आधुनिक समय में मनुष्य के रहन-सहन व आहार-विहार में जिस तीव्र गति से परिर्वन हुआ है, उससे भारतीय संस्कृति धीरे-धीरे स्वयं की पहचान खोती जा रही है। फास्ट फूड, अति गरिष्ठ भोजन, अति मिष्ठान का सेवन, मद्यपान व रासायनिक पेय पदार्थों का प्रचलन तथा व्यभिचार तीव्र गति से बढ़ रहा है। उद्योगों की बढ़ती संख्या, दुपहिया व चौपहिया वाहनों की संख्या में निरंतर वृद्धि, धूल, धुआं, रसोईगैस में निर्मित आहार, चारों ओर ध्वनि प्रदूषण के वातावरण के चलते मनुष्य का अत्यंत तनावग्रस्त होना, अति महत्वाकांशी होना व कम समय में उच्च लक्ष्य की प्रप्ति की लालसा के साथ की ऐशो-आराम की जिंदगी में फ्रिज, अत्यधिक सोशल मीडिया का प्रयोग, टी.वी., कुलर, एयर कंडीशनर, मोबाइल, रिमोट कंट्रोल जैसी भौतिक सुख-सुविधाएं आदि ऐसे कारण हैं, जिनके फलस्वरूप विश्व में हाई ब्लडप्रेशर, हृदय विकार व मधुमेह जैसी व्याधियों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ये ही लाइफ स्टाइल डिसआर्डर के अतंर्गत आते है। भयावह रोग मधुमेह चूंकि शरीर में चुपके से प्रवेश करता है, इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है।

आज अधिकांश घरों में मधुमेह से ग्रस्त रोगी हैं। आखिर मधुमेह का विस्तार इतनी तीव्र गति से क्यों होता जा रहा है? जाहिर है हमारी जीवनशैली में पहले से काफी परिवर्तन आ गया है। इसके प्रसार के प्रमुख कारण हैं-
* आनुवंशिक * मोटापा * बढ़ती उम्र।
* मानसिक और शारीरिक तनाव * व्यायाम की कमी।
* खान-पान में बदपरहेजी व अनियमितता।
आज से हजारों वर्ष पूर्व प्राचीन मनीषियों ने आयुर्वेदिक ग्रंथों में मधुमेह के कारणों को इस प्रकार बताया है —
‘आस्या सुखं स्वप्न सुखं, दधीनी ग्राम्योदक आनूप रसाः पयांसि नपवान्नपानं गुडवैकृतंच प्रमेह हेतु कफकृच्छ कर्मः’
अर्थात् जो लोग आरामतलब जिंदगी जीते हैं, बिना परिश्रम किए ही आराम से नींद लेते हैं, साथ ही आहार में नवीन अन्न व जल, दूध, दही व गुड़ से बनी वस्तुओं और मांस रस का सेवन अधिक करते हैं, उन्हें ही मधुमेह होने की संभावना अधिक होती है।
 
अधिक तनाव शरीर में रक्त शर्करा की मात्रा को बढ़ाता है। तनाव की स्थिति में कोशिकाओं को ग्लूकोज की कम आवश्यकता पड़ती है और उनके चयापचय पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस बात को वर्षों पहले काफी अच्छी तरह से समझाते हुए आयुर्वेद ने कहा था कि भोजन के दौरान गुस्सा, तनाव, हड़बड़ी, वादविवाद या बहुत ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए। भोजन न केवल स्वादिष्ट, बल्कि सुपाच्य व संतुलित भी होना आवश्यक है।
 

उत्पत्ति

प्रतिदिन ग्रहण किए जाने वाले आहार से हमें ऊर्जा मिलती है। इस आहार को हमारा पाचन संस्थान एक प्रकार के ईंधन में बदलकर रखता है, जिसे ग्लूकोज कहा जाता है। यह रक्त में मिलकर हमारे शरीर की अनगिनत कोशिकाओं तक ऊर्जा देने के लिये पहुंचता है। मनुष्य शरीर में उपस्थित अग्न्याशय एक विशेष ग्रंथि होती है- जिसे पैंक्रियाज कहते हैं। इसमें से इंसुलिन स्राव होता है। हमारे द्वारा सेवन किए गए कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थ का रूपांतर शर्करा (ग्लूकोज़) में होता है। यह ग्लूकोज़ अंतड़ियों से रक्त में जाता है और जैसे-जैसे रक्तगत ग्लूकोज़ का प्रमाण बढ़ता है, वैसे-वैसे पैंक्रियाज ग्रंथि से इंसुलिन रक्त में आता है तथा वह रक्त की शर्करा का पाचन कर लिवर या अन्य मांसपेशियों में ग्लाइकोजन के रूप में संचित कर रखता है। सबसे अधिक ग्लूकोज़ मांसपेशी में पहुंचता है, तभी वह अपने भिन्न-भिन्न कार्य कर सकती है। मांसपेशियों में पर्याप्त मात्रा मे ग्लूकोज़ के न पहुंचने से शरीर को आवश्यकतानुसार ऊर्जा नहीं मिल पाती। यदि इंसुलिन का प्रमाण रक्त में कम हो या इंसुलिन सुचारु रूप से कार्य न करे, तो रक्त में शर्करा बढ़ती है व मूत्र के द्वारा भी बाहर निकलती है। इसे ही डायबिटीज कहते हैं।
 

रोग के लक्षण

1) पेशाब अधिक बार होना।
2) अधिक प्यास लगना।
3) वजन घटना।
4) कमजोरी और थकावट महसूस करना।
5) आंखों की ज्योति कम होना।
6) बार-बार घाव होना व जल्दी न भरना।
7) शरीर में खुजली होना।
8) फोड़े-फुंसी ठीक न होना।
कुछ रुग्णों को मधुमेह के लक्षण महसूस नहीं होते और डॉक्टर के परीक्षण करने पर अचानक इस रोग का निदान होता है।
 

प्रकार

आधुनिक शास्त्रानुसार मधुमेह व्याधि मुख्यतः 2 प्रकार की होती है –
 
प्रथम अक्सर बच्चों में पायी जाती है क्योंकि उनके अग्न्याशय (Pancreas) में बहुत कम या कुछ भी इंसुलिन नहीं बनती है और इंसुलिन की सुइयों की जरूरत होती है। इस प्रकार की डायबिटीज़ को Juvenile Diabetes अथवा इंसुलिन पर निर्भर होने वाली डायबिटीज़ (Insulin Dependent Diabetes Mellitus) कहते हैं। इस प्रकार के मधुमेह में रोगी किटोएसिडोजिस (Ketoacidosis) नामक रोग की गंभीर अवस्था में जा सकता है। इस प्रकार का मधुमेह तीव्र स्वरूप का होता है, जिसमें इंसुलिन इंजेक्शन शुरुआत से ही देना पड़ता है। इसमें ब्लड शुगर का प्रमाण अधिक मात्रा में कम-ज्यादा होता रहता है। अधिक मूख, प्यास व बार-बार मूत्र प्रवृत्ति जैसे लक्षण शुरुआत में तीव्र स्वरूप ही होते हैं।
 

द्वितीय प्रकार अधिकतर 40 वर्ष से ऊपर की आयु वाले व्यक्तियों में पाया जाता है। इनमें अधिकांश रुग्ण मोटापे से ग्रस्त होते हैं। इस तरह की डायबिटीज में अग्न्याशय पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बनाता और इंसुलिन की मात्रा बढ़ाने के लिए गोलियों की जरूरत हो सकती है। इस प्रकार की डायबिटीज़ को इंसुलिन पर न निर्भर होने वाली डायबिटीज़ (Maturity Onset or Non Insulin Dependant Diabetes Mellitus) कहते हैं।

आयुर्वेद में प्रमेह व्याधि का वर्णन है, जिसमें रुग्ण को बार-बार मूत्र प्रवृत्ति होती है। प्रमेह के 20 प्रकार बताए गए हैं, उसमें से एक प्रकार मधुमेह है।

 

परिक्षण

मधुमेह के निदान के लिए रक्त व मूत्र की जांच द्वारा शर्करा का पता लगाया जाता है। स्वस्थ व्यक्ति के मूत्र की जांच में शर्करा अनुपस्थित रहती है व रक्तगत शर्करा खाली पेट (Fasting) 80 से 110 mg/dl तथा भोजन के डेढ़ से दो घंटे पश्चात (Post Meal) 110 से 150 mg/dl होती है। इससे अधिक शर्करा रहने पर मधुमेह व्याधि का निदान होता है।

रक्त में शुगर की मौजूदगी वाले हिमोग्लोबिन टेस्ट (HBA1C) से रक्त शर्करा नियंत्रण (Blood Sugar Control) ज्ञात होता है। यह मात्रा रक्त में 2-3 महीनों के अंतराल में शुगर की मात्रा पर निर्भर करती है। यदि ग्लाइकोसाइलेटिड हिमोग्लोबिन टेस्ट 7 प्रतिशत कम होने का परिणाम दिखाता है, तो डायबिटीज़ को नियंत्रण में माना जाता है। ए1सी की 1% गिरावट से डायबिटीज के खतरे को 20% तक कम किया जा सकता है।

परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि इन लोगों को मधुमेह होने की अधिकाधिक संभावना होती है-
* जिनका वजन सामान्य से अधिक हो।
* जिन लोगों के परिवार में किसी को डायबिटीज हो।
* जिनकी उम्र 40 वर्ष से अधिक हो।
* जिन्हें निरंतर मानसिक या शारीरिक तनाव हो।
* कभी-कभी गर्भावस्था में भी महिलाओं को मधुमेह हो सकता है।
* अधिक वजन वाली स्त्री यदि गर्भवती हो जाए, तो उसे मधुमेह की संभावना होती है।
* पिछली बार गर्भावस्था में यदि रुग्ण मधुमेह से ग्रस्त हो, तो अगली गर्भावस्था में मधुमेह होने की संभावना रहती है।
* जिन महिलाओं के परिजनों को मधुमेह है और जो 30 वर्ष से अधिक उम्र में गर्भवती हो जाती हैं, उन्हें भी मधुमेह हो सकता है।

गर्भावस्था के दौरान मधुमेह का दोहरा दुष्प्रभाव गर्भवती के शरीर पर होता है, जिससे अनेक विषमताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इस दौरान गर्भावस्था में अनियंत्रित मधुमेह मां व शिशु दोनों के जीवन के लिए खतरा बन सकता है। गर्भवती स्त्रियों को गर्भधारण के पूर्व व संपूर्ण गर्भावस्थाकाल में चिकित्सक के मार्गदर्शन में औषधि व आहार योजना करनी चाहिए। खानपान में परहेज व आवश्यक औषधि से मधुमेहग्रस्त गर्भिणी स्वस्थ बालक को जन्म दे सकती है। गर्भावस्था में यदि गर्भपात हुआ हो अथवा मृत अवस्था में बच्चा पैदा हुआ हो, तो भी मधुमेह हो सकता है।

रोगजन्य उपद्रव (Complications)

मधुमेह से ग्रस्त रुग्ण को कई बार स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
* मधुमेही का वजन घटने लगता है, जबकि आहार की मात्रा पर्याप्त होती है।
* रुग्ण की व्याधि प्रतिरोध क्षमता (Immunity Power) कम हो जाती है। इसके कारण बार-बार रोग व संक्रमण की संभावना रहती है।
* मधुमेह से ग्रस्त बच्चों का विकास धीमी गति से होता है व किशोरावस्था देर से प्रारंभ होती है।
* मधुमेही की दृष्टि (नजर) कमजोर हो जाती है।
* रोगी को उच्च रक्तचाप भी हो सकता है।
* रक्त में शर्करा का प्रमाण बढ़ने से रुग्ण की श्वास गति बढ़ जाती है। उलटी, पेटदर्द के साथ बेहोशी आ सकती है।
* मधुमेही को इंसुलिन का प्रमाण यदि अधिक दे दिया गया, तो हाइपोग्लाइसेमिया (रक्त में ग्लूकोज की अत्यंत कम मात्रा) की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है। कभी-कभी मस्तिष्क को आघात पहुंचने से मृत्यु भी हो सकती है।
* मधुमेह का प्रभाव आंखों, गुर्दों, मस्तिष्क, स्नायुतंत्र व हृदय पर भी पड़ता है। इस तरह मधुमेह का रुग्ण देखने में तो स्वस्थ दिखाई देता है, लेकिन भीतर उसका शरीर खोखला होता जाता है। अतः कहा जा सकता है कि मधुमेह छिपा हुआ कातिल या साइलेंट किलर है।
 

उपद्रवस्वरूप निर्मित रोग

1) किडनी विकार (Diabetic Nephropathy): मधुमेह के कारण किडनी पर दुष्प्रभाव होता है। इसमें किडनी के पोषण में कमी होकर मूत्र से एल्ब्बूमिन जाता है, जिससे शरीर में सूजन होती है और ब्लड प्रशर भी बढ़ता है। इसी से किडनी फेल होने की संभावना रहती है।
2) नाड़ी तंत्रिकाजन्य विकार (Diabetic Neuropathy): मधुमेह के उपद्रवस्वरूप नाड़ियों की शाखा प्रशाखा में विकृति उत्पन्न होती है क्योंकि ग्लूकोज का उचित रूप से उपयोग नहीं होता है। इसमें रुग्ण को शरीर में अत्यंत पीड़ा, हाथ-पैर सुन्न, झुनझुनी व पैर के तलवों में जलन होती है।
3) नेत्र विकार (Retinopathy) : मधुमेह से ग्रस्त रुग्णों में रोगी की दृष्टि धीरे-धीरे मंद होने लगती है, आंखों में मोतियाबिंद होता है। आगे चलकर नेत्र में दृष्टिपटल विकृति (Retinopathy) होती है, जिसमें अत्यंत धुंधला दिखाई देता है। इस प्रकार मधुमेह ग्रस्त रोगी की आंखों में 3 प्रकार से हानि होती है। कम उम्र में मोतियाबिंद (Cataract), काच बिंदु (Glaucoma) व आंखों के पर्दे में विकृति आना (Diabetic Retinopathy) |
4) गैंग्रीन: मधुमेहग्रस्त वृद्ध रुग्ण के पैरों की उंगलियों में रक्तवाहिनियों के डीजनरेशन के कारण वहां के नाड़ी तंतु में विकृति आ जाती है, जिससे उंगली की त्वचा में सुन्नता व कालापन आ जाता है। अंत में वहां की त्वचा गलने से दुर्गध पैदा हो जाती है। इसे ही गैंग्रीन कहते हैं। यह रोग होने पर प्रभावित उंगली या पैर काटने की नौबत आती है।
5) ठीक न होने वाली फुंसियां व घाव: मधुमेह रुग्ण के शरीर में होने वाले फोड़े-फुंसियां बढ़ी हुई शर्करा के कारण ठीक नहीं होते हैं। इसके अलावा कोई घाव होने पर वह जल्दी नहीं भरता।
6) हृदय पर दुष्परिणाम : हृदय की रक्तवाहिनियां संकरी और कठिन हो जाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिससे विविध अवयवों और अंगों को पर्याप्त रक्त एवं पोषण प्राप्त नहीं होता। हृदय की कॉरोनरी धमनियां संकरी हो जाने के कारण हृदय को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता और इससे हृदयाघात हो सकता है।
7) धमनी विकार : मधुमेह के कारण रक्तवाहिनियों व उनकी शाखाओं में विकार आने से पैरों को नीचे लटकाने पर नसें दिखाई देती है। पैर व अंगूठे की त्वचा पतली हो जाती है। इसके लिए धमनी के ऑपरेशन की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा मधुमेह रोगी को टी.बी., हाई ब्लडप्रेशर, अंधापन व लकवा होने की संभावना रहती है। इसलिए मधुमेह का नियंत्रण व उपचार आवश्यक है।
 

डायबिटीज के मरीजों को होता है स्ट्रोक का खतरा

डायबिटीज अपने आप में बड़ी बीमारी नहीं है। यह बड़ी बीमारी है तो इसलिए कि इसको लेकर की गई लापरवाही से ये कई घातक शारीरिक समस्याओं की वजह बन सकती है। डायबिटीज के हर मरीज को इस बात की जानकारी जरूर दी जाती है। लेकिन यह बात बहुत कम बताई जाती है कि अगर डायबिटीज कंट्रोल में नहीं है तो इससे इनके मरीजों में ब्रेन स्ट्रोक का खतरा भी सामान्य लोगों की तुलना में बढ़ जाता है। अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन की एक ताजा रिसर्च के मुताबिक डायबिटीज से स्ट्रोक के जोखिम में पांच प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो जाती है।
 

कब होता है स्ट्रोक ?

ब्रेन स्ट्रोक तब होता है, जब उस तक पहुंचने वाली रक्त वाहिकाओं में रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है। जब मस्तिष्क के एक हिस्से को खून की पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिलती है तो वह हिस्सा निष्क्रिय या मृत हो जाता है। ब्रेन स्ट्रोक का मामला वैसा ही है, जैसे हार्ट अटैक के दौरान दिल को रक्त की आपूर्ति बाधित होती है। स्ट्रोक का पहले से अनुमान नहीं लगाया जा सकता यानी इसके कोई पूर्व लक्षण नहीं होते, लेकिन अगर किसी को स्ट्रोक हुआ है, तो इसके प्रारंभिक संकेत तुरंत मिल जाते हैं। इन संकेतों में तेज दर्द होना, चक्कर आना, चलने या बोलने में दिक्कत महसूस होना, शरीर के एक हिस्से में सुन्नता महसूस होना, धुंधला नजर आना आदि शामिल हैं। अगर इनमें से कोई एक या सभी संकेत दिखाई दे तो तुरंत किसी अच्छे न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए, ताकि स्थिति को और ज्यादा गंभीर होने से बचाया जा सके।
 

डायबिटीक को ज्यादा खतरा क्यों ?

स्ट्रोक के प्रमुख जोखिमों में से एक डायबिटीज भी है। अगर किसी व्यक्ति की ब्लड शुगर का स्तर लगातार ज्यादा रहे तो उसकी रक्त वाहिकाओं और नसों पर इसका विपरीत असर होता है। ज्यादा समय तक ब्लड शुगर अनियंत्रित रहने से गर्दन और मस्तिष्क को खून की आपूर्ति करने वाली रक्त वाहिकाओं में खून का थक्का जम सकता है या वसा जमा हो सकती है। इसके बढ़ने से रक्त वाहिकाएं संकरी होती जाती हैं या पूरी तरह बंद भी हो सकती हैं। डायबिटीज के रोगी को आमतौर पर होने वाली हाई बीपी की समस्या इसकी आशंका को और बढ़ा देती है। अगर ऐसे मरीज का वजन भी ज्यादा है तो इससे स्ट्रोक की आशंका और भी बढ़ जाती है। हानिकारक कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) की अधिक मात्रा भी स्ट्रोक की आशंका बढ़ाती है।
 

क्या सावधानियां रखें ?

* स्ट्रोक का जोखिम कम करने के लिए डायबिटीज को काबू करना जरूरी है। इसके साथ-साथ हाई कोलेस्ट्रॉल और हाईपरटेंशन को भी कम करना चाहिए।
* साल में कम से कम एक बार अपना एचबीए 1 सी (HbA1c), ब्लड कोलेस्ट्रॉल (ब्लड फैट्स) और बीपी नियमित रूप से चेक करवाएं।
* धूम्रपान-अल्कोहल का सेवन ना करें। यह शरीर के महत्वपूर्ण अंगों के आस-पास खून के सहज प्रभाव को बाधित करता है।
* तनाव से बचें क्योंकि इससे हाइपरटेंशन या उच्च रक्तचाप की समस्या होती है जो स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा देती है।
 

आहार संबंधी निर्देश

* जिनका वजन अधिक है, उन्हें खाने की मात्रा में नियंत्रण रखना होगा। भोजन को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बांटकर 4 बार खाएं और उपवास न करें। भूख लगने पर सलाद, सूप, टमाटर का रस, मट्ठा, राजगिरी की लाही का प्रयोग करें। ये पदार्थ भूख मिटाते हैं व कैलोरीज भी नहीं बढ़ाते।
* एक दिन पहले 1 चम्मच मेथी दाना 1 गिलास पानी में भिगोकर रखें। दूसरे दिन प्रातः उक्त पानी पिएं व मेथी दाने दही में मिलाकर नाश्ते में खाएं। यदि शरीर के किसी भाग में दर्द हो तो उक्त दही में चुटकी भर सोंठ मिला लें। इसके अतिरिक्त नाश्ते में अंकुरित या उबले मूंग, चने या लाल टमाटर अथवा पालक, टमाटर, करेले का रस लें।
* खाने में नमक (सोडियम) और शक्कर का सेवन कम से कम करें।
* भोजन में 50 प्रतिशत सलाद का होना आवश्यक है। उबली हरी सब्जियों का सेवन अधिक मात्रा में करें। गेहूं, चना, सोयाबीन, जौ को समान भाग में मिलाकर, मोटा आटा पिसवाकर रोटी बनाकर खूब चबा-चबाकर खाएं।
* शाम को देसी पपीता, अमरूद, जामुन या किसी खट्टे फल का सेवन अवश्य करें।
* रात का भोजन 7-8 बजे तक कर लें। भोजन में सलाद, सूप, हरी सब्जियां व गेहूं, चना, जौ मिले मोटे आटे की रोटी होना आवश्यक है। सोते समय दूध अवश्य लें।
* हर 15 दिन में ब्लड शुगर की जांच अवश्य कराएं। जैसे-जैसे रोग का वेग कम हो, दवा की मात्रा कम करें। दवाओं के समाप्त होने के बाद धीरे-धीरे सामान्य भोजन पर आएं। सदैव ध्यान रखें कि सात्विक एवं संतुलित आहार शरीर को स्फूर्ति देता है तथा गरिष्ठ एवं तामसिक आहार मन एवं शरीर को दूषित कर विकार उत्पन्न करता है।
 

योगासन

योगासन मधुमेह के उपचार का महत्वपूर्ण भाग है। संतुलित व नियमित आहार के साथ योगासन मधुमेह पीड़ित के लिए आवश्यक है। नियमित योगासन करने से रक्तगत शर्करा का स्तर नियंत्रित होता है, वजन कम होता है, शरीर की अनावश्यक चर्बी कम होकर हृदय रोग से बचाव होता है तथा हृदय व फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि होकर शरीर स्वस्थ रहता है। अनुभव से पाया गया है कि मधुमेह रोगी द्वारा नियमपूर्वक योगासन करने से इंसुलिन का प्रभाव बढ़ता है, फलतः इंसुलिन की मात्रा में कमी लाई जा सकती है। इसके अलावा मानसिक तनाव कम होकर रक्तदाब भी नियंत्रित रहता है। साथ ही नियमित प्रातःभ्रमण (Morning Walk) के इस व्याधि में उत्तम परिणाम पाए गए हैं।
रोज कम से कम आधे घंटे तक ब्रिस्क वॉकिंग (तेज चहलकदमी) करें। इसके अलावा सप्ताह के पांच दिन 30-30 मिनट के लिए कसरत भी करें।
 

अनुभूत घरेलू नुस्खे

* प्रातःकाल उठकर नीम, तुलसी, सदाफुली, बेल व अमरूद के 2-2 पत्ते खाली पेट सेवन करें।
* मेथी व जामुन की गुठली का समभाग चूर्ण 1 चम्मच सुबह-शाम सेवन करें।
*आंवला / त्रिफला व कच्ची हल्दी सेवन में उपयोगी हैं।
* पेट साफ करने हेतु नित्य रात्रि 1 चम्मच त्रिफला चूर्ण लें।
* पलाश पुष्प को छांव में सुखाकर काले भाग सहित कपड़छान चूर्ण बनाएं। इसे निम्बपत्र, बिल्वपत्र व करेले के स्वरस की 3-3 बार भावना दें। फिर सुखाकर 1-1 चम्मच सुबह-शाम सेवन करें।
* विजयसार की लकड़ी तांबे के बर्तन में रात भर भिगोएं तथा सुबह उठते ही भिगोया हुआ पानी पिएं। उसी प्रकार तगर की लकड़ी को भी पानी में भिगोकर सेवन करने से लाभ मिलता है।
* नीम, बेलपत्र, तुलसी व गुड़मार का रस निकालकर प्रतिदिन लेना भी लाभकारी है।
 

आयुर्वेद चिकित्सा

मधुमेह की चिकित्सा में नियमित आहार-विहार, हर्बल औषधि, आयुर्वेदिक पंचकर्म व योगासन का समावेश है। इस विशेष चिकित्सोपक्रम से पैन्क्रियाज के सक्रिय हो जाने से रक्त में बढ़ी शर्करा तथा मधुमेह की वजह से भिन्न-भिन्न अवयवों पर दुष्परिणाम कम होते पाए गए है। औषधि में आरोग्यवर्धिनी 5 ग्राम, चंद्रप्रभा वटी 5 ग्राम, प्रमेहगज केसरी 5 ग्राम, स्वर्णमाक्षिक भस्म 5 ग्राम, त्रिवंग भस्म 5 ग्राम, मामेजवाघन वटी 5 ग्राम व वसंत कुसुमाकर रस 1 ग्राम की 60 पुड़ियां बनाकर सुबह-शाम भोजन से पहले लें। औषधियां चिकित्सक के मार्गदर्शन में लेने से आशातीत लाभ मिलता है।
 

पंचकर्म

मधुमेह को नियंत्रित करने के लिए आयुर्वेद की महत्वपूर्ण शाखा पंचकर्म के परिणाम प्रभावकारी पाए गए हैं, जिसका विस्तृत वर्णन लेखक द्वारा लिखित ‘पंचकर्म: स्वास्थ्य की कुंजी’ पुस्तक में दिया गया है।
 

नियंत्रण

भारत देश के नागरिक मधुमेह से अधिकाधिक संख्या में आक्रान्त हो रहे हैं, आखिर इसका प्रधान कारण क्या है? अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि यहां पर लोग स्वास्थ्य के संबंध में जागरूक नहीं हैं। लोगों को स्वास्थ्य के महत्व का ज्ञान नहीं है, तभी तो रोगी को कोई भी पैथालॉजिकल जांच करने के लिए कहा जाए तो वह इसे उपेक्षित कर केवल औषधि की मांग करता है। जबकि चिकित्सा हेतु व्याधि का निदान होना परमावश्यक है। अतः मानव को अपने जीवन में स्वास्थ्य का महत्व जानकर उसके अनुसार औषधोपचार करना चाहिए। इससे रोग के गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि Prevention is better than cure के अनुसार यदि स्वयं को इन रोगों से बचाए रखें, तो स्थिति आगे बढ़ ही नहीं सकती। इसके लिए आवश्यकता है आयुर्वेद में बताए गए दिनचर्या, ऋतुचर्या व उपस्तंभ में वर्णित नियमों का पालन करने की। उचित आहार, उचित व्यायाम व उत्तम मानसिक स्थिति के रहते इस व्याधि को काबू में लाया जा सकता है।

आज संपूर्ण विश्व के कई व्यक्ति मधुमेह रोग के पंजे में जकड़े हुए है, एन्टीडायबिटिक ड्रग लेकर किसी तरह अपने जिंदगी के दिन गुजार रहे हैं, किन्तु यह कहां तक उचित है? मरीज आखिर कब तक दवाई के झमेले में रहे? और कब तक इन्सुलिन के जरिये अपने शरीर को चलाता रहे। कुछ ऐसा सोल्युशन आवश्यक है, जिससे वह इन सब कठिनाइयों से मुक्ति पा सके। इस समस्या का समाधान आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में है क्योंकि आयुर्वेद प्राचीन चिकित्सा विज्ञान है। आयुर्वेद में हर रोग की चिकित्सा का वर्णन है। इस शास्त्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे रोग जड़सहित दूर होता है व कोई दुष्प्रभाव नहीं होते हैं। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार मधुमेह याप्य रोग है अर्थात् औषधि व आहार-विहार संबंधी पथ्य पालन सुचारु रूप से किया, तो यह विकार नियंत्रण में रह सकता है। अतः विश्व स्वास्थ्य संगठन को मधुमेह में भारतीय चिकित्सा पद्धति पर अनुसंधान कर इस रोग के नियंत्रण हेतु, आयुर्वेद चिकित्सा का प्रयोग करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि बिना किसी दुष्परिणाम के यह रोग नियंत्रित होकर व्यक्ति स्वस्थ व सरल जीवन जी सके।

विश्व में मधुमेह के बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए जीकुमार आरोग्यधाम में एक विशेष चिकित्सा पैकेज बनाया गया है, जिसके बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। इस चिकित्सा पैकेज से कई मरीजों का इंसुलिन डोज तक कम हो गया है। इस चिकित्सा पैकेज से कई मरीजों की इंसुलिन छूट गई है, साथ ही डायबिटीज के दुष्परिणामों से भी मुक्ति मिली है। इसमें शुरुआत में उनकी पुरानी एलोपैथिक औषधियों के साथ ही आयुर्वेदिक औषधियां दी जाती हैं। आयुर्वेदिक औषधियों का असर दिखने पर धीरे-धीरे उनकी पुरानी एलौपेथिक औषधियां, इन्सुलिन क्रमशः बंद की जाती हैं।

Dr Anju Mamtani

डॉ. अंजू ममतानी
'जीकुमार आरोग्यधाम',
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग, जरीपटका, नागपुर

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