सबेरे के नाश्ते में आलू के या सादे तले हुए परांठे, दही, डबल रोटी या ब्रेड स्लाइस मक्खन टोस्ट व चाय इत्यादि न लें । मौसमी फल, दूध, अंकुरित चना, मूंग, मेथीदाना अथवा छाछ ली जा सकती है। ऑफिस या व्यावसायिक स्थान पर आने वाले मेहमानों के लिए चाय के स्थान पर नींबू पानी, शहद, छाछ, मौसमी फलों के रस, बेल शरबत या जूस, हर्बल टी इत्यादि में से कुछ भी पसंद के अनुसार सर्व कर सकते हैं। फलों के रस या गाजर का रस स्वास्थ्य वृष्दि के साथ कार्य दक्षता को भी विकसित करता है। छाछ भूख में वृध्दि करने के साथ-साथ पाचन शक्ति में भी वृष्दि करती है।

मनुष्य का शरीर ईश्वर की अदभुत कृति है। इस शरीर रूपी मंत्र से ही अनेक मंत्रों का अविष्कार संभव हो पाया है इस मंत्र का मुख्य भाग उदर है, जहां मनुष्य द्वारा उपभोग की गई वस्तु सर्वप्रथम पहुंचती है। वहीं इसका पाचन होकर उससे रूचिर वीर्य, मल व सूत्र इत्यादि बनने की क्रिया होती है। यह शरीर का केन्द्र बिन्दु है। इसमें जिन आंतरिक गुणी से युका भोजन सामग्री जाएगी- वैसा ही मन बनेगा, वैसी ही विचार शक्ति की उत्पत्ति होती वैसा ही शारीरिक व आत्मिक बल बचेगा। यही जीवन का आधार है। इसी से मनुष्य का ओज, शरीर को बनावट एवं शारीरिक ऊर्जा का निर्माण होता।

उचित भोजन का ही करें चयन

वर्तमान में सामान्य व्यक्ति इस बात को भूल गया है कि प्रभु द्वारा निर्मित इस अद्भुत यंत्र की पाचन शक्ति अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग है। हर मनुष्य समान मात्रा में व समान रूप से खाद्य सामग्री अपने उदर में प्रेषित नहीं कर सकता है। अपनी क्षमता के अनुसार उसके द्वारा उपभोग में ली गई खाद्य सामग्री से ही उसके शरीर की पुष्टता, बनावट व शक्ति का निर्माण होता है। अपने को प्रिय एवं स्वादिष्ट लगने वाले भोजन व पेय के स्थान पर शरीर के लिए आवश्यक कैलोरी देने वाले श्रेष्ठ एवं सात्विक भोजन का चयन करना अपने ही हित में अनिवार्य होता है। गलत चयन अपनी आदतों को बिगाड़ने के साथ-साथ अनेक बीमारियों को भी निमंत्रित करेगा। इसलिए कुछ भी खाने या पीने के पहले 1 मिनट के लिए सोचना नितांत आवश्यक है कि इसे पेट में जाने की इजाजत दी जाए या नहीं। संभव है कि खाद्य सामग्री तो निःशुल्क उपलब्ध हो रही हो, लेकिन पेट की बीमारी का इलाज कितना महंगा हो सकता है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। किसी से भी फूड पाइजनिंग हो सकती है। आप अपने वाहन में पेट्रोल के स्थान पर डीजल या उसमें ऑइल नहीं मिलाते क्योंकि उसका इंजन बैठ जाएगा, जबकि उसकी कीमत कुछ लाख से अधिक नहीं होती। क्या कभी सोचा है कि आपका यह अमूल्य शरीर रूपी यंत्र करोड़ों रुपये खर्च करने पर भी दोबारा नहीं मिलेगा, किंतु इसे थोड़ी-सी सावधानी से ठीक रखा जा सकता है। मानसिक कमजोरी से या स्वाद के चक्कर में हम इसे बीमार कर बैठते हैं। अब उन कारणों को देखें, जिससे उदर रोग होने की पूर्ण संभावना रहती है।

मृत भोजन का सेवन

बेकरी में बनी खाद्य सामग्री, मैदे से बनी वस्तुएं, मिठाइयां, नमकीन, फास्ट फूड, बासी भोजन, तले हुए एवं तेज मसालों से युक्त भोजन, फ्रिज में रखा पुराना भोजन इत्यादि में शरीर को निरोगी रखने वाले औषधीय गुण नहीं होते, अतः वे मृत भोजन कहलाते हैं। एक तो वे देरी से पचते हैं, दूसरे कभी-कभी पेट में ऐसा दर्द करते हैं कि चिकित्सक से इलाज करवाना अनिवार्य हो जाता है। आप एक परीक्षण करें कि एक सादी रोटी एवं एक तली हुई पूड़ी को अलग-अलग पानी के बर्तन में रखें और देखें कि पहले पानी में क्या घुलती है। रोटी पूडी से तीन गुना कम समय में पानी में गल जाती है, इसी प्रकार वह पेट में भी शीघ्र पच जाती है।

चबा-चबाकर नहीं खाना

सामान्य रूप से हम 32 दांतों का पूर्ण उपयोग भोजन् को चबाने के लिए नहीं करते हुए, जल्दी-जल्दी 5 या 10 मिनट में भोजन कर लेते हैं। इससे न तो भोजन पूरी तरह से पिसता है, न ही वह लारयुक्त बनता है। वह देरी से पाचन् योग्य बनता है क्योंकि आमाशय में दांतों का प्रतिस्थापन यंत्र नहीं है, जो कि उसकी ग्राइंडिंग कर सके। दांतों द्वारा ग्राइंडिंग नहीं होने से वहां के अम्ल पित्त में वृद्धि होती है एवं यहां वह अधिक देर तक पड़ा रहता है और सड़ता भी है। इससे गैस बनती है, पेट फूलता है और पाचन क्रिया गड़बड़ा जाती है। इससे अनेक रोग होने की संभावना बन जाती है।

भूख से अधिक ठूंसना

बहुत से व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन को देखकर अत्यधिक मात्रा में पेट में डाल लेते हैं। अपने सामर्थ्य से अधिक खाना रोग को निमंत्रित करना है। फिर भूख न होने पर किसी की मनुहार पर खा लेना पेट को और भी ज्यादा खराब करता है। पेट में तीन-चौथाई स्थान से ज्यादा नहीं भरा जाना चाहिए. बेमेल खाना भी नहीं होना चाहिए। खूब मिठाइयां, आइसक्रीम और उसके बाद दूध या कोल्ड ड्रिंक भी अधिक न हों। इस प्रकार से किए गए भोजन से पेट में पाचन क्रिया ठीक से नहीं हो पाती। पहले आलस्य आता है, फिर नींद आ जाती है। इससे स्वाभाविक रूप से पेट खराब हो जाता है, अम्लपित्त की वृद्धि, गैस, मधुमेह व अनेक रोग हो जाते हैं।

अनियमित समय

कुछ लोग कार्य की व्यस्तता में भोजन का समय हो जाने पर भी उसे टाल देते हैं, चाय पी लेते हैं अथवा किसी भी समय मेहमान के आने पर उनके साथ चाय-नमकीन या बिस्कुट आदि लेते रहते हैं। इससे उन्हें भोजन के समय का भान नहीं रहता है और न ही सच्ची भूख लगती है। परिणामतः उनकी कार्यक्षमता में तो कमी होती ही है, साथ ही सिरदर्द, बी. पी. इत्यादि रोग शीघ्रता से हो जाते हैं।

भूख से अधिक ठूंसना

बहुत से व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन को देखकर अत्यधिक मात्रा में पेट में डाल लेते हैं। अपने सामर्थ्य से अधिक खाना रोग को निमंत्रित करना है। फिर भूख न होने पर किसी की मनुहार पर खा लेना पेट को और भी ज्यादा खराब करता है। पेट में तीन-चौथाई स्थान से ज्यादा नहीं भरा जाना चाहिए. बेमेल खाना भी नहीं होना चाहिए। खूब मिठाइयां, आइसक्रीम और उसके बाद दूध या कोल्ड ड्रिंक भी अधिक न हों। इस प्रकार से किए गए भोजन से पेट में पाचन क्रिया ठीक से नहीं हो पाती। पहले आलस्य आता है, फिर नींद आ जाती है। इससे स्वाभाविक रूप से पेट खराब हो जाता है, अम्लपित्त की वृद्धि, गैस, मधुमेह व अनेक रोग हो जाते हैं।

अनियमित समय

कुछ लोग कार्य की व्यस्तता में भोजन का समय हो जाने पर भी उसे टाल देते हैं, चाय पी लेते हैं अथवा किसी भी समय मेहमान के आने पर उनके साथ चाय-नमकीन या बिस्कुट आदि लेते रहते हैं। इससे उन्हें भोजन के समय का भान नहीं रहता है और न ही सच्ची भूख लगती है। परिणामतः उनकी कार्यक्षमता में तो कमी होती ही है, साथ ही सिरदर्द, बी. पी. इत्यादि रोग शीघ्रता से हो जाते हैं।

भोजन के साथ पानी या कोल्ड ड्रिंक पीने की आदत

तेज मसालेयुक्त भोजन के सेवन से भोजन के बीच या बाद में अधिक पानी पीना भी पाचन क्रिया का नुकसान करता है। कुछ लोग भोजन के साथ-साथ कोल्ड ड्रिंक लेते हैं ताकि खाना अच्छी मात्रा में खा सकें तथा गरिष्ठ या मांसाहारी भोजन का आनंद ले सकें। यह भी भोजन करने के नियमों के विपरीत है। आवश्यकता पड़ने पर अल्प मात्रा में हलका गर्म पानी या छाछ (बिना मक्खन के पानीयुक्त दही) लिया जा सकता है। ठंडा पेय जठराग्नि को मंद करके पाचन क्रिया धीमी कर देता है।

औषधियों का नियमित उपयोग

भोजन पचाने की या अन्य औषधियों का उपयोग पाचन शक्ति को कमजोर बनाता है। इनके निरंतर उपयोग से पाचन शक्ति का पुनः शक्तिकरण बहुत मुश्किल हो जाता है।

इन नियमों का करें पालन उदर रोग का मुख्य कारण व्यक्ति के भोजन एवं पेय हैं। उन्हें निम्न समयानुसार लेने से तथा कुछ विशेष सावधानियां रखने से उदर रोग होने की संभावना न्यून हो जाती है –

प्रातः पेय :- सुबह उठते ही बेड टी के स्थान पर हलका गर्म मेथी-पानी या नींबू-पानी, शहद या शहद-पानी अथवा गर्म हर्बल टी गुड़ के साथ बिना दूध की ली जा सकती है। जैसा मौसम हो, जैसी इच्छा हो या जैसा स्वास्थ्य हो, उसके अनुरूप पेय लिया जा सकता है। जिनको वजन कम करने की इच्छा हो. उन्हें प्रथम दोनों में से एक लेना चाहिए।

औषधियों का नियमित उपयोग

भोजन पचाने की या अन्य औषधियों का उपयोग पाचन शक्ति को कमजोर बनाता है। इनके निरंतर उपयोग से पाचन शक्ति का पुनः शक्तिकरण बहुत मुश्किल हो जाता है।

इन नियमों का करें पालन उदर रोग का मुख्य कारण व्यक्ति के भोजन एवं पेय हैं। उन्हें निम्न समयानुसार लेने से तथा कुछ विशेष सावधानियां रखने से उदर रोग होने की संभावना न्यून हो जाती है –

प्रातः पेय :- सुबह उठते ही बेड टी के स्थान पर हलका गर्म मेथी-पानी या नींबू-पानी, शहद या शहद-पानी अथवा गर्म हर्बल टी गुड़ के साथ बिना दूध की ली जा सकती है। जैसा मौसम हो, जैसी इच्छा हो या जैसा स्वास्थ्य हो, उसके अनुरूप पेय लिया जा सकता है। जिनको वजन कम करने की इच्छा हो. उन्हें प्रथम दोनों में से एक लेना चाहिए।

नाश्ता : सवेरे के नाश्ते में आलू के या सादे तले हुए परांठे, दही, डबल रोटी या ब्रेड स्लाइस मक्खन टोस्ट व चाय इत्यादि न लें। मौसमी फल, दूध, अकुरित चना, मूंग, मेथीदाना अथवा छाछ ली जा सकती है। ऑफिस या व्यावसायिक स्थान पर आने वाले मेहमानों के लिए चाय के स्थान पर नींबू पानी शहद, छाछ, मौसमी फलों के रस, बेल शरबत या जूस, हर्बल टी इत्यादि में से कुछ भी पसंद के अनुसार सर्व कर सकते हैं। सर्व करने का तात्पर्य यह नहीं है कि मेहमान का साथ देने के लिए स्वयं भी हर बार लें। भोजननली में 3 घंटे के बाद ही कुछ प्रेषित करना ठीक रहता है। फलों के रस या गाजर का रस स्वास्थ्य वृद्धि के साथ कार्य दक्षता को भी विकसित करता है। छाछ भूख में वृद्धि करने के साथ-साथ पाचन शक्ति में भी वृद्धि करती है।

लंच

दिन के समय लंच में 1-2 प्रकार की हरी सब्जियां (कम मिर्च मसालों की गर्म मसाला रहित, कम तेल या घी में बनी हई), बिना मांड निकाला हुआ चावल या चोकर सहित आटे से बनी रोटियां, छिलके सहित कुकर में पकाई दाल तथा लौकी का रायता या दही इत्यादि ले सकते हैं।

अपरान्ह में फल व सूखे मेवे ले सकते हैं अथवा चाय की तलब अधिक हो, तो हर्बल टी शक्कर व दूध के साथ लें।

सायंकालीन भोजन

रात्रि के भोजन के स्थान पर संध्या के थोड़ी देर बाद ही भोजन का समय बनाएं क्योंकि सोने के 3-4 घंटे पहले भोजन लेना स्वास्थ्य के लिए हितकारी रहता है। भोजन में सुपाच्य हलका भोजन (लंच की तरह) या उम्र के हिसाब से दलिया अथवा खिचड़ी, इडली इत्यादि में से कुछ ले सकते हैं। रात्रि में दही नहीं लें। भोजन संयमित मात्रा में ही लें।

आजकल उपलब्ध पानी पूर्ण रूप से स्वच्छ नहीं होता है। अतः पानी की शुद्धता को जांचकर पानी का उपयोग करें। पानी भोजन के 1 घंटा बाद लें एवं जब भी प्यास लगे, अवश्य लें।

भोजन हमेशा शुद्ध अन्न का होना चाहिए यानी अपनी नैतिकतायुक्त अर्जित कमाई का हो तथा पवित्र मन से पका हुआ हो । खाते समय भी प्रसन्नतापूर्वक उसका सेवन करना चाहिए। क्रोधी मन से खाया भोजन विकार उत्पन्न करता है। अखबार पढ़ते-पढ़ते. टी.वी. देखते हुए अथवा दूसरों की आलोचना या शिकायतें सुनते हुए भोजन करना आध्यात्मिक नियमों में वर्जित है।

सायंकालीन भोजन

रात्रि के भोजन के स्थान पर संध्या के थोड़ी देर बाद ही भोजन का समय बनाएं क्योंकि सोने के 3-4 घंटे पहले भोजन लेना स्वास्थ्य के लिए हितकारी रहता है। भोजन में सुपाच्य हलका भोजन (लंच की तरह) या उम्र के हिसाब से दलिया अथवा खिचड़ी, इडली इत्यादि में से कुछ ले सकते हैं। रात्रि में दही नहीं लें। भोजन संयमित मात्रा में ही लें।

आजकल उपलब्ध पानी पूर्ण रूप से स्वच्छ नहीं होता है। अतः पानी की शुद्धता को जांचकर पानी का उपयोग करें। पानी भोजन के 1 घंटा बाद लें एवं जब भी प्यास लगे, अवश्य लें।

भोजन हमेशा शुद्ध अन्न का होना चाहिए यानी अपनी नैतिकतायुक्त अर्जित कमाई का हो तथा पवित्र मन से पका हुआ हो । खाते समय भी प्रसन्नतापूर्वक उसका सेवन करना चाहिए। क्रोधी मन से खाया भोजन विकार उत्पन्न करता है। अखबार पढ़ते-पढ़ते. टी.वी. देखते हुए अथवा दूसरों की आलोचना या शिकायतें सुनते हुए भोजन करना आध्यात्मिक नियमों में वर्जित है।

भोजन के तुरंत बाद वज्रासन किया जा सकता है। पैरों को मोडकर अपने घुटनों के बल इस प्रकार जमीन पर बैठे कि पीछे पांव के अंगूठे मिले हुए हों। एड़ियां खुली, एड़ियों पर नितम्ब हो तथा मेरुदंड सीधा हो व हाथों को सीधा रखते हुए सामने की ओर देखें। इस आसन से पाचन शक्ति बढ़ती है। इसको 1 मिनट से आरंभ करके कम से कम 5 मिनट अवश्य करें। अभ्यास हो जाने पर इस आसन पर बैठकर समाचारपत्र भी पढ़ा जा सकता है। अम्लपित्त वालों के लिए यह आसन बहुत ही लाभकारी है।

भोजन को उदर भरण की सामग्री नहीं मानते हुए, उसे शरीर को निरोग रखने की औषधि मानकर, उचित भोजन का चयन कर, अच्छी भूख लगने पर धीरे-धीरे प्रसन्नतापूर्वक खाया जाए तो वह यथार्थ में शरीर रक्षक औषधि बन जाता है एवं अन्य औषधियों की फिर आवश्यकता ही नहीं रहती। इसलिए भोजन का चयन एवं उसकी मात्रा बहुत ही महत्वपूर्ण है। पेट में गड़बड़ महसूस होने पर उपवास एव नीबू पानी का उपयोग करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी रहता है। नैतिकता से अर्जित सात्विक भोजन स्वयं को प्रफुल्लित करता ही है, साथ ही घर परिवार व अपने व्यावसायिक सहकर्मियों को भी प्रसन्नता प्रदान करता है। इसलिए सुबह-सुबह अपने अंतर में कुछ देर देखिए। ध्यान कीजिए, विचार कीजिए तथा योगासन, प्राणायाम व ध्यान को अपने जीवन का मुख्य अंग बनाइए ताकि उदर रोग तो क्या, किसी भी प्रकार का रोग आपका मेहमान नहीं बने। वर्षा ऋतु में तो भोजन के चयन और उदर रोगों के प्रति अतिरिक्त सजगता अनिवार्य है।

डॉ. शिवप्रकाश अरोड़ा
डी-50, कमला नेहरू नगर प्रथम, जोधपुर

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top