हेपेटाइटिस एक गंभीर जिगर संबंधी रोग है, जो मुख्य रूप से वायरल संक्रमण के कारण होता है । यह विभिन्न प्रकारों (हेपेटाइटिस A, B, C, D और E) में वर्गीकृत होता है, जो प्रत्येक अपने अलग कारणों और प्रभावों के लिए जाना जाता है । आधुनिक चिकित्सा में इसके कारण, लक्षण और उपचार को व्यापक रूप से समझा गया है । वहीं आयुर्वेद में इसे “यकृत शोथ” के अतंर्गत परिभाषित किया गया है।

आधुनिक दृष्टिकोण

तीव्र हेपेटाइटिस की शुरुआत में बहुत स्पष्ट लक्षण नहीं दिखायी पडते हैं। लेकिन इंफेक्शियस और क्रोनिक हेपेटाइटिस में ये समस्याएं काफी स्पष्ट तरीके से लक्षण के तौर पर दिखायी पड़ती हैं। 

  • जॉन्डिस या पीलिया 
  • यूरीन का रंग बदलना 
  • बहुत अधिक थकान 
  • उल्टी या जी मिचलाना 
  • पेट दर्द और सूजन 
  • खुजली 
  • भूख ना लगना या कम लगना 
  • अचानक से वजन कम होना

हेपेटाइटिस कारण और प्रकार 

कारण 

1. वायरल संक्रमण – हेपेटाइटिस वायरस – हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई वायरस प्रमुख कारण हैं। इनमें से हेपेटाइटिस बी और सी लंबे समय तक रहने वाले संक्रमण का कारण बन सकते हैं और लीवर सिरोसिस या कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। 
अन्य वायरस – कभी-कभी अन्य वायरस, जैसे एपस्टीन-बार वायरस (Epstein-Barr Virus) या साइटोमेगालोवायरस (Cytomegalovirus) भी लीवर को प्रभावित कर सकते हैं। 
2. ऑटोइम्यून विकार – जब शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से अपने ही लीवर की स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करता है, तो ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस हो सकता है। 
3. अत्यधिक शराब का सेवन – लंबे समय तक अधिक मात्रा में शराब का सेवन लीवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और अल्कोहलिक हेपेटाइटिस का कारण बन सकता है। 
4. दवाइयों और टॉक्सिन्स – कुछ दवाइयां जैसे पेरासिटामोल का अत्यधिक सेवन या लंबे समय तक उपयोग, लीवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। औद्योगिक रसायन या जहरीले पदार्थों (टॉक्सिन्स) के सपंर्क में आना भी लीवर को प्रभावित कर सकता है। 
5. फैटी लीवर (Non Alcoholic Fatty Liver Disease) – मोटापा, डायबिटीज और अस्वास्थ्यकर जीवनशैली के कारण लीवर में वसा जमा हो सकती है, जिससे नॉन-अल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH), का खतरा बढ़ता है। 
6. संक्रमित रक्त और सुइयों का उपयोग – संक्रमित सुइयों का उपयोग जैसे ड्रग्स के इंजेक्शन या असुरक्षित टैटू और पियर्सिंग, हेपेटाइटिस बी और सी वायरस के संक्रमण का कारण बन सकते हैं।
7. असुरक्षित यौन संबंध – हेपेटाइटिस बी और सी वायरस असुरक्षित यौन सबंधों के माध्यम से फैल सकते हैं। 
8. अन्य बीमारियां – जैसे कि हेमोक्रोमाटोसिस (लीवर में अत्यधिक आयरन जमा होना) और विल्सन डिजीज (कॉपर मेटाबोलिज्म में गड़बड़ी)।
लिवर में बैक्टीरियल या फंगल संक्रमण भी हेपेटाइटिस का कारण बन सकता है। 
9. पानी और भोजन के माध्यम से संक्रमण – दूषित पानी और भोजन के सेवन से हेपेटाइटिस ए और ई फैल सकता है, विशेष रूप से जहां स्वच्छता की कमी हो। 
10. जेनेटिक कारक – कुछ मामलों में लीवर से सबंधित बीमारियां परिवार में विरासत के रूप में हो सकती हैं, जिससे हेपेटाइटिस का जोखिम बढ़ जाता है। 
इन सभी कारकों के कारण हेपेटाइटिस हो सकता है। इसे रोकने के लिए स्वच्छता का पालन, सुरक्षित जीवनशैली और नियमित स्वास्थ्य जांच आवश्यक है। हेपेटाइटिस एक वायरल सक्रमण है जो मुख्य रूप से लीवर को प्रभावित करता है।

यह वायरस के पांच प्रमुख प्रकारों में विभाजित है –

हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई। इन सभी प्रकारों ने दुनिया भर में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा की हैं। 

हेपेटाइटिस के प्रकार और उनके कारण-

हेपेटाइटिस ए (HAV) 

  • संक्रमण का कारण – दूषित पानी और भोजन का सेवन । 
  • प्रभाव – विश्व स्वास्थ्य सगंठन (WHO) के अनुसार, हर साल लगभग 1.4 मिलियन लोग हेपेटाइटिस ए से संक्रमित होते हैं। 
  • पैथोलॉजी – यह एक्यूट रूप में होता है, जिसमें यकृत की सूजन और कार्यक्षमता में अस्थायी गिरावट होती है। 
  • लक्षण – बुखार, थकावट, पीलिया। यह आमतौर पर एक्यूट हेपेटाइटिस का कारण बनता है और रोगी धीरे-धीरे ठीक हो जाता है। 

हेपेटाइटिस बी (HBV) 

  • संक्रमण का कारण – संक्रमित रक्त, सीमन, और शरीर के अन्य तरल पदार्थों का संपर्क। यह असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित सुइयों और मां से शिशु में जन्म के समय फैल सकता है।
  • पैथोलॉजी – यह क्रॉनिक और एक्यूट दोनों रूपों में हो सकता है। यह लिवर सिरोसिस और हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा (लिवर कैंसर) का कारण बन सकता है। 
  • लक्षण – भूख में कमी, मतली, पेट में दर्द। 
  • प्रभाव – यह क्रॉनिक हेपेटाइटिस और लीवर सिरोसिस का मुख्य कारण है। 

 हेपेटाइटिस सी (HCV) 

  • संक्रमण का कारण – संक्रमित रक्त और दूषित इंजेक्शन का उपयोग । 
  • पैथोलॉजी – यह सामान्यतः क्रॉनिक संक्रमण का कारण बनता है और लिवर फेलियर का जोखिम बढ़ाता है। 
  • लक्षण – थकावट, जोड़ों का दर्द, रक्तस्राव ।
  • प्रभाव – HCV संक्रमण दुनिया भर में 13-150 मिलियन लोगों को प्रभावित करता है। यह क्रॉनिक हेपेटाइटिस, लीवर कैंसर, और लीवर फेल्योर का प्रमुख कारण है। 

हेपेटाइटिस डी (HDV)

  • संक्रमण का कारण – यह केवल उन्हीं लोगों को संक्रमित करता है जो पहले से हेपेटाइटिस बी (HBV) से संक्रमित होते हैं। 
  • पैथोलॉजी – यह HBV संक्रमण को और अधिक गंभीर बना सकता है। 
  • प्रभाव – HDV और HBV का संयुक्त संक्रमण स्थिति को गंभीर बना देता है और लीवर की गंभीर क्षति का कारण बन सकता है। 

हेपेटाइटिस ई (HEV) 

संक्रमण का कारण – दूषित पानी और भोजन का सेवन ।
प्रभाव – यह संक्रमण ज्यादातर विकासशील देशों में होता है और विषाक्त पानी इसका प्रमुख कारण है। 
पैथोलॉजी – यह एक्यूट संक्रमण का कारण बनता है और गर्भवती महिलाओं के लिए खतरनाक हो सकता है।

गंभीरता के आधार पर हेपेटाइटिस के प्रकार 

एक्यूट हेपेटाइटिस 

  • अचानक लीवर में सूजन होना, जिसमें लक्षण छह महीने तक रहते हैं। 
  • कारण हेपेटाइटिस ए और हेपेटाइटिस ई आमतौर पर एक्यूट हेपेटाइटिस का कारण बनते हैं। 
  • लक्षण थकावट, बुखार, मांसपेशियों में दर्द, पीलिया। 

क्रॉनिक हेपेटाइटिस 

  • जब हेपेटाइटिस संक्रमण छह महीने से अधिक समय तक रहता है। 
  • कारण हेपेटाइटिस बी, सी, डी। यह लीवर सिरोसिस, लीवर कैंसर और इम्यूनसिस्टम की कमजोरी का कारण बन सकता है। 
  • आंकड़े हेपेटाइटिस सी के कारण हर साल लाखों लोग प्रभावित होते हैं। 

हेपेटाइटिस को रोकने के लिए स्वच्छता बनाए रखना, सुरक्षित यौन संबंध बनाना, संक्रमित उपकरणों से बचना और समय पर टीकाकरण कराना आवश्यक है।

हेपेटाइटिस से बचाव के उपाय 

हेपेटाइटिस बी और सी से बचाव के लिए संक्रमण के प्रसार को रोकने और उचित सावधानियां बरतने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा बच्चों और वयस्कों को हेपेटाइटिस बी से बचाने के लिए वैक्सीन दी जा सकती है। 

वैक्सीनेशन सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार, 18 वर्ष की उम्र तक सभी बच्चों और वयस्कों को हेपेटाइटिस बी वैक्सीन की तीन खुराक 6-12 महीनों के अंतराल पर दी जानी चाहिए। यह वैक्सीन शरीर को हेपेटाइटिस बी वायरस से सुरक्षित रखती है।

संक्रमण से बचाव के अन्य उपाय 

  • व्यक्तिगत सामान साझा न करें रेजर, टूथब्रश और सुई जैसे व्यक्तिगत उपयोग की चीजों को दूसरों के साथ साझा करने से बचें क्योंकि इससे संक्रमण का खतरा बढ़ता है। 
  • सुरक्षित टैटू टैटू बनवाते समय केवल स्वच्छ और संक्रमण-रहित उपकरणों का उपयोग सुनिश्चित करें। 
  • कान छिदवाते समय सतर्कता कान छिदवाने के लिए भी साफ और स्टरलाइज्ड उपकरणों का उपयोग करें। 
  • सुरक्षित यौन संबंध सुरक्षित यौन संबंध बनाएं।

इन उपायों को अपनाकर हेपेटाइटिस बी, सी संक्रमण के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 

निदान-निम्न टेस्ट सही निदान हेतु जरूरी हो सकते है –

  • पेट का अल्ट्रासाउन्ड 
  • लीवर फंक्शन टेस्ट 
  • ऑटोइम्यून ब्लड मार्कर टेस्ट 
  • लिवर बायोपसी 

आयुर्वेद में यकृत शोथ का वर्णन 

आयुर्वेद में “यकृत शोथ का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह यकृत (जिगर) में सूजन और दोषों के असंतुलन से संबधित है। यकृत को “पित्ताशय” का स्थान माना गया है और इसके विकारों को मुख्यतः पित्त दोष से जोड़ा गया है। 
 

यकृत शोथ के कारण (एटियोलॉजी)

आयुर्वेद में यकृत को ‘पित्ताधिष्ठित अंग” माना गया है और यकृत विकार मुख्यतः पित्त दोष के असंतुलन के कारण होते हैं। यकृत शोथ को “कामला”, “पांडु” और “अलसक” जैसे विकारों से जोड़ा गया है। 
  • अजीर्ण (पाचन संबंधी समस्या) – अनुचित खानपान और पाचन क्रिया में असंतुलन । 
  • अति मद्यपान (अत्याधिक शराब का सेवन) – यकृत की कार्यक्षर्यमता पर नकारात्मक प्रभाव । 
  • दूषित जल और भोजन – विषाक्त पदार्थों का सेवन । 
  • दोषयवुत्त आहार – अति शीतल, दूषित या भारी भोजन। 
  • मानसिक तनाव – आयुर्वेद में मानसिक कारणों को भी यकृत विकारों का एक बड़ा कारक माना गया है। 
  • विषाक्त पदार्थों का सेवन।

यकृत शोथ की विकृति 

  • पित्त दोष यकृत में सूजन, जलन और पीलिया। 
  • कफ दोष – यकृत में भारीपन और चर्बी का जमाव। 
  • वात दोष – यकृत में सूखापन और दर्द। 

आयुर्वेदिक उपचार और प्रबंधन 

आयुर्वेद में यकृत शोथ का उपचार दोषों को संतुलित करने, विषाक्त पदार्थों को निकालने और यकृत की कार्यक्षमता को बढ़ाने पर केंद्रित है। 
 

आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सा 

1. विरेचन (Purgation Therapy) – पित्त दोष को संतुलित करने के लिए। 
2. बस्ति (Medicated Enema) – विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और वात दोष को संतुलित करने के लिए। 
3. अभ्यंग (Oil Massage) – यकृत की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए। 
4. शिरोधारा – मानसिक तनाव को कम कर यकृत विकारों में राहत देती है। 
 

महत्वपूर्ण औषध

1. भृंगराज (Eclipta alba)
  • यकृत की सूजन को कम करने और इसके पुर्नजन में सहायक। 
  • चिकित्सा पद्धति – भृंगराज चूर्ण या भृंगराज स्वरस का सेवन । 

महत्वपूर्ण औषध 

1. भृंगराज (Eclipta alba)

  • यकृत की सूजन को कम करने और इसके पुर्नजन में सहायक। 
  • चिकित्सा पद्धति – भृंगराज चूर्ण या भृंगराज स्वरस का सेवन । 

2. कुटकी (Picrorhiza kurroa) 

  • यकृत की सूजन को कम करने और इसके पुर्नजन में सहायक। 
  • चिकित्सा पद्धति – भृंगराज चूर्ण या भृंगराज स्वरस का सेवन । 
 

2. कुटकी (Picrorhiza kurroa) 

  • पित्त को संतुलित करती है और यकृत की कार्यक्षमता बढ़ाती है। 
  • दवा – कुटकी चुर्ण या “आरोग्यवर्धिनी वटी”। 

3. आरोग्यवर्धिनी वटी 

  • संयोजन – कुटकी, शुद्ध पारद, अभ्रक भस्म, लोह भस्म । 
  • लाभ हेपेटाइटिस के सभी प्रकारों में प्रभावी। 
 
 

4. पुनर्नवा (Boerhavia diffusa) 

  • मूत्रल (डाययुरेटिक) गुणों से युक्त यह यकृत और गुर्दे के लिए फायदेमंद है। 
  • पुनर्नवा चूर्ण या काढ़ा। 
 

4. पुनर्नवा (Boerhavia diffusa) 

  • मूत्रल (डाययुरेटिक) गुणों से युक्त यह यकृत और गुर्दे के लिए फायदेमंद है। 
  • पुनर्नवा चूर्ण या काढ़ा। 
5. त्रिफला 
  • यकृत को डिटॉक्सिफाई करती है और पाचन सुधारती है। 
  • उपयोग- त्रिफला चूर्ण का रात में गुनगुने पानी के साथ सेवन । 
 

6. भुम्यामलकी (Phyllanthus niruri) 

  • हेपेटाइटिस B और C के उपचार में प्रभावी । 
  • उपयोग – भुम्यामलकी स्वरस या चूर्ण 

आहार और जीवनशैली 

आहार 

ताजा फल – पपीता, अनार, और सेब। 
सब्जियां – लौकी, तोरई, और कद्दू। 
मसाले – हल्दी और धनियां।

आहार 

ताजा फल – पपीता, अनार, और सेब। 
सब्जियां – लौकी, तोरई, और कद्दू। 
मसाले – हल्दी और धनियां।

परहेज – शराब, मसालेदार भोजन, और जंक फूड। फूलगोभी, ब्रोकोली, बीन्स, सेब, एवाकाडो का समावेश करें। प्याज और लहसुन जैसे पारम्परिक मसालों को अपने भोजन में शामिल करें। खूब पानी पीएं, ताजे फलों का जूस पीएं। अल्कोहल का सेवन कम करें, गेहूं का सेवन कम करें। जंक फूड, मैदे से बने फूड्स, प्रोसेस्ड फूड और मीठी चीजों के सेवन से बचें। भोजन को चबा-चबाकर खाएं। इससे भोजन पचने में आसानी होगी। एक साथ भारी भोजन करने की बजाय कम मात्रा में 4-6 बार भोजन करें।

योग और प्राणायाम 

भस्त्रिका प्राणायाम – यकृत को ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाता है। 

कपालभाति – विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है। 

नोट – आयुर्वेद हेपेटाइटिस या यकृत शोथ के प्रत्येक रोगी की रोग-रोगी बलानुसार, प्रकृति अनुसार पथ्यापथ्य के साथ युक्तिपुर्वक, सत्वाजय और औषध के साथ चिकित्सा का निर्देश देता है।

योग और प्राणायाम 

भस्त्रिका प्राणायाम – यकृत को ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाता है। 

कपालभाति – विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है। 

नोट – आयुर्वेद हेपेटाइटिस या यकृत शोथ के प्रत्येक रोगी की रोग-रोगी बलानुसार, प्रकृति अनुसार पथ्यापथ्य के साथ युक्तिपुर्वक, सत्वाजय और औषध के साथ चिकित्सा का निर्देश देता है।

निष्कर्ष – हेपेटाइटिस एक जटिल रोग है, जो आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद दोनों में गहन अध्ययन का विषय है। जहां आधुनिक चिकित्सा ने इसकी एटियोलॉजी और पैथोलॉजी को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया है, वहीं आयुर्वेद यकृत शोथ को समग्रता से देखता है। दोनों दृष्टि कोणों को मिलाकर न केवल रोग का उपचार किया जा सकता है, बल्कि रोग की पुनरावृत्ति से भी बचा जा सकता है। 

आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली हेपेटाइटिस को समग्र रूप से देखती है। आयुर्वेदिक औषधि या जैसे कुटकी, भृंगराज, और आरोग्यवर्धिनी वटी आधुनिक चिकित्सा के साथ मिलकर यकृत रोगों को रोकने और उपचार में सहायक हो सकती हैं। जीवनशैली में उचित परिवर्तन, पंचकर्म और योग के माध्यम से हेपेटाइटिस को नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा का संयोजन हेपेटाइटिस के समग्र प्रबंधन में एक प्रभावी मार्ग प्रदान करता है।

प्रो. डॉ. राखी मेहरा,
संस्थापक डॉ. राखी आयुर्विज्ञान, नई दिल्ली

Prof. Dr. Rakhi Mehra

प्रो. डॉ. राखी मेहरा,
संस्थापक डॉ. राखी आयुर्विज्ञान, नई दिल्ली

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