जो लोग हर समय कुछ न कुछ खाते रहते हैं, वे अग्निमांद्य के अधिक शिकार बनते हैं। अग्निमांद्य होने से आहार की पाचन क्रिया संपन्न नहीं हो पाती। निश्चित समय पर भोजन करने से अग्निमांद्य की विकृति से छुटकारा मिलता है। अग्निमांद्य में कोई औषधि सेवन करने से पहले यह ज्ञात करना आवश्यक होता है कि अग्निमांद्य की विकृति किस कारण से हुई है। विकृति का कारण पता चलने पर अग्निमांद्य की चिकित्सा सरल हो जाती है।
सामान्य रूप से देखा जाए तो जिसमें प्रकाश है, तेज है, जो जलती है, उसे अग्नि कहते हैं। आचार्यों द्वारा चार प्रकार की अग्नियां कहीं गई है –
(1) भूमि पर पाये जानेवाली अग्नि को व्यौम अग्नि कहते हैं जैसे काष्ठाग्नि जो लकड़ी या अन्य स्रोतों के जलने से उत्पन्न होती है।
(2) दिव्य स्रोतों से प्राप्त अग्नि दिव्य अग्नि है जैसे विद्युत सूर्य की तपन आदि ।
(3) सभी प्राणियों में, पेट में अदृश्य अग्नि प्रज्जवलित रहती है जो खाए हुए आहार को पचाने का कार्य करती है उसे औदर्यअग्नि जठराग्नि कहते है।
(4) इसके अलावा पृथ्वी के गर्भ या खान आदि में पाई जानेवाली अग्नि आकारण अग्नि होती है। हमारा शरीर पांच महाभूतों आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी से मिलकर बना है। इन पचमहाभूतों में एक तत्व अग्नि है। शरीर में अग्नि का कार्य निरन्तर होता रहता है जिस क्षण अग्नि का कार्य रुक जाता है शरीर निर्जीव हो जाता है। आयुर्वेदानुसार आहार को शरीर के अनूकुल बनाना अग्नि का कार्य है। आहार का पाचन कर शरीर के अंगों का पोषण करना, धातुओं का पोषण करना, अंगों का विकास करना, शरीर को ऊर्जा प्रदान करना, शरीर के मल द्रव्यों को बाहर निकालना आदि अग्नि का ही काम है। रूप का ज्ञान, अनेक रंगों का ज्ञान, शरीर में वर्ण, उत्साह प्रकट करना, शरीर को सदा गर्म रखना, अंगों को गति देना, ये शरीर स्थित अग्नि के महत्वपूर्ण कार्य हैं।
आयुर्वेदानुसार शरीर स्थित अग्नि यद्यपि एक ही है परन्तु कार्य और क्षेत्र के भेद से आयुर्वेद चिकित्सा में पांच भूताग्नियां, सात धात्वाग्नियां और एक जठराग्नि कुल तेरह अग्नियों का वर्णन मिलता है। जठराग्नि जिसे पाचकाग्नि भी कहते हैं, इसका कार्य आमाशय और ग्रहणी में आहार का पाचन करना है। धात्वाग्नियां एक धातु से दूसरे धातु में परिणत करती है और भूताग्नियां आहार तथा धातुओं में अपेक्षित परिवर्तन करती है। इन तेरह अग्नियों में जठराग्नि का विशेष महत्व है तथा यह सभी अग्नियों में श्रेष्ठ भी है क्योंकि यह अपने स्थान (आमाशय, पच्यमानाशय, पक्वाशय, यकृत, अग्नाशय आदि) में रहते हुए अन्य बारह प्रकार की अग्नियों का पोषण करती है। यह अग्नि इन अंगों में स्थित रहकर विभिन्न पाचक रसों के स्राव के रूप में अन्न का पाचन करती है तथा भूताग्नियों एवं धात्वाग्नियों के कार्यों को प्रेरणा देती है। जठराग्नि के मंद होने पर भूताग्नियों तथा धात्वाग्निया भी मद हो जाती हैं। इन अग्नियों के मंद होने से विभिन्न रोगों की उत्पत्ति होती है। पाचन शक्ति क्षीण या मंद हो जाने पर जब भोजन पूरी तरह पच नहीं पाता, तो उस विकृति को अग्निमांद्य कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार अग्निमांद्य सभी रोगों की जड़ है। ” ।। रोगाः सर्वेऽपि मंदाग्नौ ।।” अग्नि मांद्य दो शब्दों से मिलकर बना है-अग्नि+मंद। अग्नि अर्थात digestion power, मंद अर्थात low । जब भी अग्निमंद होती है तो आहार ठीक तरह से पच नहीं पाता, जिस कारण उससे बनने वाला आहार रस भी अपक्च होता है। अपक्व आहार रस के कारण शरीर को सही पोषण प्राप्त नहीं होता जिससे शरीर में कमजोरी आती है और शरीर को अनेक बीमारियों को पनपने के लिए अनूकुल बनाता है। एक बार बीमारी शुरू हो जाए तो वह पलटकर अग्नि को और मंद करती है। अगर स्वस्थ रहना है तो हमें अपनी अग्नि को अच्छा रखने का प्रयत्न करते रहना चाहिए।
समुचित आहार-विहार से स्वास्थ्य बना रहता है लेकिन मलत असमय आहार-विहार से अग्नि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और जठराग्नि मंदता से अजीर्ण, अतिसार प्रवाहिका विलम्बिका अलसक ग्रहणी अनुलोम क्षय आदि रोग उत्पन्न होते है। भुताग्नियों की मंदता से आन्त्रक्षय और अनुलोम क्षुद्ध तथा धात्वाग्नियों की मदता से प्रधानत प्रति लोम क्षय या मधुमेह जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार यह अग्नि प्राकृत अवस्था में है तो मनुष्य निरोगी अवस्था में दीर्घकाल तक जीवित रहता है। किन्तु विकृतावस्था में मनुष्य व्याधि ग्रस्त हो जाता है।
अग्निमांद्य होने के कारण
दूषित जगह, दूषित भोजन करने तथा फास्टफूड व डिब्बाबंद खाद्य-पदार्थों के अधिक सेवन करने से, खेतों में रासायनिक व कीटनाशक डालकर उगाए गए अन्न का सेवन करने से, अधिक शीतल व अधिक उष्ण पेय पीने से, मानसिक तनाव, मादक द्रव्यों का सेवन, धुम्रपान की अधिकता, एलोपैथी औषधियों के सेवन के साइडइफेक्ट से, भोजन करते समय अधिक जल पीने या बहुत कम जल पीने से, अनियमित समय पर भोजन, प्रकृति विरुद्ध आहार, गरिष्ठ खाद्य-पदार्थों का सेवन, बासी भोजन, मांस का अधिक सेवन, मलावरोध या कब्ज के चलते अधिक भोजन, अधिक मैथुन, आमाशय की किसी विकृति, अम्लपित्त की विकृति, पित्ताशय से पित्त का स्त्राव नहीं होने पर पाचन क्रिया की विकृति अग्निमांद्य की उत्पत्ति करती है।
अग्निमांद्य के लक्षण
रोगी को भूख नहीं लगती। कुछ नहीं खाने पर भी उदर या पेट में भारीपन अनुभव होता है। पेट में गैस बहुत पीड़ित करती है, जी मिचलाना या उल्टी लगना, सिर में भारीपन, अतिसार व अगमर्द के लक्षण बनते हैं। मुह में बार-बार लालास्त्राव, आम की उत्पत्ति, उदर शूल, चलने-फिरने में अशक्ति अनुभव होती है। अरुचि या खाने की इच्छा भी नहीं होती है।
वात, पित्त कफ दोषों के आधार पर अग्निमांद्य तीन प्रकार का होता है –
वात प्रधान अग्निमांद्य – में आहार की पाचन क्रिया कभी होती है. कभी नहीं होती। पेट में आध्मान (गुडगुडाहट) की विकृति होती है, तो वायु (गैस) ऊपर की ओर गति शील होती है. कब्ज, पेट में भारीपन, कभी-कभी अतिसार की विकृति होती है।
पित्त प्रधान अग्निमांद्य – में मिर्च-मसाले, अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करने से रोगी को अधिक पसीना आता है, पतला मल निकलता है, मूत्र का रंग पीला हो जाता है, प्यास अधिक लगती है, जलन होती है और अनिद्रा की विकृति होती है।
कफ प्रधान अग्निमांद्य – में शीतल, स्निग्ध खाद्य पदार्थों का सेवन करने से आलस्य अधिक बढ़ जाता है, अधिक नींद आती है. मुंह में मीठापन लगता है, वमन की इच्छा होती है, उदर में भारीपन होता है।
अग्निमांद्य की चिकित्सा
अग्निमांद्य की चिकित्सा कराते समय हर समय कुछ न कुछ खाते रहने की आदत पर नियंत्रण करना चाहिए। जो लोग हर समय कुछ न कुछ खाते रहते हैं, वे अग्निमांद्य के अधिक शिकार बनते हैं। अग्निमांद्य होने से आहार की पाचन क्रिया संपन्न नहीं हो पाती। निश्चित समय पर भोजन करने से अग्निमांद्य की विकृति से छुटकारा मिलता है। अग्निमांद्य में कोई औषधि सेवन करने से पहले यह ज्ञात करना आवश्यक होता है कि अग्निमांद्य की विकृति किस कारण से हुई है। विकृति का कारण पता चलने पर अग्निमांद्य की चिकित्सा सरल हो जाती है। अग्निमांद्य की विकृति में अधिकांश रोगी मलावरोध से अधिक पीड़ित होते हैं। मलावरोध के चलते उदर में भारीपन, गैस की विकृति और उदरशूल की स्थिति बन जाती है। रोगी आध्मान से भी पीड़ित होते हैं। मलावरोध की विकृति नष्ट करने से उदरशूल व आध्मान से मुक्ति मिलती है।
- अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े किसी काच के पात्र में नींबू के रस तथा सेंधा नमक मिलाकर रखें।
- भोजन के पहले खाने से अरुचि नष्ट होती है. भूख लगती है और भोजन की पाचन क्रिया सरलता से होती है।
- हरड़ के 3 ग्राम चूर्ण को गुड़ के साथ सेवन करने से अग्निमांद्य की विकृति नष्ट होती है।
- लहसुन 50 ग्राम, सफेद जीरा, अदरक काली मिर्च 5-5 ग्राम मिलाकर सिलपर पीसकर, सेंधानमक मिलाकर चटनी बनाए। भोजन करते समय चटनी का उपयोग करने से भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है। भोजन सरलता से पचता है और अग्निमांद्य विकृति का निवारण होता है।
- पिप्पली, हरड़ और सेंधा नमक कूटकर बारीक चूर्ण बनाकर 3-3 ग्राम चूर्ण हलके गरम जल के साथ सेवन करने से अग्निमांद्य का निवारण होता है।
- दालचीनी, इलायची और सोंठ 10-10 ग्राम मात्रा में लेकर, बारीक चूर्ण बनाकर प्रति दिन भोजन से पहले 2-2ग्राम चूर्ण जल के साथ सेवन करने से भोजन सरलता से पचता है और अग्निमांद्य नष्ट होता है।
अग्निमांद्य में उपयोगी औषधियां
त्रिफला चूर्ण, हिंग्वाष्टक चूर्ण, हिंग्वादि चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, अग्निमुख चूर्ण, शिवाक्षार पाचन चूर्ण, अग्नि तुण्डी वटी, अग्निवर्धक वटी, लशुनादि वटी, शंखवटी, रेचक वटी, शम्बकादि वटी, रवि सुंदर वटी, रामबाण रस, बड़वानल रस, अग्निकुमार रस, द्राक्षारिष्ट, कुमारी आसव आदि औषधियों का अग्निमांद्य में लक्षणानुसार आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श से सेवन करने पर अग्निमांद्य से छुटकारा मिलता है।
आहार-विहार
अग्निमांद्य के निवारण के लिए आहार-विहार पर ध्यान देना आवश्यक होता है। आलस्य का त्याग करके सुबह-शाम किसी पार्क में जाकर भ्रमण करने से पाचन क्रिया सुदृढ़ होकर अग्निमांद्य से सुरक्षा होती है। अधिक मात्रा में स्नेहपान करने से अग्निमांद्य की विकृति होने पर कड़वे, कसैले, चरपरे व क्षारखाद्य पदार्थों का सेवन करने से अग्निमांद्य नष्ट होता है। गाय का दूध, दही, तक्र, अदरक, नीबू, सन्तरा, मौसंबी, जौ की रोटी, लौकी, परवल, बथुआ पालक की सब्जी तथा मूंग की दाल सेवन करने से लाभहोता है। अग्निमांद्य होने पर उड़द की दाल, चना, मटर समोसे, कचौरी और बेसन व मैदे से बने खाद्य-पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। फास्ट फूड, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ चाय, कॉफी भी हानि पहुंचाते हैं।

डॉ. बबीता केन
एम. डी. (आयुर्वेद) प्रभारी चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय,
लखनऊ (उ. प्र.)