हमारा शिकायती स्वभाव हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है और यह स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक है। चूंकि शिकायत पैदा होती है पेट में, जिससे जठराग्नि और पाचन क्रिया अस्तव्यस्त हो जाती है, शिकायतवादियों में अक्सर अल्सर या एसिडिटी पाई जाती है। वे गंभीर और तुनकमिजाज होते हैं।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि दिनभर में हम कई तरह की शिकायतें करते रहते हैं। अपने आप से शिकायत, परिवार से, समाज से या कभी-कभी वातावरण से भी। क्या इस शिकायती व्यवहार का हमारी सेहत पर भी असर हो सकता है? हम अक्सर बीमारी के इलाज में मन को पूरी तरह नकारते हुए चलते हैं, शायद इसलिए कई बार बहुत ही सामान्य-सी दिखने वाली बीमारी भी सालों तक जाने का नाम नहीं लेती। आपने भी ऐसी हजारों शिकायतों को सुना होगा कि 20 साल से कब्जियत है या 10 साल से श्वास लेने में दिक्कत हो रही है। सब नीम हकीम और डॉक्टरों से इलाज कराने पर भी शिकायत दूर नहीं हो रही। सोचिए, कहीं शिकायत की ही आदत स्वयं बीमारी तो नहीं बन गयी?
ओशो कहते हैं ‘हिंदी भाषा में बीमारी को शिकायत कहते हैं, जैसे कब्ज की शिकायत, रक्तचाप की शिकायत इत्यादि ।’ यह बहुत अर्थपूर्ण है। शब्दों की पैदाइश अकारण नहीं होती, उसके पीछे सदियों का अनुभव होता है। जिन लोगों ने बीमारी के लिए शिकायत शब्द का प्रयोग किया होगा, उन्होंने जरूर देखा होगा कि शिकायत एक लाइलाज बीमारी है, जिसकी कोई दवा नहीं कर सकता। इसलिए इसका उपचार उसी व्यक्ति के हाथ में है, जो शिकायत से भरा हुआ है। उसे अपना वैद्य खुद बनना पड़ता है।
हमारा शिकायती स्वभाव हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है और यह स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक है। चूंकि शिकायत पैदा होती है पेट में, जिससे जठराग्नि और पाचन क्रिया अस्तव्यस्त हो जाती है, शिकायतवादियों में अक्सर अल्सर या एसिडिटी पाई जाती है। वे गंभीर और तुनकमिजाज होते हैं। ऐसा ही एक केस मेरे सामने आया। मेरी योग की कक्षा में 21 वर्षीय लड़की ने प्रवेश लिया। शादी को एक साल हुआ है और आए दिन बीमार रहती है। सब तरह के इलाज होते रहते हैं, परंतु फायदा नहीं है। अपना खाना भी सबसे अलग बनाती है। परंतु असली कारण है शिकायत । उसे अपने पूरे ससुराल पक्ष से शिकायत है। उनके रहन-सहन से लेकर उनके व्यवहार तक। सैकडों सलाह-मशविरों के बाद भी उसकी शिकायतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। शायद इसलिए उसकी बीमारी कम नहीं हो रही। ऐसी स्थिति में व्यक्ति इस बात को भी नहीं मानेगा कि वह स्वयं को बदलकर अपना इलाज खुद कर सकता है। ऐसे में क्या किया जाए यदि हम ऐसी स्थिति में नहीं हैं, जहां हम इस बात को समझ सकें और इसके प्रभाव को जीवन में देख सकें। अगर ऐसा हो तो यह अनुभव हमारे शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य में बहुत मददगार होगा।
स्वयं अपना निरीक्षण
इस लेख को लिखने से पहले मैंने कुछ दिन अपने मन का निरीक्षण किया। मैंने देखा कि वास्तव में मन शिकायतें करने के बहाने ढूंढता है। 10 में से 9 मौकों पर यदि शिकायत नहीं की जाए, तो स्थिति-परिस्थिति में कोई अंतर नहीं आता। दूसरा मैंने देखा कि शिकायत नींद से बहुत जुड़ी हुई है। हमें जो लोग पसंद नहीं हैं, हमें उनसे हमेशा शिकायत रहती है। जैसे यदि आपको अपने कार्यस्थल पर लोग पसंद नहीं आ रहे हैं, तो आपको वहां की हर चीज से शिकायत होगी। यदि किसी लडकी को अपनी सास का स्वभाव ठीक नहीं लगता तो उसका मन हमेशा सास की शिकायत से भरा रहेगा और यदि सास प्रेम दिखाए, तब भी स्वीकार भाव पैदा नहीं होगा।
शिकायतों को हम एक हथियार के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं। जैसे किसी को नीचा दिखाने में, आत्म-स्तुति के लिए, वास्तविकताओं से भागने के लिए, मन को तर्क देने के लिए, खुद को सही साबित करने के लिए, जिम्मेदारियों से बचने के लिए, मन को बहलाने के लिए आदि। यदि सूक्ष्म तल पर विचार करें तो अपने भय को ढंकने के लिए, प्रेम से बचने के लिए, समर्पण के डर से, अपने अहंकार की तुष्टि के लिए हम शिकायतों का सहारा लेते हैं। अगर आप भी सिर्फ एक दिन का निरीक्षण करें तो देखेंगे कि दिन भर में आप सैकडों बार शिकायत करते हैं। यदि हम सजगता से देखें तो हमारी सामान्य बातचीत में भी शिकायती लहजा होता है। कई बार हमारा इरादा नहीं भी होता है, परंतु हम अचेतन रूप से ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें शिकायत का भाव होता है।
अब जब एक दिन के निरीक्षण के बाद यह आदत मेरी पकड़ में आ गई, तो मैंने एक पूरा दिन इस बात का ध्यान रखने में बिताया कि मैं दिनभर में कोई शिकायत नहीं करूं। आखिर एक दिन का अभ्यास कोई मुश्किल अभ्यास तो नहीं होना चाहिए, परंतु वास्तव में यह एक मुश्किल अभ्यास है, क्यों? यह सरल-सी बात कठिन प्रतीत हो रही है क्योंकि प्रतिदिन चेतन अचेतन मन से शिकायतों का अभ्यास करते-करते यह एक आदत का स्वरूप ले चुकी है। जब तक हमें इस बात का ख्याल नहीं आता है कि यह एक आदत और हमें इसको छोड़ना है, तब तक इससे छुटकारा पाना उतना ही मुश्किल होता है, जितना कि दूसरी गंभीर आदतों से।
अब जब एक दिन के निरीक्षण के बाद यह आदत मेरी पकड़ में आ गई, तो मैंने एक पूरा दिन इस बात का ध्यान रखने में बिताया कि मैं दिनभर में कोई शिकायत नहीं करूं। आखिर एक दिन का अभ्यास कोई मुश्किल अभ्यास तो नहीं होना चाहिए, परंतु वास्तव में यह एक मुश्किल अभ्यास है, क्यों? यह सरल-सी बात कठिन प्रतीत हो रही है क्योंकि प्रतिदिन चेतन अचेतन मन से शिकायतों का अभ्यास करते-करते यह एक आदत का स्वरूप ले चुकी है। जब तक हमें इस बात का ख्याल नहीं आता है कि यह एक आदत और हमें इसको छोड़ना है, तब तक इससे छुटकारा पाना उतना ही मुश्किल होता है, जितना कि दूसरी गंभीर आदतों से।
ठान लें, देखें परिवर्तन
समझ और सजगता यह 2 साधन हैं, जो इस कठिन अभ्यास को बहुत सरल बना देते हैं। कुछ दिन तक इस अभ्यास को अपने जीवन में उतारने से हम मन की इस आदत को तोड़ सकते हैं। कुछ दिन कैसी भी परिस्थिति आ जाए या कैसा भी अनुभव हमारे जीवन में हो, हम शिकायत नहीं करेंगे, ऐसा मन को समझा लें। भोजन पसंद नहीं आया, किसी की बात नहीं जंची, मौसम आरामदायक नहीं लग रहा है या खुद की दिनचर्या बोरियत भरी लग रही है. शारीरिक कष्टों का रोना, परिजनों से मतभेद, भूतकाल की घटनाओं के प्रति रोष आदि बातों में से कुछ भी प्रदर्शित नहीं करना है। यह भी सोचिए कि कुछ दिन आपके शिकायत न करने से कोई बदलाव होने वाला नहीं। फिर नाहक क्यों? अब हम शिकायत न करने की आदत को और मजबूत बनाकर शिकायत-रहित जीवन का अनुभव करके देखें। तब हमें यह अनुभव होगा कि शिकायतों के बिना मन कितना शांत होता है। हम शिकायतों से किसी तरह का बदलाव अनुभव नहीं कर पाए हैं। परंतु इस अभ्यास से जो परिवर्तन हमारे अंदर होता है, उसका आनंद असीम है। पहली बार पूरे स्वीकार भाव से जीने से हमारे जीवन में जो गुणात्मक बदलाव आता है, वह अनुभव ही हमें आगे के लिए इस आदत में जाने से रोकेगा।

इरा सिंह
उदयपुर (राजस्थान)