कब्ज अनेक रोगों की जड़ है 1 अतः इस मूल कारण को नष्ट करना कई रोगों की चिकित्सा है। कब्ज से पीड़ित कई रुग्ण लुभावने इश्तिहार पढ़कर, देखकर व सुनकर बाजार में उपलब्ध कब्जहर चूर्ण लेते रहते हैं। इससे उन्हें तात्कालिक मल निष्कासन तो होता है, परंतु इसकी आदत सी पड़ जाती है और आगे चलकर ऐसे चूर्ण भी असर नहीं करते। इसलिए किसी ऐसी चिकित्सा पद्धति का सहारा लेना आवश्यक है, जो स्थायी आराम प्रदान करें।
आधुनिक दिनचर्या ने मनुष्य की जीवनशैली को अस्त-व्यस्त कर दिया है। अव्यवस्थित खान-पान, रहन-सहन आज के युग में सामान्य बात हो गई है। इसी असंतुलित जीवन का परिणाम है-कब्ज, जिससे अनेक लोग पीड़ित हैं। ऐसे रोगी कब्ज के उपद्रवों से परेशान व बेचैन रहते हैं। पंचकर्म से ऐसे रुग्णों को लाभ मिलता है क्योंकि इस चिकित्सा पद्धति से कब्ज के मूल कारणों का निर्हरण होता है।
पंचकर्म एक ऐसी वैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली है, जिससे शरीर में से विषैले पदार्थों का निष्कासन होकर शरीर शुद्धि हो जाती है व दोष संतुलित होने से रोगों से मुक्ति मिलती है। परिणामस्वरूप रुग्ण को स्थायी लाभ मिलता है। कब्ज के रुग्णों में पंचकर्म से पाचकाग्नि प्रदीप्त, समान व अपानवायु संतुलित होती है तथा अंतड़ियों को स्निग्धता से बल मिलता है। इससे नैसर्गिक रूप से स्वयं मल का निर्हरण होता है। अतः कब्ज के रुग्णों को स्थायी आराम के लिए पंचकर्म चिकित्सा जरूर करानी चाहिए। कब्ज से पीड़ित रुग्णों में पंचकर्म के अंतर्गत मुख्यतः अभ्यंतर स्नेहपान, विरेचन, बस्ति कर्म उपयोगी व फलदायी पायी गयी है। जिनका विवरण निम्नलिखित है-
अभ्यंतर स्नेहपान
इसमें पीड़ित रुग्ण को करीब 1 माह तक रोज सुबह आवश्यकतानुसार शुद्ध घी 2 चम्मच से लेकर 6 चम्मच तक दूध में मिलाकर निराहार लेना चाहिए। तकलीफ अधिक होने पर इसे आगे कुछ और दिन या कुछ दिन पश्चात फिर से दिया जा सकता है।
कब्ज में रुग्ण को कुछ माह तक आवश्यकतानुसार 2 से 5 चम्मच एरंड तैल रात को दूध या ऐसे ही लेना चाहिए। इस तरह अभ्यंतर स्नेहन से पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है तथा समानवायु च अपानवायु संतुलित होकर अंतड़ियों में स्निग्धता होने से सुगमता व नैसर्गिक रूप से मल निर्हरण होता है।
विरेचन
कब्ज के रुग्णों में विरेचन कर्म का प्रभावकारी लाभमिलता है। विशिष्ट शास्त्रोक्त प्रक्रिया द्वारा शरीर में एकत्रित अनावश्यक दोषों को अधोमार्ग अथवा गुदामार्ग से मल-विसर्जन क्रिया द्वारा बाहर निकालना ही विरेचन कर्मी है। आम भाषा में इसे जुलाब देना कह सकते हैं. परंतु विरेचन कर्म वैज्ञानिक तरीके से जुलाब देकर किया जाता है। इसमें प्रथमतः पूर्वकर्म अर्थात् स्नेहन-स्वेदन द्वारा संपूर्ण शरीर के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कोषाणुओं से दोषों को आमाशय में लाकर फिर जुलाब की औषधियों द्वारा मल-विसर्जन कराया जाता है। जबकि जुलाब लेने से सिर्फ पेट की सफाई होती है. किंतु पूरे शरीर के दोष बाहर नहीं निकलते। अतः बाजार में आकर्षक च लुभावने विज्ञापनों द्वारा प्रस्तुत की गई जुलाब की औषधियां डॉक्टर के परामर्श के बिना नहीं खानी चाहिए। यह दवाइयां मल का जबरदस्ती विसर्जन कराती हैं। कालांतर में इन्हें लेने की आदत पड़ जाती है। स्नेहन-स्वेदन कराने के पश्चात चिकित्सक द्वारा निर्देशित विरेचन काढ़ा रुग्ण को पिलाना चाहिए। हमारे जीकुमार आरोग्यधाम में कब्ज के रुग्णों को सामान्यतः विरेचन के लिए निम्नलिखित औषधियों से युक्त काढ़ा दिया जाता है-
सनाय, हरीतकी, द्राक्षा, गुलाबकली, सुंठी, सौंफ, त्रिवृत व कुटकी इनके समभाग चूर्ण में से 2 से 3 चम्मच लेकर 300ml पानी में उबालकर 100ml शेष रहने पर विरेचन कर्म कराया जाता है।
विरेचन के दिन रुग्ण को निराहार रहना चाहिए क्योंकि खाली पेट विरेचन कर्म अच्छा होता है। विरेचन काढा देने के बाद जुलाब के वेग आना प्रारभ हो जाते हैं। जुलाब के प्रत्येक वेग का समय, मात्रा व स्वरूप को नोट किया जाता है, जिससे विरेचन कर्म की स्थिति की जानकारी मिलती है। रुग्ण को इस काल में चिकित्सक के निरीक्षण में रहना चाहिए।
विरेचन में पहले मल, पश्चात पित्त व अंत में कफ दोष का निर्हरण होता है। शरीर में हल्कापन लगना, भूख लगना, इन्द्रिय प्रसादन तथा स्वास्थ्य प्राप्ति का अनुभव होने पर समझना चाहिए कि विरेचन सम्यक (ठीक) हुआ है।
विरेचन के पश्चात 4-5 घंटे तक रुग्ण को कुछ भी खाने-पीने की सख्त मनाही है। इसके पश्चात उसे विधिवत् लघु आहार से प्रारंभ करके धीरे-धीरे अपने सामान्य आहार पर लाना चाहिए।
महत्व : कब्ज के अलावा अन्य रोगों में भी विरेचन कर्म हितकारी है। यह कर्म मुख्यतः पित्त दोष के विकारों में लाभदायक है। इस कर्म से शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म कोषाणुओं में संचित दोष मल द्वारा बाहर निकल जाने से शरीर की शुद्धि हो जाती है, त्वचा तेजस्वी व कांतियुक्त हो जाती है तथा जठराग्नि प्रदीप्त होकर भूख अच्छी लगती है। इससे स्मरण शक्ति व बुद्धि तेज होती है। पाचन संस्थान के प्रत्यंगों का शुद्धिकरण होकर उन्हें बल प्राप्त होता है। शरीर के यकृत, प्लीहा, मलाशय, आमाशय, आतों आदि अवयवों की सफाई होकर उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होने से पेट के विकार शीघ्र ही ठीक होते हैं। बहुत सी बीमारियों की जड़ पेट में विकृति होना है। अतः विरेचन कर्म करने से पेट की शुद्धि होकर दूसरी बीमारियां स्वतः ही ठीक हो जाती हैं। चर्म रोगों के उपचार में भी आयुर्वेदिक औषधियों के साथ विरेचन कर्म सोने में सुहागा का कार्य करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि रोगों से मुक्ति के अलावा शरीर में बलवृद्धि होने से मनुष्य की आयु भी बढ़ती है तथा वह चिरकाल तक स्वस्थ रहता है।
बस्ति कर्म
कब्ज के रुग्णों में बस्ति कर्म अत्यंत फलदायी है। गुदा मार्ग में औषधि प्रविष्ट कर पूरे शरीर के दोषों को बाहर निकालना ही बस्ति कर्म है। प्रचलित भाषा में इसकी तुलना एनिमा से की जा सकती है, परंतु बस्ति का प्रभाव एनिमा से कई गुना अधिक होता है। एनिमा से सिर्फ आंतों की सफाई होती है, जबकि बस्ति से संपूर्ण शरीर की सफाई होती है। पंचकर्म के अंतर्गत बस्ति कर्म का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि अधिकांश व्याधियों में बस्ति कर्म करना ही पड़ता है। इसलिए बस्ति को आयुर्वेद में आधी चिकित्सा कहा जाता है। यह कर्म मुख्यतः वात रोगों में अत्यंत प्रभावी है। यह मल निर्हरण करने वाला, शुक्रधातु, वृद्धिकर, वर्धक, नेत्र हितकारक, शरीर की सभी धातुओं को बल प्रदान कर स्वस्थ रखता है। कब्ज के रुग्णों में अंतड़ियों को बल मिलता है, जिससे वे सहज तथा नैसर्गिक रूप से मल निर्हरण करती हैं। निरूह बस्ति में औषधियुक्त काढ़ा व अनुवासन बस्ति में औषधियुक्त तैल दिया जाता है।
निरूह बस्ति खाली पेट व अनुवासन बस्ति खाना खाने के बाद देनी चाहिए, जिससे अच्छे परिणाम मिलते हैं। निरूह बस्ति देने के पूर्व अनुवासन बस्ति देनी चाहिए, परंतु जिसमें लेखन करना हो या स्थूलता में निरूह बस्ति भी पहले दिन दी जा सकती है। अनुवासन बस्ति के अंतर्गत 100-150 ml औषधियुक्त कुनकुने तैल या तिल तेल में 5 ग्राम सैंधव लवण मिलाकर देते हैं।
कब्ज के रुग्णों में निरूह बस्ति : दशमूल, त्रिफला व सनाय का समभाग चूर्ण 50 ग्राम लेकर 1 लीटर पानी में मिलाकर इतना उबालें कि 300-350 ml शेष बचे। एक अलग पात्र में 50-100 ml तिल तैल या एरंड तेल लेकर उसमें 2 चम्मच सेंधा नमक व सौफ का कल्क (चटनी) मिलाएं। अब इसमें उपरोक्त 300-350 ml क्वाथ मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करें ताकि तेल इत्यादि पूर्ण तरह से मिल जाएं। तत्पश्चात कुनकुना द्रव पदार्थ बस्ति द्रव्य यंत्र (एनिमा पात्र) में भरकर रुग्ण को दें।
बस्ति कर्म ठीक तरह से होने पर शरीर में हल्कापन, भूख लगना, इन्द्रिय प्रसन्नता, मल निस्सरण, वायु अनुलोमन, बल वृद्धि आदि लक्षण मिलते हैं। बस्ति सम्यक लक्षण दिखने के पश्चात दूसरे दिन या उसी दिन शाम को चिकित्सक योजनानुसार दूसरी बस्ति देते हैं। बस्ति के समय उपद्रव होने पर पहले उसकी चिकित्सा करनी चाहिए। सामान्यतः बस्ति दिये जाने के दिनों में कठिन परिश्रम नहीं करना चाहिए। बस्ति कर्म के दौरान हल्का आहार लेना चाहिए, इसे परिहार काल कहते हैं।
बस्ति का महत्व : पंचकर्म के अंतर्गत ‘बस्ति’ ही सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा है। इसका कार्य केवल मल शोधन तक ही सीमित नहीं, अपितु सार्वदेहिक है। विशिष्ट औषधियों के संयोग से बस्ति शरीर में शोधन, शमन, लेखन, बृहण, वाजीकरण, वयस्थापन इत्यादि गुणों से युक्त होती है। बस्ति के उक्त सार्वदेहिक कार्य वात-नियामन से होते हैं। वात की शरीर के प्राकृत व विकृति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि वात ही संपूर्ण शरीर का संचालन करता है। यह कर्म कब्ज के रुग्णों में मुख्यतः अपान व समान वायु का संतुलन करता है।
इस तरह कब्ज के रुग्णों को 6 माह में एक बार पंचकर्मी की उपरोक्त क्रियाएं किसी केंद्र या चिकित्सालय में करानी चाहिए। इससे उन्हें कब्जहर औषधियों का सेवन करने से छुटकारा मिलता है। 2 साल तक 6 माह में 1 बार व आगे 3 वर्ष तक वर्षभर में एक बार पंचकर्म चिकित्सा अवश्य करनी चाहिए।