पांचवी पातशाही श्री गुरु अरजनदेव महाराज ने अपने शिष्य माधवदासजी को गुरबाणी प्रचार हेतु कश्मीर भेजा जहां वे प्रतिदिन कथा कीर्तन संगत को सुनाया करते थे व संगत भी बड़े उत्साह के साथ दूर दराज से सुनने आती थी। गुरु महाराज के आशीर्वाद से संतजी ऐसा मधुर कथा कीर्तन करते थे कि संगत को समय का आभास ही नहीं होता था, मध्यरात्रि के दो बजने पर भी कोई प्रेमी कीर्तन के बीच से उठने का नाम ही नहीं लेता था।
एक बार शहर में चोरों ने एक घर लूट लिया। राजा ने जांच पडताल करवाई परंतु चोरों का कोई पता नहीं चला। राजा ने ढिंढोरा पिटवाया कि रात्रि बारह के बाद शहर में कोई आदमी न घूमे, आदेश का उल्लंघन करनेवाले को सूली पर लटका दिया जाएगा। ढिंढोरा सुनकर संगत ने संत माधवदास से विनंती की कि कथा कीर्तन समाप्ती साढ़े ग्यारह बजे तक करें ताकि बारह बजे से पहले हम अपने घर पहुंच जाए। उस दिन से नित्य साढ़े ग्यारह बजे तक कथा कीर्तन की समाप्ती हो जाती थी।
एक दिन कीर्तन में ऐसा प्रसंग चला कि समाप्ती में देरी हो गई, घबराकर संगत धीरे-धीरे उठकर घर जाने लगी। परंतु एक प्रेमी लड़का वहीं बैठा रहा, जिसका नियम था कि कीर्तन समाप्ती के बाद संतजी की आज्ञा लेकर ही वह घर जाता था। उस दिन वह लड़का एक बजे संत माधवदासजी से आज्ञा लेकर घर जा रहा था कि बाजार में सिपाहीयों ने उसे पकड़ लिया और सारी रात कैद में रखा व सबेरे राजा की कचहरी में पेश किया और कहा “हुजूर इस लड़के ने आपके हुक्म का उल्लंघन किया है, अतः यह दंड का पात्र है।” राजा ने उसके माता-पिता को बुलाकर कहा कि “तुम्हारे लड़के ने हुकुम का उल्लंघन किया है अतः यह सजा का पात्र है”। लड़के के माता-पिता ने कहा हुजूर “यह हमारा भी कहना नहीं मानता है। अतः आपको इसे जो सजा देनी है वह दे सकते हैं”।
राजा ने लड़के से पूछा “तुम्हारा कोई और भी है ?” लड़के ने कहा “जी हुजूर! मेरी पत्नी एवं बच्चे भी हैं।” पत्नी ने राजा से कहा कि हुजूर” हमारा इससे कोई संबंध नहीं है क्योंकि सारा दिन सतसंगति में बैठा रहता है, हमारे पास घर में भी नहीं आता। बच्चों ने भी विरोध में ही कहा कि “हमारा पिता बहुत कंजूस है, आज तक हमें कोई चीज लेकर नहीं दी।” यह सुनकर राजा ने कहा “तेरा और भी कोई है तो उसे बुला लो। लड़के ने कहा संत माधवदासजी मेरे सहायक हैं। राजा ने उन्हें बुलवाया और पूंछा यह लड़का आपका क्या लगता है ? संतजी ने कहा – “चाहे सत्संगी समझें, चाहे शिष्य समझें, चाहे पुत्र समझें, जो मरजी आए समझ लें।”
यह सुनकर राजा ने संत माधवदास से कहा इस लड़के ने हमारा हुक्म नही माना है इसलिए इसे सूली पर चढ़ाया जाएगा यदि आप इसकी कोई सहायता कर सकते हैं तो कर लें। माधवदास जी ने कहा मैं इसकी क्या सहायता करूंगा ? यह श्री गुरू अरजनदेवजी का शिष्य है वे स्वयं ही इसकी अवश्य सहायता करेंगे। गुरबाणी भी फरमाती है –
“सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल सेवक कउ गुर सदा दइआल ।।”
राजा ने जल्लादों को बुलाकर सूली पर चढ़ाने का हुकुम दिया और जल्लादों ने उस लड़के को सूकी लकड़ी की सूली पर चढ़ाया आश्चर्य वह सूली हरी-भरी हो गई। लड़के का बाल भी बांका नहीं हुआ। गुरबाणी भी फरमाती है –
“विच करता पुरखु खलोआ वाल न विंगा होआ।”
राजा इस कौतुक को देखकर बड़ा हैरान हुआ उसने विचार किया कि संत माधवदासजी और उसके गुरदेव गुरु अरजनदेव कोई शक्तिवान संत है कहीं मुझे श्राप न दे दे। राजा उसी वक्त संतजी के चरणों पर माथा टेका और कहा मुझे बख्श दो। संत ने कहा मैं क्या बख्शृंगा श्री गुरु अरजनदेव महाराज ने इसकी सहायता की है वे ही बख्शेंगे राजा ने हाथ जोड़कर कहा मुझे भी उनके दर्शन करवाओ। राजा के साथ उसका पूरा परिवार व शहर की सारी संगत माधवदासजी के साथ गुरुजी के दर्शन के लिए तैयार हो गई और अमृतसर पहुंचकर श्री गुरु अरजनदेवजी के दर्शन कर नमस्कार किया। अंतर्यामी सतगुरु ने माधवदासजी के प्रति प्रेम से दो पंक्तियां उच्चारी –
“मेरे माधउजी सतसंगति मिले सु तरिआ ।।
गुरपरसादि परमपद पाइआ सूके कासट हरिआ।।” (श्री गुरु ग्रंथ साहिब, पृ.सं. 495)
अर्थात हे माधवजी सतसंगति (कथा-कीर्तन) मिलने से यह जीव संसार सागर से पार हो जाता है और गुरु की कृपा से परमपदवी अर्थात मोक्ष को प्राप्त होता है व कठोर मन भी हराभरा हो जाता है। सत्संग में जाने से दुखों व पापों का नाश होकर मनोवांछित फलों की प्राप्ती होती है एवं गुरु की कृपा से सूकी कासट अर्थात सूखी लकड़ी भी हरी भरी हो गई।
ऐसे महान गुरु श्री गुरु अरजनदेव महाराज इस संसार में करीब 43 वर्ष रहे। उन्होंने मानवता के लिए ज्येष्ठ सुदी 4 संवत 1663 को अपनी शहीदी दी जिसकी समगण अंग्रेजी तारीख इस वर्ष 30 मई 2025 शुक्रवार के दिन है। ऐसे महान उपदेशक सिखों की रक्षा प्रतिपालना करने वाले सतिगुरु को उनकी शहीदी दिवस पर हमारा शत-शत नमन ।