स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन-मस्तिष्क होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार पेट के रोगों का मानसिक कनेक्शन भी हो सकता है। हमारी आंतों का सीधा ताल्लुक दिमाग से होता है। वेगस तंत्रिका के जरिए दिमाग, आंतों के काम-काज पर कंट्रोल रखता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इसके जरिए अगर दिमाग कोई संदेश आंतों को दे सकता है, तो आंतों के हालात का असर इससे होते हुए दिमाग तक भी पहुंचता है। यदि कोई व्यक्ति मानसिक विकार से ग्रसित है तो उसे पेट दर्द, उदास रहना, बार-बार मूड खराब होना आदि लक्षण महसूस हो सकते हैं। आमतौर पर बार-बार पेट दर्द होने का संबंध एसिडिटी या अपच से होता है लेकिन अगर आपको चिंता या परेशान होने पर सिर्फ पेट में ऐंठन महसूस होती है तो ये खराब मानसिक स्वास्थ्य का संकेत हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार पेट और मन या मस्तिष्क का आपस में बहुत अधिक गहरा संबंध है। तनाव, चिंता, बेचैनी और तंत्रिका तंत्र सभी का शरीर पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसमें पाचन तंत्र भी शामिल है। जब भी आप चिंता या तनाव में होते हैं तो मस्तिष्क पेट को धीमी गति से कार्य करने के संकेत भेजता है जिससे आपका पाचन धीमा पड़ जाता है। मन बीमार होने पर पेट में कई तरह के विकार हो सकते हैं। तनाव और चिंता की वजह से भूख में बदलाव, पेट भरा होने का अहसास, पेट में दर्द, सूजन, कब्ज, दस्त, गैस, एसिडिटी, मितली या डकार, पेप्टिक अल्सर, आई.बी.एस.या इरिटेबिल बावेल सिन्ड्रोम जैसी समस्याएं हो सकती हैं। तनाव के कारण जठरांत्र प्रणाली का संतुलन बिगड़ जाता है, आंत के अंदर की गतिविधियां कम हो जाती हैं जो बाद में अन्य विकारों को जन्म दे सकती हैं। तनाव की वजह से पेट अधिक अम्लीय हो जाता है।

उपचार – किसी भी बीमारी या विकार के इलाज में सबसे पहले उसे स्वीकार करना जरूरी होता है। अपने परिवार के सदस्यों या दोस्तों में मानसिक विकारों के लक्षणों एवं संकेतों को पहचान कर इससे बाहर निकलने में उनकी मदद करनी चाहिए। इस बारे में बात करने में शर्म या हिचक महसूस न करें। डिप्रेशन, तनाव और चिंता जैसी स्थितियों को दवाओं और थेरेपी की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है। खुद को किसी भी गलती या परेशानी के लिए जिम्मेदार मानकर दुखी रहने की जरूरत नहीं है। अपने परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करें या जरूरत पडने पर मनोचिकित्सक से सलाह लें।

पेट की समस्याओं से निजात पाने के लिए नियमित व्यायाम और ध्यान करना चाहिए । जिन लोगों के पेट में कोई न कोई परेशानी या विकार रहते है, उनका इलाज होने पर उनके मस्तिष्क को भी राहत मिलती है। मन-मस्तिष्क को सही रखने के लिए खान-पान बेहतर करना चाहिए।

अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, जटामांसी, वचा, तगर, सर्पगंधा, गोक्षुर, पिप्पलीमूल आदि औषधियों का सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श अनुसार करने पर मानसिक बीमारियों में लाभ होता है जिससे पाचन तंत्र मजबूत होकर पेट सम्बंधित विकारों में लाभ होता है। अश्वगंधा से हैप्पी हार्मोन सेरोटोनिन रिलीज होता है, जिससे तनाव कम करने में मदद मिलती है और व्यक्ति अच्छा महसूस करता है। तनाव दूर करने के लिए वज्रासन, उष्ट्रासन, वीरासन, बालासन, त्रिकोणासन और अनुलोम-विलोम प्राणायाम किए जा सकते हैं।

Writer Suresh Kumar

डॉ. सुरेश कुमार
M.D.(Ay.),P.G.D.N.Y.Sc. 
प्रभारी चिकित्साधिकारी 
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय एवं योग 
वेलनेस सेन्टर, तेलीबाग, लखनऊ (उ.प्र.)

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