगर हम अपने आहार, दिनचर्या और सोच की सही दिशा रखें और आयुर्वेद उपाय अपनाएँ, तो मानसिक रोगों से बचाव और उपचार दोनों ही संभव हैं।

डॉ. अरुण भटकर

सहयोगी प्राध्यापक, संहिता सिद्धांत एवं संस्कृत विभाग, 
शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, नागपुर

डॉ. अभिजीत गायकवाड

पी जी स्टुडंट
शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, नागपुर

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