आयुर्वेद में जिव्हा की ज्ञानेंद्रिय के अंतर्गत गणना की गई है। जिव्हा का कार्य है – स्वाद की अनुभूति करना व बोलना। इसी जीभ पर यदि छाले हो जाएं, तो व्यक्ति विभिन्न पकवानों का स्वाद नहीं ले सकता। साथ ही बोलने में भी तकलीफ होती है। यह इतने कष्टदायी होते हैं कि पीड़ित व्यक्ति बेचैन होकर छटपटाने और कभी – कभी तो रोने तक लगता है। 

छालों को आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र में मुखपाक या सर्वत्सर की संज्ञा दी गई है व आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में स्टोमेटाइटिस (Stomatitis) कहा गया है। छोटा-सा छाला तक रुग्ण को बहुत विचलित कर देता है। छालों का उदर रोग के अंतर्गत समावेश होता है। असमय भोजन का सेवन, भोजन के पश्चात मुख, जीभ, दांतों को स्वच्छ न करना, ठीक तरह से ब्रश न करना, मसूड़ों के विकार, अम्लपित्त, दांतों के रोग, अधिक तेज, मिर्च मसाले व तले हुए, अति रुक्ष, उष्ण पदार्थों का सेवन, अपचन के कारण मुंह में छाले हो सकते हैं। इसके अलावा तंबाकू, पान, सुपारी, गुटखा खाना, गुटखे व तंबाकू को मुख में अधिक समय तक धारण करना, हमेशा होंठों को चबाते रहने की गलत आदत्त, चाय-कॉफी का अधिक सेवन, तीव्र औषधियों का प्रयोग, जागरण इत्यादि के कारण मुंह में छाले आते रहते हैं। मुंह में छालों का प्रमुख कारण है कब्ज। अत्तः पेट (आमाशय एवं आंतों) में सूजन, कब्ज या अपच होने पर मुंह में छाले होना आम बात है। पेट की गर्मी भी छालों का मुख्य कारण मानी जाती है। विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स की कमी से भी मुंह में छाले हो जाते हैं। 

प्रकार 

आयुर्वेदानुसार मुखपाक के 4 प्रकार वातज, पित्तज कफज व रक्तज होते हैं। यह पित्त दोष के कारण होने वाला विकार है, पित्त के साथ रक्तदुष्टि भी होती है।

  1. वातज मुखपाक छालों में तीव्र वेदना, होंठ फटते हैं। जिव्हा पर चीरे उत्पन्न होकर अंकुर आते हैं। 
  2. पित्तज मुखपाक पित्तज छालों में जलने सी वेदना, जले हुए छोटे आकार के लाल व्रण होते हैं। छालों का बाह्य स्तर लाल होता है। मुंह में खट्टा स्वाद आता है। 
  3. कफज मुखपाक इसमें रोगी को लार अधिक आती है व छालों में खुजली होती है। 
  4. रक्तज मुखपाक इसमें मुख के साथ-साथ शरीर के अन्य भाग में भी पीटिका निर्माण होती है। 

लक्षण 

मुंह में छाले होने पर दर्द के साथ जलन होती है। कई बार छालों से रक्त निकलता है। भोजन करने व बोलने में तकलीफ होती है। जीभ के अलावा अंदर के होंठ, मसूड़े, गाल के अंदर, तालु भाग पर भी छाले हो जाते हैं। कई रुग्णों को मुंह के छाले अल्पकाल तक रहते हैं, तो कई को यह तकलीफ लंबे समय तक चलती रहती है। लंबे समय तक मुंह के छाले ठीक न होने से कैंसर होने की संभावना हो सकती है। ऐसी स्थिति होने पर शीघ्र ही आवश्यक जांच कर रोग निदान करना चाहिए। 

चिकित्सा

मुखरोग की सामान्य चिकित्सा : त्रिफला, चिरायता, चित्रक, मुलेठी, सरसों, त्रिकटु, मुस्ता, हल्दी, दारुहल्दी, यवक्षार, वृक्षाम्ल, अम्लवेतस, पीपल, जामुन, आम और अर्जुन की छाल, अहिमार (विट्खैर) की छाल, खैर का सार इनका क्वाथ करके, इसे पकाकर तथा गाढ़ा बनाकर इसमें इसका चूर्ण मिलाकर गोलियां बना लें। इन गोलियों को नित्य प्रति मुख में धारण करने से कंठ, ओष्ठ, तालु आदि के अतिकष्टसाध्य रोग नष्ट होते हैं। विशेषकर यह रोहिणी, मुखशोष को नष्ट करता है। 
इसके अलावा शास्त्रों में अनेक नुस्खे बताए गए हैं। इनमें से सुविधानुसार 1-2 ही अपनाएं –

खदिरादि गुटिका यह गुटिका मुख में धारण करने पर जिव्हा, ओष्ठ, मुख, गला तथा तालु में उत्पन्न सभी रोगों को नष्ट करती है। खदिर से बनाई गई इन गोलियों को स्वस्थ पुरुष भी प्रयोग कर सकता है। इससे व्यक्ति मजबूत दांतों वाला होता है। 

कालकचूर्ण – घर का धुर्वासा, रसांजन, पाठा, त्रिकटु, यवक्षार, चित्रक, लोहभस्म, त्रिफला. तेजबल इनका चूर्ण मधु के साथ मुखविकार, दांत और गले के विकार में धारण करना चाहिए। 
पीतक चूर्ण – दारुहल्दी की छाल, सैंधव, मैनशिल, यवक्षार, हरताल इनसे सिद्ध इस पीतक चूर्ण को मधु और घी के साथ दांत. मुख तथा गले के रोग में धारण करना चाहिए। 
हरीतकी सेवन – हरड़ों को गोमूत्र में पकाकर जब ये गल जाएं (इनका शरीर नष्ट हो जाए) तब नेत्रबाला, सौंफ और कूठ से भावित करके खाने वाले को मुखरोग नहीं होतें। 
जीरकादि योग – कालाजीरा, कूठ, इंद्रयव तथा वच को 3 दिन तक नित्य प्रति चबाने से मुखपाक, व्रण, क्लेद तथा मुख दुर्गंध का नाश होता है। 
मुखपाक में जातिपत्रादि गण्डूष – चमेलीपत्र, गुडुची, मुनक्का, यवासा, दारुहल्दी तथा फलत्रिक (हरें, बहेड़ा व आंवला) समभाग के क्वाथ में मधु मिलाकर गण्डूष धारण करें। मुखपाक में प्रतिदिन अनेक बार चमेली की पत्ती चबाएं।
पटोलादि मुखघावन योग – परवल, नीम, जामुन, आम, मालती इन सबके पत्ते (समभाग) का काढ़ा मुख धावन के लिए श्रेष्ठ है। अर्थात् इस क्वाथ से मुख धोने पर मुख के रोग शांत हो जाते हैं। 
त्रिफला का क्वाथ शहद मिलाकर मुखधावन के लिए प्रयोग करने से मुखपाक शांत होता है। 
सप्तच्छदादि योग – छतिवन की छाल, परवलपत्र, खस, नागरमोथा, हरड कुटकी, मुलेठी अमलतास का गुदा तथा रक्तचंदन समभाग का क्वाथ बनाकर पान करें। यह मुखपाक को शांत करता है।हरिखा तेल – हल्दी, नीमपत्र, मुलेठी तथा नीलकमल समभाग को पीसकर विधिवत् सिद्ध तेल सेवन करने से मुखपाक दूर होता है। 
यष्टिमध्यादि तेल – मुलेठी (50 ग्राम), नीलकमल (1.5 किलोग्राम), तिलतैल (1 किलो), दूध (2 किलो) तथा जल (4) किलो) इन सबको एकत्र कर विधिवत् तैल सिद्ध करें। इस तेल की रात्रि में नस्य लेने से मुखपाक तथा मुख के अनेक रोग समूह नष्ट होते हैं। 
इरिमेदादि तेल – इसको छालों पर लगाने से लाभ होता है। स्वस्थ व्यक्ति भी नियमित रूप से इरिमेदादि तेल को मुख में धारण करने से मजबूत दांतों वाला बनता है। 

अन्य शास्त्रोक्त उपाय

  • सतवन, खस, पटोल, मुस्ता, हरड, तिक्तरोहिणी (कुटकी). मुलहठी, अमलतास, चंदन इनका क्वाथ पीने से छाले दूर होते हैं। 
  • पटोल, सोंठ, त्रिफला, इंद्रवारुणी, त्रायन्ती, कुटकी, हल्दी, दारुहल्दी, गिलोय इनका क्वाथ मधु के साथ पीने और मुख में धारण करने से मुख के सब रोग नष्ट होते हैं। 
  • दारुहल्दी को पकाकर बनाया गया क्वाथ गाढा होने पर इसमें गेरु और मधु मिलाकर मुख में रखने से मुखपाक व्रण नष्ट होते हैं। 
  • सुहागा को तवे पर फुलाकर तथा पीसकर 1 चुटकी भर को शहद में मिलाकर छालों पर दिन में 2-3 बार लगायें। 
  • बबूल की छाल के काढ़े के कुल्ले से मुंह व जीभ के छाले मिट जाते हैं। नींबू को गरम पानी में निचोड़कर कुल्ले करें। 
  • मुखपाक रोग में शिरावेध कराएं व नस्य दे तथा मधु, गोमूत्र, गोघृत, गोदुग्ध तथा अन्य शीतल पदार्थों का कवल धारण करें। यह मुखपाक को नष्ट करता है। 
  • नीम के पत्ते या अमरूद के पत्ते पानी में उबालकर या मेथी को पानी में उबालकर उसमें 3-4 बूंद लहसुन का रस डालकर कुल्ला करने से भी छालों में आराम आता है। 
  • कटेरी, गिलोय, चमेली के पत्ते, दारुहल्दी, धमासा और त्रिफला के क्वाथ में मधु मिलाकर बनाया गया कवल मुख के सब रोगों को नष्ट करता है। 

कब्जहर उपाय

  • एरंड तेल आधा चम्मच को आधा कप गरम दूध में मिलाकर रात को सोते समय पिए। 
  • कुनकुने पानी में शहद और नींबू का रस मिलाकर लें। 
  • ईसबगोल की भूसी (1 से 2 चम्मच तक) दूध के साथ रात को सोते समय प्रयोग करें। 
  • पंचसकार चूर्ण या हरड़ चूर्ण या त्रिफला चूर्ण का चम्मच रात को सोते समय प्रयोग करें। इससे पेट की गर्मी शांत होकर कब्ज दूर होता है। 

सामान्य चिकित्सा

  • खदिरादि वटी 1-2 गोली दिन में 3-4 बार चूसने को दें। 
  • गुलकंद 1 से 2 चम्मच या आंवले का मुरब्बा 2 नग सुबह-शाम खिलाएं। 
  • कत्था लगा पान सुबह, शाम चबाने से छाले ठीक होते हैं। 

पथ्य-अपथ्य

अधिकांशतः छालों का कारण पेट संबंधी खराबी या विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स की कमी होती है। अतः छाले होने पर तरल आहार जैसे खिचड़ी, दलिया, दूध, दही, छाछ, जूस, सूप का सेवन कर सकते है। इसके अलावा कच्चा सलाद, हरी पत्तीदार सब्जियां, मौसमी फल, अंजीर, मुनक्का, दाख, ककडी, तरबूज, खीरा, पपीता इत्यादि का सेवन करना चाहिए। चोकरसहित आटे की रोटी व अंकुरित दालें खाना भी हितकर होता है। तली भुनी चीजें, तेज मिर्च-मसालेदार पकवान एवं गरिष्ठ आहार का सेवन छालों के रोगी के लिए अहितकर होता है। 

आधुनिक मत

मुखपाक की सूजन व छाले स्टोमेटाइटिस रोग कहलाता है। छाले अल्प व स्थानिक (Mild & Localized) होते हैं। कभी-कभी यह पूरे मुख गुहा में फैले रहते हैं और अत्यंत तकलीफ देने वाले होते हैं। मुंह के छाले स्थानिक संक्रमण, किसी बीमारी, बी काम्प्लेक्स की कमी, किसी रासायनिक विक्षोमकारक द्रव्य एलर्जी से होते हैं। 

सामान्य कारण 

1. बार-बार होने वाले एपथस अल्सर  (Recurrent apthous ulcer) 
2. वायरल संक्रमण के अंतर्गत हर्पेस सिम्प्लेक्स व हर्पेस जोस्टर 
3. अन्य संक्रामक घटक जैसे केन्डीडा अलबिकन्स व बैक्टीरिया 
4. आघात 
5. तंबाकू का सेवन 
6. किमोथेरेपी व रेडिएशन थेरेपी

प्रकार 

1. एपयस स्टोमेटाइटिस (Apthous Stomatitis)
कारण – वायरल, मानसिक, विटामिन की कमी, रोगप्रतिरोधक क्षमता की कमी। 
लक्षण – मुख गुहा की श्लेष्मलकला (Mucous Membrane) में छोटा-सा फफोला होंठ व गाल के भीतर तथा जीभ पर होता है। यह फफोला 24 घंटे में छाला बन जाता है। एक या एक से अधिक छाले होते हैं, जिनमें तीव्र वेदना होती है। साथ में लार भी अधिक गिरती है। इसे कैंकर सोर (Canker Sore) भी कहते हैं। 
चिकित्सा – मुख की स्वच्छता (Hydro Cortisone Pellet is useful), दर्द निवारक औषधि, विटामिन्स व पोषक आहार से तुरंत लाभ मिलता है। 

2. ट्रॉमेटिक स्टोमेटाइटिस (Traumatic Stomatitis) 
कारण – कृत्रिम दांतों को ठीक प्रकार से न बिठाना, नुकीले दांत. ठीक से ब्रश न करना। 
लक्षण – उपरोक्त कारणों से तालु, गला व मसूड़ों में तीव्र पीडायुक्त छाले उत्पन्न होते हैं। इन्हें डेन्चर सोर स्पॉट्स (Denture Sore Spots) भी कहते हैं। 
चिकित्सा – मुख की स्वच्छता, एंटीसेप्टिक गार्गल । 

3. एंगूलर स्टोमेटाइटिस (Angular Stomatitis) इसे विदारयुक्त मुखपाक कहा जा सकता है। 
कारण – राइबाफ्लेवीन विटामिन की कमी व कृत्रिम दांतों को ठीक तरह से फिट न करने पर। 
लक्षण – मुख के दोनों कोनों में चीरे होकर छाले उत्पन्न होते हैं, जिनमें पीड़ा होती है, मुख खोलने में तकलीफ होती है। 
चिकित्सा – राइबोफ्लेविन विटामिन की पूर्ति, जेन्शियन वायलेट सोल्युशन (Gentian Violet Solution) को पानी में मिलाकर छालों पर प्रयोग। 

3. एंगूलर स्टोमेटाइटिस (Angular Stomatitis) इसे विदारयुक्त मुखपाक कहा जा सकता है। 
कारण – राइबाफ्लेवीन विटामिन की कमी व कृत्रिम दांतों को ठीक तरह से फिट न करने पर। 
लक्षण – मुख के दोनों कोनों में चीरे होकर छाले उत्पन्न होते हैं, जिनमें पीड़ा होती है, मुख खोलने में तकलीफ होती है। 
चिकित्सा – राइबोफ्लेविन विटामिन की पूर्ति, जेन्शियन वायलेट सोल्युशन (Gentian Violet Solution) को पानी में मिलाकर छालों पर प्रयोग। 

4. वायरल स्टोमेटाइटिस (Viral Stomatitis) 
कारण – यह छाले वायरल विकार जैसे-प्रतिश्याय, रोमांतिका व हरपेस के फलस्वरूप होता है। 
चिकित्सा – वायरल रोग की चिकित्सा व मुख की स्वच्छता। 

5. फंगस स्टोमेटाइटिस (Fungus Stomatitis) 
कारण – यह छाला मुख्यतः कैन्डिडा अलबीकन्स (Candida Albicans) के कारण होता है। 
लक्षण – इसमें मुख गुहा में श्वेतवर्ण के चट्टे होते हैं। बच्चों में यह चट्टे टॉन्सिल (Tonsil) में भी होते हैं। इसे थश (Thrush), मोनिलिएसिस (Moniliasis), केन्डीडिएसिस (Candidiasis) कहते हैं। 

कैन्डिडा का संक्रमण डायबिटीस (Diabetes) व हायपर एड्रीनेलिज्म (Hyperadrenalism) में भी होता है। 

इसके अलावा श्वेतवर्ण के चट्टे मटेरिया अल्बा (Materia alba) के संक्रमण में भी होते हैं। इसका कारण मुख की अस्वच्छता, खाद्य पदार्थों के अंश व जीवाणु जीभ पर जमा होना है। 

सिफिलिस (Syphilis) संक्रमण में भी जीभ पर सफेद चट्टे मिलते हैं। 

चिकित्सा – जेन्शियन वायलेट सोल्युशन (Gentian Violet Solution) व एंटीफन्गल, एंटीबायोटिक औषधि प्रयोग । 

6. ल्युकोप्लेकिया (Leucoplakia) 
कारण – धूम्रपान, मद्यपान, मिर्च-मसालेदार पदार्थों का सेवन, दांतों का पुराना संक्रमण। यह छाला कैंसर की पूर्व स्थिति में होता है, जिसे प्रीकैंसरस (Precancerous) कहते हैं। 
लक्षण – श्वेतवर्ण के चट्टे योनि मार्ग, गाल के भीतर व मुखगुहा में होते हैं। इसमें कोई तकलीफ नहीं होती है। कभी-कभी इसमें चीरे (Crack) होकर व (घाव) की उत्पत्ति होती हैं। 
चिकित्सा – 1. स्थानिक विक्षोभक घटकों का निवारण । 2. दंत चिकित्सा । 3. धूम्रपान व मद्यपान का त्याग । 4. इस चट्टे का टुकड़ा लेकर बायोप्सी के लिए भेजें ताकि कैंसर का निदान हो सके। 

इस तरह हमने मुखपाक के प्राचीन व आधुनिक दोनों दृष्टिकोण पाठकों के लिए प्रस्तुत किए हैं। यह साधारण-सी दिखने वाली तकलीफ गंभीर रूप भी ले सकती है। अतः योग्य चिकित्सक के मार्गदर्शन में निदान कर चिकित्सा करनी चाहिए। 

Dr Anju Mamtani

डॉ. अंजू ममतानी
'जीकुमार आरोग्यधाम',
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग, जरीपटका, नागपुर

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