प्राचीन काल में मनुष्य की दिनचर्या व्यवस्थित व निश्चित थी, जिसमें सात्विक आहार-विहार का पूर्ण समावेश था । उन दिनों लोग प्राकृतिक वेगों का निर्हरण समयानुसार करते थे। परंतु आज के मशीनी युग व भागमभाग की जिंदगी में मानव इस कदर व्यस्त हो गया है कि उसे अपने आहार विहार का ध्यान नहीं रहता तथा वह प्राकृतिक वेगों का धारण करता (रोकता) है। जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न विकार पनपते हैं। इनमें परिकर्तिका नामक अति-पीडादायक व्याधि का भी समावेश है, जो मुख्यतः पुरीष (मल) के वेग को रोकने से होती है। प्रस्तुत हैं लेखक डॉ. ममतानी द्वारा M.D.की स्नातकोत्तर उपाधि के लिए 32 वर्ष पूर्व इसी व्याधि पर किए गए प्रायोगिक अध्ययन के महत्वपूर्ण अंश…..
गुद भाग की संरचना
आयुर्वेदिक व आधुनिक ग्रंथकारों ने गुद भाग को बृहदांत्र (Large Intestine) का अंतिम भाग कहा है। आयुर्वेद में गुद भाग के 2 प्रकार बताए गए हैं-उत्तरगुद व अधरगुद । इन्हें आधुनिक चिकित्साशास्त्र में रेक्टम व एनस (Rectum & Anus) कहा गया है। यह शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यदि इसकी रचना व क्रिया में कोई विकृति उत्पन्न हो जाए तो मनुष्य का जीवित रहना मुश्किल होता है। अतः इसे मर्म कहा जाता है।
आचार्य सुश्रुत ने गुद भाग में 3 वलियों की स्थिति बताई है। यह वलिया चक्राकार रूप में एक दूसरे के ऊपर स्थित रहती है। प्रत्येक वली के बीच में डेढ़ अंगुल का अंतर रहता है। इन वलियों को अंदर से बाहर की ओर क्रमशः प्रवाहिणी, विसर्जनी व संवरणी के नाम से जाना जाता है। सुश्रुत संहिता के टीकाकार के अनुसार गुदौष्ठ की लंबाई 1/2 अंगुल है। अतः इस प्रकार से वलियों की लंबाई 4 अंगुल हुई क्योंकि संपूर्ण गुद की लंबाई साढ़े 4 अंगुल होती है।
गुद भाग को हम पूर्ण रूप से निःसंक्रमित (जीवाणुरहित) नहीं कर सकते क्योंकि यहां पर विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं का निवास रहता है। E coli के फलस्वरूप यहां विभिन्न व्याधियों की उत्पत्ति होने तथा जीवाणुओं सहित मल के द्वारा भी यह भाग बार-बार दूषित होने से यहां होने वाली व्याधि की चिकित्सा करना कठिन होता है कारण कि अन्य भागों की अपेक्षा यहां रक्तवाहिनियों, लसिकावाहिनियों व तत्रिकातंत्र की संख्या अधिक होती है।
गुदा स्थान में होने वाली अन्य व्याधियां अर्श (Piles), परिकर्तिका (Fissure), गुदभ्रंश (Prolapse rectum), भगंदर (Fistula in ano) हैं। सामान्य व्यक्ति इन तीनों स्थितियों को अर्श ही समझता है। जिसे सामान्य भाषा में मूळ व्याधि के नाम से जाना जाता है परंतु इन व्याधियों के लक्षण व चिकित्सा में बहुत अंतर है। परिकर्तिका व्याधि में जितनी तीव्र वेदना होती है, उतनी अर्श में नहीं होती। सभी प्रकार के गुद रोगों में सबसे ज्यादा तीव्रात्मक पीडा की स्थिति परिकर्तिका में होती है। यह व्याधि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक पाई जाती है। इसका मुख्य कारण वेग धारण करना है। आचार्य काश्यप के अनुसार गर्भावस्था में परिकर्तिका पाई जाती है व प्रसव के पश्चात भी इसका पाया जाना स्वाभाविक है। आयुर्वेद में इसका वर्णन स्वतंत्र रूप से न होकर अन्य रोगों का उपद्रव (Complication) बताया गया है।
परिभाषा
परिकर्तिका अर्थात कर्तनवत वेदना, जिसका अर्थ है गुदा भाग के चारों ओर काटने जैसी पीड़ा होना।
परिकर्तिका शब्द की उत्पत्ति परिकृ शब्द से हुई है, अर्थात् काटने जैसा। डल्हणाचार्य के अनुसार जहां काटने व फाडने जैसी पीडा हो, उसे परिकर्तिका कहते है।
कारण
- जिस व्यक्ति को स्नेहन भली-भांति करा दिया गया हो. जिसका कोष्ठ भारी हो, उदर में साम दोष भरा हो, उस समय बलवान औषधि पिलाई गई हो।
- जिसका शरीर रूक्ष हो. कोष्ठ मृदु हो, श्रांत (थका) हो तथा निर्बल हो या यदि ऐसे व्यक्ति को तीक्ष्ण विरेचन औषधि दी गई हो।
- मृदु कोष्ठ वाले तथा दोष वाले पुरुषों में यदि रूक्ष, तीक्ष्ण और अधिक मात्रा में निरूह बस्ति दी गई हो।
- तीव्र ज्वर व तीव्रातिसार से होने वाला परिकर्तिका ।
प्रकार
दोषों की प्रबलता के आधार पर आचार्य काश्यप ने इसके 3 प्रकार बताए है-
1. वातिक कर्तनवत पीड़ा (काटने जैसी)
2. पैत्तिक दाहवत पीडा (जलनयुक्त)
3. श्लेष्मिक कंडुयुक्त पीड़ा (खुजलीयुक्त)
लक्षण
परिकर्तिका व्याधि में गुदगत व्रण स्थान पर असहनीय वेदना होती है। परिकर्तिका का बार-बार होना (Recurrence) विबंध व अतिसार पर निर्भर रहता है अर्थात् प्रमुखतः पाचन संस्थान पर यह स्थिति निर्भर रहती है। जब तक पाचक संस्थान को सामान्य स्थिति में न लाया जाए, तब तक कितने भी उत्तम स्थानिक प्रयोग किए जाएं, कोई लाभ प्राप्त नहीं होता है। अतः परिकर्तिका की वेदनात्मक स्थिति रुग्ण को विचलित कर देती है।
परिकर्तिका एक खतरनाक व्याधि है क्योंकि व्रण तो इसमें बहुत छोटा होता है, पर इसका पुनरुद्भव (Recurrence) होता है। जब कभी रोगी को कब्ज होता है या अन्य किसी हेतु के फलस्वरूप कठिन ऊतकीय रचना निर्मित होती है। यह रचना परिकर्तिका के मूल से लटकती रहती है, जिसे सेंटिनल पाइल (Sentinel pile) के नाम से जाना जाता है। सेंटिनल पाइल की उपस्थिति जीर्ण परिकर्तिका की द्योतक होती है। जब तक इस अर्श को निर्हरित न किया जाए तब तक परिकर्तिका का रोपण होना संभव नहीं है। कभी-कभी गुद संकोच (Stenosis) की निर्मिती होती है।
चिकित्सा
परिकर्तिका को आयुर्वेदिक ग्रंथों में स्वतंत्र व्याधि नहीं कहा है, परंतु इसकी चिकित्सा का विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है। प्राचीन मनीषियों ने इसकी शल्य-क्रिया नहीं बताई, बल्कि औषधि चिकित्सा से इसे निर्धारित किया जा सकता है, ऐसा बताया गया है। औषधि को 2 प्रकार से उपयोग में लाया जा सकता है।
1. स्थानिक प्रयोग (Local Treatment)
2. सार्वदैहिक प्रयोग (General Treatment)
स्थानिक चिकित्सा
स्थानिक चिकित्सा में विशेष प्रकार की पिच्छा बस्ति का उल्लेख किया गया है, जिसमें विभिन्न औषधियों के साथ घृत या दुग्ध प्रयोग में लाया जाता है। बस्ति कर्म में प्रयोग में आने वाले द्रव्य प्रधानतः वातशामक, पित्तशामक व व्रणरोपक होते हैं।
सुश्रुत व अन्य संहिताकारों ने बस्ति के 3 प्रकार बताए हैं-
1. अनुवासन – जिसमे तिल तेल / घृत का प्रयोग हो।
2. शीतल बस्ति – जिस बस्ति द्वारा शीतलता प्राप्त हो।
3. पिच्छा बस्ति – जहां यष्टिमधु-तिल कल्क-मधु या घृत का प्रयोग हो।
सामान्य चिकित्सा
सामान्य चिकित्सा के अंतर्गत विभिन्न विधियों से चिकित्सा की जाती है।
1. कुछ द्रव्य पाचन संस्थानगत विकार को ठीक करने के लिए किए जाते है।
2. कुछ द्रव्य रेचक होते हैं।
3. कोई द्रव्य दीपन पाचन के रूप में प्रयोग में लाते हैं। परिकर्तिका में शोथनाशक (सूजन नष्ट करने वाली) त्रिदोषशामक औषधियों का प्रयोग बताया गया है। शीतजल स्नान व दुग्धपान बताया गया है। परिकर्तिका में वेदना एवं विबंध (Constipation) लक्षण होते हैं। इन्हें दूर करने पर ही व्याधि दूर होती है। वेदना वात व पित्त दोष के कारण होती हैं। विबंध भी इन दोनों के कारण होते हैं। वेदना के भय से रोगी मल त्याग नहीं कर चाहता। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर प्राचीन मनीषियों ने इस व्याधि में दुग्धपान व शीतजल से स्नान का निर्देश दिया है। चरक के मतानुसार इसमें रोगी को दुग्धपान करना चाहिए। आहार भी दुग्ध के साथ लेना चाहिए, साथ में अम्ल द्रव्यों का सेवन करना चाहिए। यह वातनाशक व दीपनीय होता है। चरकानुसार यदि इसके साथ ज्वर हो तो रोगी को कोकम, बेलपत्र से बना यूष (दाल का पानी) लेना चाहिए।
काश्यप संहिता में दोषों की प्रबलता के आधार पर चिकित्सा बताई गई है।
1. वातिक परिकर्तिका – बृहति, बिल्व, अनंतमूल इत्यादि वात द्रव्यों का प्रयोग करने से वातिक परिकर्तिका में लाभ मिलता है।
2. पैत्तिक परिकर्तिका – गर्भवती स्त्री की परिकर्तिका में मुलेठ हंसपदी तथा धनिया को अच्छे प्रकार से पीसकर मधु में मिलाकर चावल के पानी के साथ पिलाना चाहिए।
3. कफज परिकर्तिका – श्लेष्मिक परिकर्तिका में कटेरी, गोखरू तथा पीपल इन तीनों को समान मात्रा लेकर पीसकर तथा उसमें नमक मिलाकर भोजन तथा पान के रूप में प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा पिप्पली, दाडिम, यवक्षार, हिंगु, सुंठ, अम्लवेतस व सैंधव इनका चूर्ण मद्य या घृत या गरम पानी के साथ पिएं, तो प्रवाहिका व परिकर्तिका जैसा विकार दूर होता है।
आधुनिक मत
आधुनिक शास्त्रानुसार परिकर्तिका के लक्षण फिशर इन एनो (Fissure in ano) से मिलते हैं।
कारण :- 1. आधुनिक शास्त्रानुसार पाइल्स का ऑपरेशन ठीक तरह से न होने पर, जिसमें गुद भाग की त्वचा अधिक कट चुकी हो, जिससे गुदसंकोच होता है और कभी-कभी वहां कब्ज से घाव होकर परिकर्तिका होती है।
2. अंतडी के विकार जैसे कोलायटीस व क्रॉन्स रोग के फलस्वरूप ।
3. गुप्तरोग (वेनरल रोग) के फलस्वरूप ।
प्रकार :- 1. तीव्र – गुदा भाग पर छोटा सा व्रण (घाव) जिसमें तीव्र वेदना होती है।
2. जीर्ण – इसमें व्रण के किनारे मोटे हो जाते हैं। फिशर की निचली सतह में सूजन होती है, जिससे Sentinel tag जैसी अलग लटकती हुई रचना बन जाती है।
लक्षण :- दर्द, वेदना, पीड़ा, रक्तस्राव, स्राव व खुजली, सूजन, मूत्र संबंधी कष्ट ।
1. वेदना – परिकर्तिका की पीडा असहनीय होती है। मलत्याग के समय तीव्र वेदना की शुरुआत होती है, जो एक-डेढ़ घंटे तक रहती है। दर्द के कारण रोगी मलत्याग को टालता रहता है।
2. रक्तस्राव कुछ बूंदे रक्त की जाती हैं, जो मल से चिपकी रहती है। कभी-कभी रक्तप्रवृत्ति ज्यादा होने से रोगी एनिमिया से ग्रस्त हो जाता है। अधिक स्राव के कारण खुजली होती है।
3. सूजन – Sentinel tag के कारण रुग्ण गुदभाग में सूजन तथा अर्श होने की शिकायत करता है।
4. मूत्र संबंधी कष्ट – मूत्र में जलन या रुक-रुक कर मूत्र प्रवृत्ति या अधिक मूत्र प्रवृत्ति की शिकायत होती है।
आधुनिक मत
आधुनिक शास्त्रानुसार परिकर्तिका के लक्षण फिशर इन एनो (Fissure in ano) से मिलते हैं।
कारण :- 1. आधुनिक शास्त्रानुसार पाइल्स का ऑपरेशन ठीक तरह से न होने पर, जिसमें गुद भाग की त्वचा अधिक कट चुकी हो, जिससे गुदसंकोच होता है और कभी-कभी वहां कब्ज से घाव होकर परिकर्तिका होती है।
2. अंतडी के विकार जैसे कोलायटीस व क्रॉन्स रोग के फलस्वरूप ।
3. गुप्तरोग (वेनरल रोग) के फलस्वरूप ।
प्रकार :- 1. तीव्र – गुदा भाग पर छोटा सा व्रण (घाव) जिसमें तीव्र वेदना होती है।
2. जीर्ण – इसमें व्रण के किनारे मोटे हो जाते हैं। फिशर की निचली सतह में सूजन होती है, जिससे Sentinel tag जैसी अलग लटकती हुई रचना बन जाती है।
लक्षण :- दर्द, वेदना, पीड़ा, रक्तस्राव, स्राव व खुजली, सूजन, मूत्र संबंधी कष्ट ।
1. वेदना – परिकर्तिका की पीडा असहनीय होती है। मलत्याग के समय तीव्र वेदना की शुरुआत होती है, जो एक-डेढ़ घंटे तक रहती है। दर्द के कारण रोगी मलत्याग को टालता रहता है।
2. रक्तस्राव कुछ बूंदे रक्त की जाती हैं, जो मल से चिपकी रहती है। कभी-कभी रक्तप्रवृत्ति ज्यादा होने से रोगी एनिमिया से ग्रस्त हो जाता है। अधिक स्राव के कारण खुजली होती है।
3. सूजन – Sentinel tag के कारण रुग्ण गुदभाग में सूजन तथा अर्श होने की शिकायत करता है।
4. मूत्र संबंधी कष्ट – मूत्र में जलन या रुक-रुक कर मूत्र प्रवृत्ति या अधिक मूत्र प्रवृत्ति की शिकायत होती है।
परिकर्तिका के उपद्रव (Complications)
1. फोड़ा 2. फिश्चुला 3. पैपिला वृद्धि 4. सेन्टीनल टैग 5. गुद संकोच। कई रुग्णों में अर्श व परिकर्तिका साथ में होते हैं।
चिकित्सा :- 1. कब्ज को दूर करने की चिकित्सा के अंतर्गत जैतून तेल का एनिमा लाभकारी है। इससे कब्ज दूर होकर फिशर का व्रण खुद ही भर जाता है।
2. स्थानिक संज्ञानाशक औषधि का प्रयोग अवश्य करें ताकि तात्कालिक लाभ हो। मलत्याग से पहले यह औषधि लगा लेने से फिशर के समय होने वाले दर्द से बचा जा सकता है। मलत्याग के पश्चात भी इसका प्रयोग किया जाता है।
3. गुद भाग के संकोच को दूर करने के लिए डायलेटर (विस्फारण यंत्र) का प्रयोग वर्णित है।
4. स्थानिक संज्ञानाशक इंजेक्शन का प्रयोग करें, ताकि लंबे समय तक असर रहे। परिकर्तिका की मुख्य चिकित्सा स्थानिक संज्ञानाशक द्रव्य का प्रयोग है। इससे रोगी को दर्द से कुछ समय के लिए तो आराम मिलता है. परंतु अधिक काल तक उपयोग करने से घाव नहीं भरता और धीरे-धीरे दर्दनाशक गुण भी कम होता जाता है। वेदनाशामक (दर्द को शांत करने वाला), शोथनाशक (सूजन को नष्ट करने वाला) व Corticosteroid के प्रयोग से कुछ समय तक लाभ प्राप्त होता है, परंतु व्रण के रोपण में विलंब होता है।
सर्जन इस व्याधि को भिन्न-भिन्न तरीकों से दूर करने की कोशिश में है। इस व्याधि में जो पीडा होती है. यह वलियों के संकोच से होती है। अतः इन नलियों के संकुचन को दूर करना ही इसकी मुख्य चिकित्सा है। इस उद्देश्य से सर्जन ने भिन्न-भिन्न शल्य-कर्म कहे हैं। इनसे पीड़ा की तीव्रात्मक स्थिति कम होती है, परंतु इनसे भी संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं। इन सर्जरी के उपद्रवस्वरूप गुद भाग से थोड़ा-थोडा मल निकलता रहता है। यह अनियंत्रण (Incontinence) व गुदभ्रंश (Rectal Prolapse) की स्थिति होती है।
कुछ शल्य चिकित्सकों ने संपूर्ण परिकर्तिका मूल को निर्हरित करने को कहा है। उसके पश्चात टांके लगाने का निर्देश दिया है। परंतु इससे हीलिंग असंभव है क्योंकि घाव पुनः पुनः दूषित होता है व गुदद्वार का मलत्याग के लिए प्रसार होता है।
परिकर्तिका के उपद्रव (Complications)
1. फोड़ा 2. फिश्चुला 3. पैपिला वृद्धि 4. सेन्टीनल टैग 5. गुद संकोच। कई रुग्णों में अर्श व परिकर्तिका साथ में होते हैं।
चिकित्सा :- 1. कब्ज को दूर करने की चिकित्सा के अंतर्गत जैतून तेल का एनिमा लाभकारी है। इससे कब्ज दूर होकर फिशर का व्रण खुद ही भर जाता है।
2. स्थानिक संज्ञानाशक औषधि का प्रयोग अवश्य करें ताकि तात्कालिक लाभ हो। मलत्याग से पहले यह औषधि लगा लेने से फिशर के समय होने वाले दर्द से बचा जा सकता है। मलत्याग के पश्चात भी इसका प्रयोग किया जाता है।
3. गुद भाग के संकोच को दूर करने के लिए डायलेटर (विस्फारण यंत्र) का प्रयोग वर्णित है।
4. स्थानिक संज्ञानाशक इंजेक्शन का प्रयोग करें, ताकि लंबे समय तक असर रहे। परिकर्तिका की मुख्य चिकित्सा स्थानिक संज्ञानाशक द्रव्य का प्रयोग है। इससे रोगी को दर्द से कुछ समय के लिए तो आराम मिलता है. परंतु अधिक काल तक उपयोग करने से घाव नहीं भरता और धीरे-धीरे दर्दनाशक गुण भी कम होता जाता है। वेदनाशामक (दर्द को शांत करने वाला), शोथनाशक (सूजन को नष्ट करने वाला) व Corticosteroid के प्रयोग से कुछ समय तक लाभ प्राप्त होता है, परंतु व्रण के रोपण में विलंब होता है।
सर्जन इस व्याधि को भिन्न-भिन्न तरीकों से दूर करने की कोशिश में है। इस व्याधि में जो पीडा होती है. यह वलियों के संकोच से होती है। अतः इन नलियों के संकुचन को दूर करना ही इसकी मुख्य चिकित्सा है। इस उद्देश्य से सर्जन ने भिन्न-भिन्न शल्य-कर्म कहे हैं। इनसे पीड़ा की तीव्रात्मक स्थिति कम होती है, परंतु इनसे भी संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं। इन सर्जरी के उपद्रवस्वरूप गुद भाग से थोड़ा-थोडा मल निकलता रहता है। यह अनियंत्रण (Incontinence) व गुदभ्रंश (Rectal Prolapse) की स्थिति होती है।
कुछ शल्य चिकित्सकों ने संपूर्ण परिकर्तिका मूल को निर्हरित करने को कहा है। उसके पश्चात टांके लगाने का निर्देश दिया है। परंतु इससे हीलिंग असंभव है क्योंकि घाव पुनः पुनः दूषित होता है व गुदद्वार का मलत्याग के लिए प्रसार होता है।
शल्य क्रिया (ऑपरेशन)
Stretching or divulsion of anal sphincter
Excision of anal fissure
Internal sphincterotomy
(Divulsion of internal sphincters)
इस प्रकार आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में परिकर्तिका की कोई स्थायी चिकित्सा नहीं है। केवल वेदनाहर, कार्टिकोस्टेराइड्स, संज्ञानाशक, एंटीबायोटिक से युक्त स्थानिक मलहमों का प्रयोग किया जाता है। मलहम से भी परिकर्तिका के रुग्ण को पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं होता है। गुदप्रदेश की मांसपेशियों का अत्यधिक संकोच होने से परिकर्तिका के व्रण का शोधन रोपण नहीं होता। आधुनिक शास्त्र के ऑपरेशन द्वारा भी रुग्ण को पूर्ण लाभ नहीं मिलता।
अतः लेखक द्वारा निर्गुण्ड्यादि मलहर का चिकित्सकीय प्रायोगिक अध्ययन किया गया। इस हेतु 50 रुग्णों का चयन कर 2 वर्ग बनाए गए। पहले वर्ग को निर्गुण्ड्यादि मलहर तथा दूसरे वर्ग को नियमित 5 ml अर्शाघ्न तेल की मात्रा बस्ति दी गई। दोनों वर्गों को पंचसकार चूर्ण 5 gm रात को सोने के समय लेने व गर्म पानी में अवगाह स्वेद (Tub Bath) लेने के लिए कहा गया। आहार-विहार संबंधी निर्देश सभी रुग्णों को दिए गए।
निर्गुण्डयादि मलहर का प्रयोग करने वाले वर्ग में आश्चर्यजनक परिणाम पाए गए।
निष्कर्ष
1. यह व्याधि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक पाई जाती है स्त्रियां लज्जावश पुरुषों की अपेक्षा अधिक वेग धारण करती है। इसमें पुरुषों का प्रमाण 42% व स्त्रियों का प्रमाण 50%
2. परिकर्तिका से ग्रस्त रुग्ण 20 से 30 वर्ष के 38 व 30 से 40 वर्ष के वर्ग में 32 रहे। अतः मध्य वय में इस व्याधि का प्रादुर्भाव अधिक होता है।
3. वातिक परिकर्तिका 52%, पैत्तिक 36%, कफज प्रकार के 12% रुग्ण प्राप्त हुए। अतः वातिक का प्रमाण अधिक रहा।
4. सक्रिय कार्य करने वालों का अनुपात 20% व बैठक कार्य करने वालों का अनुपात 80% रहा। अतः बैठक कार्य करने वालों में यह व्याधि अधिक पाई गई।
5. आहार के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि जो रुग्ण मिर्च-मसालों का सेवन, अनियमित भोजन तथा मांसाहार का सेवन अधिक करते हैं। उन्हें यह व्याधि होने की संभावना अधिक होती है।
6. परिकर्तिका स्थिति का O’clock position अध्ययन करने पर सबसे अधिक रुग्ण 6 O’clock position (60%) में जबकि 12 O’clock position में 20% रोगी मिले।
7. परिकर्तिका के उपद्रवस्वरूप 40% रुग्ण सेन्टीनल, 4% भगंदर, 10% अर्श, 4% विद्रधि व 2% रुग्ण अन्य संक्रमण के पाए गए।
8. वेदनानुसार वर्गीकरण : 52% रुग्णों में काटने जैसी पीड़ा 36% रुग्णों में जलनयुक्त व 12% में खुजली जैसी पीड़ा थी।
9. संबंधित व्याधि वर्गीकरण : 80% रुग्ण मलबद्धता से ग्रस्त थे, जबकि प्रवाहिका से 14%, अतिसार से 4% व 2% रुग्ण ज्या से ग्रस्त थे।
10. वेदना व स्थानानुसार वर्गीकरण : 48% रुग्णों में अल्प व अन्य 48% में मध्यम प्रकार की वेदना थी। 4% रुग्ण तीव्र वेदना के पाए गए।
11. रक्तस्राव अवस्थानुसार : अल्परक्तस्राव के रुग्ण 44%, मध्यम रक्तस्राव के रुग्ण 48% व तीव्र रक्तस्राव का एक भी रुग्ण नहीं मिला। 8% रुग्णों में रक्तस्राव नहीं पाया गया।
12. वली संकोचन अवस्थानुसार : अल्प वली संकोचन अवस्था के 44% रुग्णों को 4 थें दिन, मध्यम वली संकोचन के 48% रुग्णों को तीसरे दिन तीव्र वली संकोचन के 8% रुग्णों को तीसरे दिन उपशय मिला।
13. चिकित्सा पश्चात वेदना अवस्थानुसार रुग्णों को निर्गुण्ड्यादि मलहर का बाह्य प्रयोग करने पर अल्प व मध्यम वेदना के 12-12 रोगियों को 4 थे दिन लाभ हुआ। तीव्र वेदना से ग्रस्त 1 रुग्ण को दूसरे ही दिन 3 उपशय मिला।
14. रक्तस्राव अवस्थानुसार वर्गीकरण : — अल्प रक्तस्राव के 11 रुग्णों को तीसरे दिन व मध्यम रक्तस्राव के 12 रुग्णों का रक्तस्राव 4थे दिन बंद हो गया।
— दूसरे वर्ग में रक्तस्राव 5वें दिन के बाद बंद हुआ।
15. व्रणरोपण वर्गीकरण : प्रथम सप्ताह में 56% रुग्णों का व्रणरोपण, दूसरे सप्ताह में 36%, तीसरे सप्ताह में 8% रुग्णों का व्रणरोपण हुआ। द्वितीय वर्ग में व्रणरोपण देर से हुआ।
आयुर्वेद संहिताओं में परिकर्तिका को व्याधि न होकर बस्ति, अतिसार, विरेचन आदि का व्यापाद माना गया है। इसकी चिकित्सा भी वात-पित्तनाशक औषधियों से स्थानिक प्रयोग द्वारा बताई गई है। सुश्रुत, चरक, वाग्भट एवं अन्य ग्रंथकारों ने परिकर्तिका की चिकित्सा पिच्छा बस्ति बताई है।
निर्गुण्ड्यादि मलहर में प्रयुक्त रसांजन, खदिर, निर्गुण्डी व कर्पूर इन औषधियों का वर्णन निघण्टुओं व चरक, सुश्रुत ने वातपित्त शामक के रूप में अनेक स्थानों पर किया है। रसांजन को ग्रंथकारों ने बहुत ही अच्छा प्रभावकारी व्रणरोपक माना है।
उपरोक्त औषधियों का उपयोग मलहर रूप में दोषों के सिद्धातों पर किया गया।
उपरोक्त वनौषधियों व तिल तैल से निर्मित निर्गुण्डयादि मलहर के फिशर पर उत्तम परिणाम पाए गए। इसमें से निर्गुण्डी वातशामक व वेदनाशामक का कार्य करता है। रसांजन एंटीबायोटिक म्यूकस मेमब्रेन तथा सबक्यूटेनियस टिशु पर अल्पसंज्ञानाश का कार्य करता है। खदिर का कार्य रक्तस्राव को रोकना व घाव में शीतलता प्रदान करता है। कर्पूर का प्रयोग अल्पवेदनाशामक, रक्तस्राव को रोकना जीवाणुरोधक है। तिल तेल का प्रयोग वातशामक गुण के कारण वेदना को कम करता है।
अतः निर्गुण्ड्यादि मलहर इस व्याधि का उचित एवं सस्ता चिकित्सा साधन है। इसके द्वारा रोगी स्वयं चिकित्सा कर सकता है। यह औषधि परिकर्तिका पर फलदायी सिद्ध हुई है। साथ ही अर्श और भगंदर पर भी इसके उत्तम परिणाम मिलते है।

डॉ. जी. एम. ममतानी
एम. डी. (आयुर्वेद पंचकर्म विक्षेषज्ञ)
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग, जरीपटका, नागपुर