समस्त उदर रोग, मोटापा, बवासीर, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धातु रोग आदि कोई ऐसा रोग नहीं, जिसमें शुद्धि क्रिया से लाभ न होता हो । यहां तक कि आधा लाभ अन्य योगासन व क्रियाओं से होता है और आधा लाभ केवल इस कायाकल्प की क्रिया से होता है। भयंकर जीर्ण रोगों को दूर करने में यह क्रिया सक्षम है।

हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति होती है जो रोगों से हमारे शरीर का बचाव करती हैं किंतु यदि रोग प्रतिरोधक शक्ति किन्हीं कारणों से क्षीण हो जाती है तो मनुष्य रोगों से ग्रसित होने लगता है। यौगिक क्रियाएं इस दृष्टि से अत्यंत लाभप्रद हैं क्योंकि यह शरीर में एकत्रित विकारों एवं विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने अर्थात् शारीरिक शोधन में सहायक होती हैं जिससे रोग होने की संभावना ही नहीं रहती। हठयोग में छः प्रकार की विशेष क्रियाओं का वर्णन किया गया है। इन्हें षट्कर्म कहा जाता है। शरीर को स्वस्थ रखने तथा व्याधि का विनाश करने में षट्कर्म-नेति, धौति (शंख प्रक्षालन), बस्ति, नौलि, कपालभाति तथा त्राटक-बहुत महत्वपूर्ण हैं। अतः यथोचित यही है कि रोग होने पर चिकित्सा करने के स्थान पर रोगों को उत्पन्न होने का अवसर ही नहीं दिया जाएं। इस दृष्टि से यौगिक क्रियाएं महत्वपूर्ण हैं जिनके द्वारा हम प्राकृतिक रुप से स्वस्थ रह सकते हैं। प्रसंगवश यहां मात्र धौति व शंख प्रक्षालन का उल्लेख किया गया है।

धौति के दो विधान हैं एक में जल का प्रयोग किया जाता है तथा दूसरी में वस्त्र का।

धौती / कुंजल क्रिया

प्राकृतिक योग की अत्यधिक ख्याति प्राप्त क्रिया है-जल धौति या कुंजल क्रिया। यह क्रिया पेट का शोधन करती है। इसे कुंजल क्रिया के अलावा वमन, गजकरणी आदि नामों से भी जाना जाता है। ‘कुंजल’ कुंजर (हाथी) शब्द से बना है, क्योंकि जैसे हाथी जब किसी तालाब या नदी में पहुंचता है, तो जल को अपनी सूंड में भर लेता और ऊपर उठाकर फव्वारे की भांति छोड़ता है। बस उस भांति ही इस क्रिया में पेट में पानी भरकर दोबारा मुखमार्ग से ही उदरस्थ जल को बाहर निकाला जाता है। कुंजल क्रिया से मात्र पेट की ही नहीं बल्कि थायराइड, पैराथायराइड, ग्रसनी, आहार नाल, छोटी आंत, बड़ी आंत, मलाशय की भी धुलाई-सफाई होती है। चूंकि कुंजल क्रिया से पाचन संस्थान के उन अवयवों का वह हिस्सा जो अम्लपित्त उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को एकत्र करते हैं,की सफाई धुलाई हो जाती है। इसलिए आज की जटिल व्याधि अम्लपित्त कुंजल क्रिया से समूल नष्ट हो जाती है

धौती / कुंजल क्रिया

प्राकृतिक योग की अत्यधिक ख्याति प्राप्त क्रिया है-जल धौति या कुंजल क्रिया। यह क्रिया पेट का शोधन करती है। इसे कुंजल क्रिया के अलावा वमन, गजकरणी आदि नामों से भी जाना जाता है। ‘कुंजल’ कुंजर (हाथी) शब्द से बना है, क्योंकि जैसे हाथी जब किसी तालाब या नदी में पहुंचता है, तो जल को अपनी सूंड में भर लेता और ऊपर उठाकर फव्वारे की भांति छोड़ता है। बस उस भांति ही इस क्रिया में पेट में पानी भरकर दोबारा मुखमार्ग से ही उदरस्थ जल को बाहर निकाला जाता है। कुंजल क्रिया से मात्र पेट की ही नहीं बल्कि थायराइड, पैराथायराइड, ग्रसनी, आहार नाल, छोटी आंत, बड़ी आंत, मलाशय की भी धुलाई-सफाई होती है। चूंकि कुंजल क्रिया से पाचन संस्थान के उन अवयवों का वह हिस्सा जो अम्लपित्त उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को एकत्र करते हैं,की सफाई धुलाई हो जाती है। इसलिए आज की जटिल व्याधि अम्लपित्त कुंजल क्रिया से समूल नष्ट हो जाती है

वर्तमान समय में सबसे ज्यादा व्यवसाय पेट के रोगों के नाम पर हो रहा है, किंतु औषधियां अम्लपित्त को समूल नष्ट करने में असमर्थ हैं। हालांकि इन औषधियों के इस्तेमाल से इनका प्रभाव रहने तक व्याधि शांत रहती है लेकिन जैसे ही औषधियों का प्रभाव खत्म होता है, यह व्याधि ज्यों की त्यों पनप जाती है। लेकिन यह लगभग साबित हो चुका है कि प्राकृतिक योग ही इस व्याधि को जड़ से नष्ट कर सकता है। प्राकृतिक योग के नियम की अनुपालना करने वाला यदि अम्लपित्त से रहित है, तो जीवन पर्यन्त अम्लपित्त से बचा रहता है तथा यदि अम्लपित्त के चंगुल में है, तो सदैव के लिए अम्लपित्त से मुक्त हो जाता है। सामान्यतया प्राकृतिक योग की एक ही क्रिया कुंजल’ उस व्याधि से छुटकारा दिलाने के लिए समर्थ है किंतु कुंजल क्रिया करने से पहले व बाद निम्नवत् तथ्यों का परिपालन अत्यंत आवश्यक है –

  • सादा आहार लें। ऊषःपान करें। 
  • तले-भुने एवं चिकने खाद्य पदार्थों का प्रयोग हरगिज न करें। 
  • दिन में ज्यादा से ज्यादा पानी का सेवन करें, जल मल को अग्रसारित करता ही है साथ ही साथ अम्ल पित्त की मात्रा को कम भी करता है। 
  • कच्चा भिगोया अंकुरित भोजन का प्रयोग करें, कच्चे फलों का इस्तेमाल, फलों का जूस अम्लपित्त में बड़ा ही फायदेमंद है।

कुंजल क्रिया करने की विधि  :- किसी बर्तन में कम से कम दस गिलास जल लीजिए। उस जल को गुनगुना सहने लायक गर्म कीजिए। उस जल में नमक इतना डालिए, जितना दाल में डालते हैं। पंजों के बल में बैठकर या खड़े रहकर दो-तीन गिलास गुनगुना गर्म नमकीन पानी जल्दी-जल्दी पिएं, तत्पश्चात मुंह में तर्जनी और मध्यमा दोनों उंगलियां डालकर गले में मौजूद चोंच या कौए पर दबाव डालकर पिए हुए जल की वमन कर दें। ऐसा करने से मुख से तो पित्त युक्त गंदा जल निकलता ही है, साथ ही नाक और नेत्रों से भी तीखा जल निकलने लगता है। 

कुंजल क्रिया के समय सावधानी :- कुंजल क्रिया करने से पूर्व दाहिने हाथ के नाखून ठीक तरह से कटे होने चाहिए अन्यथा गले में नाखून लगने का अंदेशा रहता है। कुंजल क्रिया के बाद पांच-दस मिनट के लिए शवासन में लेटना अति आवश्यक है ताकि उदर के अंगों में पैदा हलचल शांत हो जाए। 

कुंजल करने का सर्वथा सही समय प्रातःकाल शौचादि कामों से निवृत्त होने के बाद का है। वैसे जरुरत पड़ने पर यह क्रिया किसी भी समय की जा सकती है। 

कुंजल क्रिया से लाभ :- कुंजल क्रिया करते ही सिर की पीड़ा समाप्त हो जाती है, नेत्रों की दाह का शमन होता है तथा वे निखरकर बिल्कुल साफ-सुथरे नजर आते हैं। इस क्रिया से अस्थमा, नजला, छींकें, पेटदर्द, यकृत विकार आदि से छुटकारा मिलता है एवं पाचन क्रिया अच्छी हो जाती है। कुंजल क्रिया काया को निर्दोष एवं निर्विकार बनाने की बेहतर क्रिया है। जितनी खामियां केवल कुंजल क्रिया से बाहर निकल जाती हैं. शायद उतनी संसार के किसी भी दवा या चिकित्सा प्रणाली से नहीं निकल पातीं। 

वस्त्र-धौति क्रिया :- आठ सेन्टीमीटर चौड़े तथा सात मीटर लम्बे मलमल के कपड़े को नमक वाले पानी में भिगोकर धीरे-धीरे अंदर निगल जाना एवं फिर उसे बाहर निकाल लेने को वस्त्र-धौति क्रिया कहते हैं। इस कपड़े की पट्टी को प्रयोग करने से पहले गर्म पानी से भली-भांति धोकर साफ कर लेना चाहिए। पट्टी को हल्के नमक वाले पानी के प्याले में रख दें। कपड़े के एक छोर को मुख में डालकर पशुओं की तरह धीरे-धीरे चबाकर पेट में उतार लें। इसका अभ्यास धीरे-धीरे करना चाहिए। पहले दिन केवल 12 सेन्टीमीटर कपड़ा ही निगलें और धीरे-धीरे इसे बढ़ाते जाए।

कपड़े की पट्टी को मुख खोलकर धीरे-धीरे बाहर निकालें। रुकावट होने पर पुनः धौति को निगलें और फिर बाहर निकालें। शुरु-शुरु में यदि धौति निगलने में पीड़ा हो या हिचकी आए तो दूध या मधु के पानी में भिगोकर निगलने का अभ्यास करें। यदि अंदर कोई रुकावट पड़ जाए तथा धौति बाहर न निकलें तो नमक वाला पानी पीकर वमन करें फिर धौति बाहर कर लें। धौति को निकालने के बाद भली-भांति साबुन मिले गर्म पानी से साफ करें ताकि उसमें लगा हुआ कफ आदि साफ हो जाए। बाद में उसे धूप में सूखा लें।

धौति करने से पेट का सारा कफ बाहर निकल जाता है। खांसी, दमा, श्वास, सिरदर्द, ज्वर, प्लीहा, कोढ़ आदि अनेक तरह के रोग ठीक हो जाते हैं। मनुष्य निरोगी और ताकतवर होता है, गैस व अन्य पेट संबंधी रोगों में लाभ होता है, भूख बढ़ती है।

शंख प्रक्षालन

हमारे आंत की आकृति शंखाकार है। उस शंखाकार आंत का प्रक्षालन होना (शुद्ध करना) ही ‘शंख प्रक्षालन’ या ‘वारिसार क्रिया’ कहलाता है। इस क्रिया को करने से शरीर का वास्तव में कायाकल्प हो जाता है।

हमारे उदर में लगभग 32 फीट लंबी आंत है। उसकी सफाई हम जिंदगी में कभी नहीं करते। इससे उसकी दीवारों पर सूक्ष्म मल की पर्त बन जाती है। उस पर्त के जम जाने से रसों के अवशोषण व निष्कासन (परित्याग) की जो ठीक-ठाक क्रिया होनी चाहिए वह नहीं हो पाती, जिससे मंदाग्नि, अपच, खट्टी डकारें आना आदि रोग पैदा हो जाते हैं। मल के सड़ने से पेट में दुर्गंध हो जाती है। गैस्ट्रिक की बीमारी हो जाती है। रस का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता। जब मुख्य तंत्र ही विकृत हो जाता है तब सहायक यंत्र आमाशय, अग्न्याशय (पेंक्रियाज) आदि भी प्रभावित हो जाते हैं और विविध प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। समस्त उदर रोग, मोटापा, बवासीर, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धातु रोग आदि कोई ऐसा रोग नहीं, जिसमें शुद्धि क्रिया से लाभ न होता हो। यहां तक कि आधा लाभ अन्य योगासन व क्रियाओं से होता है और आधा लाभ केवल इस कायाकल्प की क्रिया से होता है। भयंकर जीर्ण रोगों को दूर करने में यह क्रिया सक्षम है।

शंख प्रक्षालन

हमारे आंत की आकृति शंखाकार है। उस शंखाकार आंत का प्रक्षालन होना (शुद्ध करना) ही ‘शंख प्रक्षालन’ या ‘वारिसार क्रिया’ कहलाता है। इस क्रिया को करने से शरीर का वास्तव में कायाकल्प हो जाता है।

हमारे उदर में लगभग 32 फीट लंबी आंत है। उसकी सफाई हम जिंदगी में कभी नहीं करते। इससे उसकी दीवारों पर सूक्ष्म मल की पर्त बन जाती है। उस पर्त के जम जाने से रसों के अवशोषण व निष्कासन (परित्याग) की जो ठीक-ठाक क्रिया होनी चाहिए वह नहीं हो पाती, जिससे मंदाग्नि, अपच, खट्टी डकारें आना आदि रोग पैदा हो जाते हैं। मल के सड़ने से पेट में दुर्गंध हो जाती है। गैस्ट्रिक की बीमारी हो जाती है। रस का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता। जब मुख्य तंत्र ही विकृत हो जाता है तब सहायक यंत्र आमाशय, अग्न्याशय (पेंक्रियाज) आदि भी प्रभावित हो जाते हैं और विविध प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। समस्त उदर रोग, मोटापा, बवासीर, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धातु रोग आदि कोई ऐसा रोग नहीं, जिसमें शुद्धि क्रिया से लाभ न होता हो। यहां तक कि आधा लाभ अन्य योगासन व क्रियाओं से होता है और आधा लाभ केवल इस कायाकल्प की क्रिया से होता है। भयंकर जीर्ण रोगों को दूर करने में यह क्रिया सक्षम है।

डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम
आयुष्मान, प्लॉट नं. - 7, सी. ओ. डी. कालोनी रोड, कोयला नगर (बाई पास रोड), कानपुर नगर - 208011

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