
सेवा करत होइ निहकामी
तिस कउ होत परापति सुआमी
अक्सर यह देखा गया है कि बालक पर माता पिता के संस्कारों का गहरा असर पड़ता है।
श्री कलगीधर सत्संग मंडल के संस्थापक अधि. माधवदास ममतानी ने प्रभू भक्ति व प्रभू सिमरन का आरंभ सर्वप्रथम अपने घर से ही किया। वैसे भी कहा गया है कि “Charity begins at home” अधि, माधवदास ममतानी ने अपने बच्चों को प्रभू सिमरन से जोड़ने के लिए एक तरकीब निकाली अगर आपको खर्ची चाहिए तो पहिले श्री जपुजी साहिब का पाठ पढ़ो फिर खर्ची, जपुजी साहिब के पाठ के अलावा गुरबाणी शबद के लिए अलग खर्ची, सत्त्संग में समय से बैठने के लिए वकील साहिब अलग से खर्ची दिया करते थे, सेवा के लिए अलग से खर्ची। अब नित्य प्रतिदिन बच्चे श्री जपुजी साहिब का पाठ करने लगे, अब उनका यह नितनेम बन गया था जो आज बड़े होने पर भी जारी है।
भगत पूरनलाल ममतानी की माता जी का नाम लक्ष्मीदेवी माधवदास ममतानी था। उनका जन्म ६ दिसंबर १९६७ में हुआ। पूरनलाल ममतानी पढ़ाई के साथ साथ प्रभू सिमरन व दरबार की सेवा में सहभागिता लेने लगे, L.L.B. की परीक्षा पास करने के उपरांत वे इन्कम टैक्स के प्रैक्टिशनर बने। नोटरी वकील बने अच्छी प्रैक्टिस चलती थी। वकालत के साथ प्रभू सिमरन व दरबार की सेवा में तल्लीन रहते थे।
भगत पूरनलाल दरबार के सेवा कार्यों का सुंदर ढंग से संचालन करते थे। उनका रहन सहन बहुत ही सादगी वाला था। अक्सर वे शर्ट व पैजामा ही पहनते थे। सेवा कार्य करते समय वे कपड़ों का भी ध्यान नहीं रखते थे। सेवा का जुनून था उन्हे।
नागपुर जरीपटका में प्रभात वेले का आरंभ
पिताजी अधि. माधवदास ममतानी के बताये पदचिन्हों पर चलते हुए, नागपुर के पूज्य समाधा आश्रम के संत स्वामी शिवभजन महाराज से अनुमति लेकर प्रभात वेले का जरीपटका में नागपुर में आरंभ किया। उपरांत शिवाले के सामने ज्ञानचंदानी धर्मशाला में, फिर शिवाले में, तदोपरांत संत कंवरराम साहिब दरबार में प्रभात वेला अनवरत जारी है। आज भी सैकड़ों श्रद्धालु सुबह ४ बजे प्रभात वेले में गुरबाणी का जाप कर प्रभू सिमरन करते हैं।
जिए सिंध अखबार
सिंधी संस्कृति, सभ्यता व सिंधी भाषा के प्रचारार्थ अधि. पूरन ममतानी ने तुलसी सेतिया के साथ (मेरे साथ) “जिए सिंध” अखबार का प्रकाशन किया लेकिन उनकी रुचि प्रभु भक्ति व सेवा कार्यों में अधिक थी।
श्री हेमकुंट साहिब यात्रा
अधि. माधवदास माधवदास ममतानी की प्रेरणा से भगत पूरनलाल प्रति वर्ष श्री हेमकुंट साहिब की यात्रा व अमृतसर साहिब के अलावा अन्य ऐतिहासिक गुरुद्वारों तथा सनातन धर्म के तीर्थ स्थलों का भी दर्शन करवाते थे। इन यात्राओं में जाने वाले कुछ ऐसे लोगों को जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हो, उन्हें निशुल्क यात्रा में लेकर जाते थे। भगत पूरनलाल की धर्मपत्नी श्रीमती डॉ. इंदू ममतानी दयानंद आर्य कन्या महाविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रुप में कार्यरत हैं। उनके सुपुत्र चमन ममतानी इंजीनियर है. पोस्ट ग्रेजुएशन M. Tech. किया है। इतना ही नहीं अपने पिताजी की तरह गुरबाणी का गायन करते हैं, दरबार में वे जो सेवाएं संभालते थे, काफी सेवाएं चमन ममतानी सेवादारियों के साथ संभाल रहे हैं।
कुछ समय से भगत पूरनलाल ममतानी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था लेकिन उन्होंने इस विषम परिस्थति में प्रभू सिमरन व सेवा नहीं छोड़ी।
प्रभू परमात्मा की सृष्टि के नियमों का पालन सभी को करना पड़ता है। जिसने जन्म लिया है उसे यह शरीर रुपी चोला त्यागना पड़ता है।
६ दिसंबर १९६७ को जन्में भगत पूरनलाल ममतानी ने ७ सितंबर २०२४ को शरीर रुपी चोले को त्याग कर आत्मा को परमात्मा में विलीन कर दिया।


ऐसे प्रभू परमात्मा के प्यारे को हृदय की गहराइयों से नमन।
कबीर सेवा कउ दुइ भले
एकु संतु इकु रामु ।
रामु जु दाता मुकति को।
संतु जपावै नामु॥