प्रकृति के नियम व्यक्तिगत अनुकूलताओं के आधार पर नहीं बदलते । हमारी जीवन पद्धति के अनुरूप सूर्योदय और सूर्यास्त का समय निश्चित नहीं होता । बुध्दिमान वही है, जो प्रकृति के अनुरूप अपने आपको ढाल लेता है । परंतु आज हमारे दिल और दिमाग में यह बाते नहीं बैठ पा रही हैं । हमारे Lunch और Dinner रोगों के मंच बनते जा रहे हैं । स्वास्थ्य मंत्रालय के पूर्वाग्रह छोड़ इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए तथा भोजन के उपयुक्त सर्वोत्तम समय की जानकारी जनसाधारण तक पहुंचानी चाहिए ।

जीवन के लिये भोजन जितना आवश्यक है, उससे भी अधिक जरूरी है उसका पाचन। अतः हमें उन सब कारणों से बचना चाहिये, जो भोजन का पाचन करने में बाधक हैं। प्रकृति में एक निश्चित नियमानुसार दिन-रात होते हैं। व्यक्ति की दिनचर्या और रात्रिचर्या का अलग-अलग विधान है। शरीर के अलग-अलग अंग और अवयव भी उसी के अनुसार अधिक सक्रिय और कम सक्रिय होते हैं। अतः भोजन कैसे किया जाए ? कहां किया जाए ? कब किया जाए ? इन बातों की जानकारी भी आवश्यक है ताकि जो भोजन हम करते हैं, उसका अधिकाधिक लाभ मिल सके। इन तथ्यों की उपेक्षा से अच्छे से अच्छा पौष्टिक भोजन भी लाभ पहुंचाने के स्थान पर हानिकारक बन जाता है।

जीवन के लिए हवा एवं पानी के बाद भोजन सबसे आवश्यक तत्व है। भोजन से शरीर के विकास तथा संचालन हेतु आवश्यक ऊर्जा मिलती है। अतः यह आवश्यक है कि भोजन करते समय इन उद्देश्यों की पूर्ति का विशेष ख्याल रखा जाए। यदि इन बातों का ध्यान न रखा जाए तो भोजन स्वास्थ्य भक्षक बन जाता है। भोजन कैसा हो ? उसमें कौन-कौन से पौष्टिक तत्व कितनी मात्रा में होने चाहिए? इन बातों के संबंध में चिकित्सक और आज का पढ़ा-लिखा मानव अवश्य ज्ञान रखता है और जनसाधारण के लिए विपुल साहित्य भी उपलब्ध है।

कब ग्रहण करें आहार ?

जब हमें अच्छी भूख लगे, तब ही भोजन करना चाहिए। भूख का संबंध हमारी आदत पर निर्भर होता है। जैसी हम आदत डालते हैं, उस समय हमें भूख लगने लगती है। जब आमाशय-पैंक्रियाज अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय हों तब हमें भूख लगती है और जब प्राण ऊर्जा का प्रकृति से प्रवाह उन अंगों में कम हो तो भूख नहीं लगती। प्रातःकाल सूर्योदय के लगभग 1 घंटे पश्चात् से 2 घंटे तक आमाशय एवं उसके लगभग 2 घंटे पश्चात् आमाशय का सहयोगी पूरक अंग तिल्ली, पैंक्रियाज प्रकृति से प्राण ऊर्जा मिलने से अधिक सक्रिय होता है। मुख्य भोजन का सबसे श्रेष्ठ समय यही होना चाहिए। इसी प्रकार सूर्यास्त के लगभग 2 घंटे पूर्व तक आमाशय और उसके 2 घंटे पश्चात् तिल्ली, पैंक्रियाज प्रकृति से निम्नतम प्राण ऊर्जा का प्रवाह होने से पूर्ण रूप से सक्रिय नहीं होती। उस समय किए गए भोजन का पाचन सरलता से नहीं होता । अतः उस समय भोजन नहीं करना चाहिए।

एक प्रचलित कहावत है –
सुबह का भोजन खुद खाओ ।
दोपहर का दूसरों को खिलाओ।।
रात्रि भोजन के दुष्प्रभावों को समझने के कारण आज अमेरिकी व्यक्ति रात्रि भोजन को पसंद नहीं करते। वे सूर्यास्त से पहले भोजन करने लगे हैं तो हमारे लिए ऐसा करना क्यों संभव नहीं है?

शरीर पर सूर्यप्रकाश का प्रभाव

सूर्य की रोशनी से रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। इसी कारण प्रायः अधिकांश रोगों का प्रकोप रात में बढ़ने लगता है। प्रत्येक बीमारी भी अपेक्षाकृत रात में ज्यादा कष्टदायक होती है। इसका मुख्य कारण रात में सूर्य की नभीं का अभाव होता है। मच्छर रात्रि में ही क्यों अक्सर अधिक काटते हैं? क्या कभी हमने चिंतन किया है कि सूर्यास्त होने के पश्चात् शरीर की प्रतिरोधक शक्ति क्यों कम हो जाती है?

हमारे शरीर में सारे ऊर्जा चक्र, जिन्हें कमल की उपमा दी गई है, सूर्योदय के साथ सक्रिय होते हैं और सूर्यास्त के पश्चात् निष्क्रिय होने लगते हैं। अतः रात्रि में भोजन का पाचन कठिनाई से होता है। आयुर्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि पहला मुख्य भोजन सूर्योदय से एक प्रहर बाद ही किया जाना चाहिए और दूसरा भोजन यदि आवश्यक हो तो सूर्यास्त के कम से कम । घंटा पूर्व करें। उनका निष्कर्ष है कि दिन के क्षय के अनुपात में वायु और पित्त बढ़ जाते हैं। चरक संहिता के अनुसार रात्रि भोजन दूषित, तामसिक और अम्लीभूत होकर शरीर को भारी क्षति पहुंचाता है।

कीटाणुओं का प्रकोप

सूर्यास्त के पश्चात् बहुत से सूक्ष्म जीव पैदा हो जाते हैं। सूर्य का प्रकाश इन कीटाणुओं को पैदा होने से रोकता है। सूर्य के ताप में अनेक विषैले कीटाणु निष्क्रिय बन जाते हैं, जो सूर्यास्त के बाद पुनः सक्रिय होने लगते हैं। प्रायः हम अनुभव करते हैं कि दिन में 1000 वाट के बल्ब के पास भी सूक्ष्म जीव नहीं आते, जबकि रात में थोड़ी-सी रोशनी में बल्ब के आसपास मच्छर मंडराने लगते हैं। ये जीव आहार की गंध के कारण भोज्य पदार्थों की तरफ आकर्षित होते हैं। वहीं दूसरी तरफ भोजन में भी अनेक सूक्ष्म बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं। इनका रंग भोजन के रंग जैसा होने से कृत्रिम प्रकाश में हम इन्हें प्रायः देख नहीं पाते हैं। कृत्रिम प्रकाश में उजाला तो है, परंतु वह सूर्य की रोशनी की बराबरी नहीं कर सकता। पूर्ण शाकाहारियों के लिए रात्रि भोजन निश्चित रूप से त्याज्य होता है। रात्रि में तमस (अंधेरे) के कारण वैसे भी भोजन तामसिक बन जाता है। रात्रि भोजन से स्मरण शक्ति कमजोर होने लगती है और व्यक्ति अपनी क्षमताओं को पूर्णरूपेण विकसित नहीं कर पाता। बिजली की रोशनी से अंधेरे के कीटाणु तो हमारे भोजन के नजदीक आते ही है. परंतु साथ में प्रकाश के कीटाणु जो और नए उत्पन्न होते हैं. भोजन में सम्मिलित हो जाते हैं। यह स्वास्थ्य बिगाडने में सहायक होते हैं।

स्वयं को प्रकृति के अनुरूप ढालें

कहने का आशय यह है कि प्रकृति के नियम व्यक्तिगत अनुकूलताओं के आधार पर नहीं बदलते। हमारी जीवन पद्धति के अनुरूप सूर्योदय और सूर्यास्त का समय निश्चित नहीं होता। बुद्धिमान वही है, जो प्रकृति के अनुरूप अपने आपको डाल लेता है। परंतु आज हमारे दिल और दिमाग में यह बाते नहीं बैठ पा रही हैं। हमारे Lunch और Dinner रोगों के मंच बनते जा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय को पूर्वाग्रह छोड़ इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए तथा भोजन के उपयुक्त सर्वोत्तम समय की जानकारी जनसाधारण तक पहुंचानी चाहिए। सारी सामाजिक एवं सरकारी व्यवस्थाओं को उसके अनुरूप बदलने की पहल करनी चाहिए। यदि उचित समय पर भोजन न किया जाए, तो हमें अपनी पाचन क्रिया को अच्छा रखने के लिए बाह्य साधनों का उपयोग करना पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि रात्रि भोजन आरोग्य के साथ वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं पारिवारिक दृष्टिकोण से अनुपयोगी, हानिकारक और प्रकृति के विरुद्ध है. अतः स्वास्थ्य प्रेमियों के लिए त्याज्य है। उन्हें यथासंभव दिन में सूर्यास्त के पूर्व ही भोजन करने का प्रयास करना चाहिए। 

डॉ. चंचलमल चोरडिया
जोधपुर

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