आज कल जिस तरह का हमारा खानपान चल रहा है और उसके तौर-तरीके विकसित हुए हैं, उन्होंने ही विभिन्न विकारों को जन्म दिया है। आज लोगों के खाने-पीने में किसी प्रकार का संवम नहीं होने से मनुष्य द्वारा की जा रही ज्यादतियों का दुष्परिणाम उदर (पेट) को भुगतना पड़ता है।
लोगों को पेट की गड़बड़ी की शिकायत आमतौर पर रहती है। किसी को अपच, तो किसी को पेट का भारीपन परेशान करता है। कोई पेट में गुड़गुड़ाहट में पीड़ित है, तो कोई गैस रोग से परेशान, कुछ लोग अजीर्ण से पीड़ित है, तो कुछ कब्ज से परेशान रहते हैं। किसी के पेट में बाई और दर्द रहता है, तो किसी को दाहिनी ओर । किमी को खाने से पहले दर्द रहता है, तो किसी को खाने के बाद। किसी को भूख नहीं लगती है, तो किसी को अफरा की शिकायत रहती है। कहने का अभिप्राय यह है कि उदर विकारों का दायरा इतना व्यापक हो गया है कि अधिकांश लोगों को उसने अपने दायरे में ले लिया है। बहुत कम लोग हैं, जो किसी न किसी उदर विकार से पीड़ित नहीं हैं। जब हम इसका कारण खोजते हैं और इस रोग के विषय में गंभीरता से विचार करते हैं, तो पाते हैं कि पेट की गड़बड़ या पेट के विकार मात्र एक बीमारी नहीं है, उदर विकार या पेट की गड़बड़ी अनेक प्रकार की है। चूंकि आहार हमारे शरीर का पोषण ऊर्जा प्रदान व स्वास्थ्यवर्धन भी करता है। यह तब संभव जब हमारा डाइजेशन सम्यक हो।
आयुर्वेद शास्त्र में आहार संबंधी नियमों तथा अन्य कई महत्वपूर्ण बातों की चर्चा विस्तारपूर्वक की गई है। यदि उनका पालन और आचरण किया जाता है, तो कोई भी उदर विकार होने की संभावना निर्मूल हो जाती है।
अतः इस बार का विशेषांक Digestive Care Special को हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह अंक पाठकों के लिए उपयोगी व सार्थक साबित होगा।

डॉ. जी. एम. ममतानी
एम. डी. (आयुर्वेद पंचकर्म विक्षेषज्ञ)
238, गुरु हरिक्रिशन मार्ग, जरीपटका, नागपुर