थायरॉइड ग्रंथि छोटी होते हुए भी शरीर का “संचालन केंद्र” है। यह न केवल शारीरिक विकास बल्कि मानसिक संतुलन और ऊर्जा उत्पादन के लिए भी जिम्मेदार है । इसके असंतुलन से जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है । आधुनिक युग में जहाँ तनाव, प्रदूषण और असंतुलित खानपान बढ़ रहे हैं, वहाँ थायरॉयड रोगों की संभावना भी बढ़ी है। अतः उचित खानपान, योग, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और समय पर चिकित्सा द्वारा इस रोग से बचाव संभव है। इसलिए कहा जा सकता है कि थायरॉयड का संतुलन ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।
वर्तमान जीवन शैली ने आम जनजीवन को इस कदर झकझोर कर रख दिया है कि प्रत्येक परिवार का कोई न कोई सदस्य किसी न किसी बीमारी से ग्रसित है उम्र दराज लोगों की तो बात छोड़िये अब तो आम युवक व युवतियां भी रोगग्रस्त है। तमाम व्याधियों में आजकल थायराइड नामक बीमारी ने भी अपने पाँव घर-घर पसारना शुरु कर दिया है। इस रोग को साइलेंट किलर भी कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। यह बीमारी कई परिवारों में वंशानुगत भी पाई गयी है। आज हमारे देश में पाँच करोड़ से ज्यादा थायरॉइड के मरीज हैं यानि कि परिवारों में 10 थायरॉइड मरीजों में कम से कम 8 महिलाएं इस रोग से ग्रस्त है। हैरत की बात तो यह है कि 90 प्रतिशत लोगों को इस बीमारी का पता ही नहीं है कि उन्हें थायरॉइड नामक रोग है। अब यह बीमारी महिलाओं की आम समस्या के रूप में उभर कर सामने आ रही है। सामान्यतः यह बीमारी स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा देखने को मिल रही है। यह रोग 30 से 60 वर्ष की स्त्रियों में अधिकतर पाया जाता है। थायराइड में या तो शरीर का वजन एकदम बढ़ जाता है या घट जाता है। इससे शरीर में काफी शिथिलता आ जाती है जिससे शारीरिक व मानसिक क्रियाएं मंद हो जाती हैं। इस बीमारी से शरीर में कई साइड इफैक्ट्स भी होने का खतरा मंडराता रहता है। इस बीमारी से रोगी के पाँवों में सूजन व ऐंठन की शिकायत रहती है। आम रोगग्रस्त मरीज तनाव व अवसाद से खिन्न नजर आते हैं। हालांकि आज चिकित्सा विज्ञान के माध्यम से थायरॉइड रोग का निदान व इसके उपचार में बहुत प्रगति हुई है। ऐलोपैथी के अलावा आयुर्वेद के माध्यम से भी इस बीमारी का पूर्णतया इलाज संभव है। आइये, जानते हैं इस बीमारी से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां –
मानव शरीर में प्रत्येक अंग और ग्रंथि का अपना-अपना महत्व है। यदि हम शरीर को एक “जीवंत मशीन” मानें तो इसमें ग्रंथियाँ (Glands) “कंट्रोल सेंटर” का कार्य करती हैं। इन्हीं ग्रंथियों में से एक है थायरॉयड ग्रंथि, जो गले के सामने स्थित होती है। यह ग्रंथि छोटी होते हुए भी अत्यंत शक्तिशाली है क्योंकि इसके हार्मोन शरीर की वृद्धि, विकास, मानसिक स्थिति और चयापचय (Metabolism) पर सीधा प्रभाव डालते हैं। वर्तमान समय में थायरॉयड रोग एक वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। भारत जैसे देश में भी बड़ी संख्या में लोग इससे प्रभावित हैं।
थायरॉइड का स्थान और संरचना : थायरॉयड ग्रंथि गर्दन के मध्य भाग में, स्वरयंत्र (Larynx) और श्वासनली (Trachea) के ऊपर स्थित होती है। इसका आकार तितली के समान होता है, जिसमें दो पंखनुमा भाग (दाएँ और बाएँ लोब) होते हैं, जो बीच में ‘इस्थमस’ नामक पतले हिस्से से जुड़े रहते हैं। इसका भार लगभग 15-25 ग्राम तक होता है।
इस ग्रंथि की कोशिकाएँ आयोडीन को ग्रहण कर थायराक्सिन (T4) और ट्रायआयोडोथायरोनिन (T3) हार्मोन का निर्माण करती हैं। इसके अलावा यह कैल्सीटोनिन नामक हार्मोन भी बनाती है, जो हड्डियों में कैल्शियम के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है।
थायरॉइड हार्मोन का महत्त्व : थायरॉयड हार्मोन हमारे शरीर के लिए ऊर्जा और संतुलन का स्रोत हैं। इनके बिना शरीर का सामान्य विकास असंभव है। इसके प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं।
1. चयापचय का नियंत्रण- भोजन से प्राप्त ऊर्जा को उपयोगी रूप में बदलने का कार्य।
2. विकास और वृद्धि- बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक ।
3. हृदय गति और रक्तचाप का संतुलन।
4. शरीर का तापमान नियंत्रित करना।
5. त्वचा, बाल और नाखूनों का स्वास्थ्य बनाए रखना।
6. मस्तिष्क और स्नायु तंत्र की सक्रियता को नियंत्रित करना।
थायरॉइड से जुड़े प्रमुख रोग
1. हाइपोथायरॉइडिज्म (Hypothyroidism) : इसमें थायरॉयड हार्मोन की कमी हो जाती है।
लक्षण : थकान, वजन बढ़ना, कब्ज, सूखी त्वचा, अवसाद, बाल झड़ना, ठंड अधिक लगना। बच्चों में यह स्थिति “क्रेटिनिज्म” कहलाती है, जिसमें शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है।
2. हाइपरथायरॉइडिज्म (Hyperthyroidism): इसमें थायरॉयड हार्मोन अत्यधिक मात्रा में बनने लगते हैं।
लक्षण: वजन घटना, तेज धड़कन, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, पसीना आना, आँखों का उभरना।
3. गलगंड (Goiter) : यह थायरॉयड ग्रंथि का असामान्य रूप से बढ़ जाना है। मुख्य कारण आयोडीन की कमी है।
लक्षण : गर्दन में सूजन दिखाई देने लगती है।
4. थायरॉयड नोड्यूल्स (Thyroid Nodules) : ग्रंथि में छोटे- छोटे गाँठें बनने लगती हैं, जो कभी-कभी कैंसर का रूप भी ले सकती हैं।
5. थायरॉइड कैंसर : यह अपेक्षाकृत दुर्लभ रोग है, परंतु गंभीर होता है।
लक्षण : गर्दन में कठोर गाँठ, आवाज में बदलाव, निगलने में कठिनाई।
थायरॉइड रोगों के कारण : * आयोडीन की कमी या अधिकता। * आनुवंशिक (Genetic) कारण। प्रतिरक्षा तंत्र में गड़बड़ी (जैसे हाशिमोटो डिजीज या ग्रेव्स डिजीज)। * मानसिक तनाव और असंतुलित जीवनशैली। असंतुलित आहार और पोषण की कमी। * रेडिएशन या प्रदूषण का प्रभाव ।
रोकथाम और उपचार : * आयोडीन युक्त नमक का सेवन अनिवार्य करना। * स्वस्थ एवं संतुलित आहार लेना- हरी सब्जियाँ, फल, दूध, दही, दालें आदि। * सोया उत्पादों और अत्यधिक जंक फूड से बचना। * योग और प्राणायाम (विशेषकर उज्जायी प्राणायाम, सर्वांगासन, मत्स्यासन) का अभ्यास करना । * समय-समय पर थायरॉयड फंक्शन टेस्ट (T3, T4, TSH) करवाना। * चिकित्सक की सलाह के अनुसार दवा (थाग्रॉक्सिन या अन्य दवाएँ) का नियमित सेवन करना। * तनाव मुक्त जीवन जीना और पर्याप्त नींद लेना।
थायरॉइड और आधुनिक चिकित्सा
* आज चिकित्सा विज्ञान ने थायरॉयड रोगों के निदान और उपचार में बड़ी प्रगति की है।
* रक्त परीक्षण द्वारा आसानी से रोग की पुष्टि की जा सकती है।
* हाइपोथायरॉयड में लेवोथाग्रॉक्सिन दवा दी जाती है।
हाइपरथायरॉयड में दवा, रेडियोआयोडीन थैरेपी या शल्य चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है।
* कैंसर की स्थिति में ऑपरेशन और रेडिएशन थेरेपी की आवश्यकता होती है।
* थायरॉइड ग्रंथि छोटी होते हुए भी शरीर का “संचालन केंद्र’ है। यह न केवल शारीरिक विकास बल्कि मानसिक संतुलन और ऊर्जा उत्पादन के लिए भी जिम्मेदार है। इसके असंतुलन से जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। आधुनिक युग में जहाँ तनाव, प्रदूषण और असंतुलित खानपान बढ़ रहे हैं, वहाँ थायरॉइड रोगों की संभावना भी बढ़ी है। अतः उचित खानपान, योग, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और समय पर चिकित्सा द्वारा इस रोग से बचाव संभव है। इसलिए कहा जा सकता है कि थायरॉइड का संतुलन ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

चेतन चौहान
नागपुर महामंदिर गेट के निकट,
जोधपुर (राज.)