श्री गुरु गोबिंदसिंघ द्वारा रचित श्री दसम ग्रंथ में 24 हिंदू अवतारों की स्तुति व उनके जीवन चरित्र की विस्तृत व्याख्या दी गई है जिसमें मुख्यतः श्री कृष्ण अवतार, श्री राम अवतार, धनवंतरी अवतार, मां भगवती (चंडी चरित्र), त्रिया चरित्र व अतिंम 24 वां कलकी अवतार इत्यादि अवतारों का वर्णन है। श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी ने दसम ग्रंथ में वर्णित रामकथा के सुनने व गाने को वर दिया है कि –
“जो इह कथा सुनै अरु गावै दूख पाप तिह निकटि न आवै।
बिसन भगत की ए फल होई, आधि व्याधि छवै सके न कोई।”
अर्थात जो इस रामकथा को सुनेगा व गाएगा उसके निकट दुख और पाप नहीं आएंगे व उसे वैष्णव भक्ति के फल की प्राप्ति होगी और उसके ऊपर किए हुए जंत्र मंत्रों के कुप्रभाव नष्ट हो जाएंगे।
गुरुजी ने तो रामकथा को जुगों जुग तक अटल रहने का वरदान दिया है-
“रामकथा जुग जुग अटल सभ कोई भाखत नेत ।। “
श्री दसम ग्रंथ में ही श्री गुरु गोविंदसिंघ जी ने स्वयं व गुरु नानक देवजी को श्री रामचंद्रजी का वंशज बताया है।
“गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा गुरु पारबती माई।” (श्री जपुजी साहिब)
गुरु नानक देव जी ने श्री जपुजी साहिब में गुरु को शिव जो (ईसरु), गोरखु (विष्णु अथवा गायों की रक्षा करनेवाले श्री कृष्ण जी), एवं पारबती माई (श्री शिव जी की धर्मपत्नी पारबती माई मां शक्ती, मां भवानी) देवी-देवताओं के समतुल्य बताया है। यह हमारे गुरुओं का अन्य देवी देवताओं के प्रति प्रेम, सम्मान आदरभाव दर्शाता है।
श्री गुरू ग्रंथ साहिब के अंग संख्या 988 पर भगत नामदेव जी ने परमात्मा के सरगुण अवतार श्रीकृष्ण की उपमा करते हुए फरमाया है कि-
“धनि धंनि ओ राम बेनु बाजै। मधुर मधुर धुनि अनहत गाजै।।” अर्थात धन्य है वह बांसुरी जिसे श्रीकृष्ण बजा रहे हैं व जिसमें से अति मधुर धुन निकल रही है।
जैसा कि पहले बताया गया है कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में 36 महापुरुषों, संत व भक्तों की वाणी जिसमें क्षत्रीय, ब्राहमण, जुलाहा, चमार, मुसलमान आदि विभिन्न सम्प्रदायों के संतो की वाणियां शामिल है। इसी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में विभिन्न अवतारों के नाम जैसे हरि, राम, कृष्ण, गोपाल, पारब्रम्ह, गोबिंद, नरसिंघ, गोवर्धनधारी, नाराइण, मधु सूदन, दामोदर, बावन (वामन अवतार) दाता, अल्लाह, बीठला इत्यादि इत्यादि 36 देव शक्तियों का उल्लेख है।
इस तरह गुरुनानक देव जी ने जिन देवी-देवताओं और भगतों को अपनी वाणी (श्री गुरु ग्रंथ साहिब) में रखा है तो गुरु नानक देव जी के आत्मिक स्वरुप श्री गुरु ग्रंथ साहिब के साथ उनकी मूर्तियां रखने व उन्हें आदर देने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी ने दसम ग्रंथ में चंडी चरित्र का भी वर्णन किया है, जिसे उन्होंने मां भगवती कहा है साथ ही मां भगवती की स्तुति को उन्होंने वर दिया है कि-
पढ़े मूड़ याको धनं धाम बाढे।।
सुनै सूम सोफी लरै जुद्ध गाढे।।
जगै रैणि जोगी जपै जाप याँ को ।।
धरै परम जोगं लहे सिद्ध ताको ।।4।।260।।
अर्थात-कोई मूर्ख भी इस स्तुति को पढ़ेगा तो वह धन और धान्य से भरपूर हो जाएगा और कोई कायर से कायर भी इस स्तुति को सुनेगा तो उसमें इतना साहस व बल आएगा कि वह कठिन से कठिन लड़ाई लड़ सकेगा। अतः श्री गुरु गोबिंद सिंग जी की आज्ञानुसार मां भगवती की स्तुति गाकर करना चाहिए।
इस तरह श्री गुरु ग्रंथ साहिब व श्री दसम ग्रंथ में कई देवी-देवताओं के नाम व अन्य धर्मावलंबियों की बाणीयों का उल्लेख यह दर्शाता है कि गुरुओं ने सभी धर्मावलंबी पंथों को मान-सम्मान देकर अकालपुरख परमात्मा से जोड़ा है। अतः गुरुओं की यह सीख आत्मसात कर हम गुरु नानक के हिंदू सिख सभी देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा अर्चना व स्तुति करते हैं जो हमारे गुरुओं की आज्ञानुसार ही है और गुरबाणी के प्रचार में सहायक होगा।