सहजधारी संगत की पूजा का आधार पुरातन हिन्दू सहजधारी मर्यादा, तखत सचखंड श्री हजूर साहिब, अबिचल नगर, नांदेड व तखत श्री हरिमंदिरजी, पटना साहिब है, जो कि पांच तख्तों में से ही हैं। इन तख्तों में आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब व श्री दसम ग्रंथ विराजमान हैं। श्री दसम ग्रंथ में मां भगवती की स्तुति, त्रिया चरित्र, 24 हिंदू अवतारों व अंत में 24 वां कलकी अवतार का वर्णन है।
श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब, श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी का जन्म स्थान है व श्री सचखंड नांदेड़ में गुरुजी ने सचखंड प्रस्थान के समय श्री गुरु ग्रंथ साहिब को गुरआई दी है। हमारा यह मानना है कि गुरु नानक देव जी के उपदेशों को सही ढंग से बताने वाले श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी के अलावा और कोई हो नहीं सकता। जो पूजा परिपाटी श्री सचखंड साहिब नांदेड़ में विद्यमान है जैसे शस्त्र पूजा, दिया जलाकर आरती करना, मूर्ति विराजमान करना इत्यादि-इत्यादि जो श्री गुरु गोबिंदसिंघ के समय से सीने बसीने आज तक चली आ रही है और सहजधारी संगत की पूजा पद्धति का आधार गुरुओं के यही पवित्र ऐतिहासिक स्थान हैं।
दीप जलाकर आरती करने के संबंध में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग क्र. 663 पर गुरु नानक देवजी का “धनासरी महला 1 आरती 1 ओंकार सतिगुर प्रसादि ।। ” गगन में थातु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥ शब्द है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुरु नानक देव जी ने आरती शब्द का जिक्र विशेष रुप से किया है। अर्थात इस शब्द को आरती वाली पद्धति के साथ गाना चाहिए और आरती की पद्धति कैसी हो यह श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग क्र. 695 पर भगत सैणु ने समझाया है “धूप दीप धृित साजि आरती ॥ बारने जाउ कमला पती ॥” अर्थात धूप, दीप, घी से सजाकर आरती करना चाहिए। अतः धूप दीप जलाकर आरती करना गुरु नानक देव जी व श्री गुरु ग्रंथ साहिब की आज्ञा के अनुसार ही है।
कई लोगों का इस संबंध में मत रहता है कि आरती निरगुण रुप से करनी चाहिए परंतु “गुरु ग्रंथ दी मानियो, प्रगट गुरां की देह” अर्थात हाजरा हजूर श्री गुरु ग्रंथ साहिब सरगुण रुप हैं अतः हम श्री गुरु ग्रंथ साहिब की आरती सरगुण रुप में धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर भी कर सकते हैं।
वर्तमान गुरु श्री गुरु ग्रंथ साहिब की इस आज्ञा के अनुसार श्री सचखंड साहिब, नांदेड़, श्री हरिमंदिर साहिब, पटना व अन्य कुछ गुरुद्वारों में आरती के समय दीये जलाए जाते हैं और वहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब के साथ गुरुमूर्तियां भी विराजमान हैं।
श्री गुरु तेगबहादर तिलक जनेऊराखा
इतिहास साक्षी है कि श्री गुरु तेगबहादर को औरंगजेब ने धर्म परिर्वतन के लिए दिल्ली के कैद खाने में रखा। गुरुजी ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली स्थित चांदनी चौक (वर्तमान नाम गुरुद्वारा शीशगंज) में अपने शीश का बलिदान किया परंतु धर्म परिर्वतन नहीं किया तथा हिंदू धर्म की तिलक जनेऊ इत्यादि पूजा परिपाटी को कायम रखा। इस प्रकार श्री गुरु तेगबहादर ने हिंदू धर्म के तिलक व जनेऊ की रक्षा की तथा खालसा पंथ के संस्थापक श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी ने भी इस बात का समर्थन करते हुए दसम ग्रंथ में गुरुजी को ‘तिलक जजूं राखा प्रभ ताका कीनो बदो कलू महि साका”
अर्थात श्री गुरु तेगबहादर ने तिलक एवं जनेऊ की रक्षा कर कलियुग में बड़ा परोपकार किया। हालांकि खालसा पंथ में तिलक व जनेऊ यह दोनों प्रथाएं नहीं है फिर भी श्री गुरु तेगबहादर व श्री गुरु गोविंदसिंग जी ने हिंदूओं की पूजा परिपाटी तिलक और जनेऊ की रक्षा कर हिंदुत्व के पूजा करने के ढंग को चलने दिया व जबरदस्ती धर्म परिवर्तन का विरोध कर अपने सर्वंश की कुरबानी उचित समझी। अतः गुरुओं की आज्ञा मानकर हम सभी को एक दूसरे की पूजा परिपाटी की पद्धति को सम्मान की दृष्टि से देखना व उसमें कदापि हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और हिंदू सहजधारी गुरसिक्खों की पूजा परीपाटी जैसे गुरुमूर्ति की पूजा और सिमरन के समय उसका ध्यान करना, धूप, दीप जलाकर आरती करना इत्यादि इत्यादि में जबरदस्ती हस्तक्षेप न किया जाए, यह हमारे गुरुओं की आज्ञानुसार ही होगा। जैसे श्री गुरु ग्रंथ साहिब के रागु गोंड के महला पंजवा में गुरु अरजन देव जी ने फरमाया है
“धूप दीप सेवा गोपाल ।
अनिक बार बंदन करतार ।।” (गुरु-ग्रंथ साहिब अंग 866)