जाहर पीर जगत गुर बाबा
पारब्रम्ह परमेश्वर एक है और उसकी पूजा पूरा विश्व भिन्न-भिन्न तरीकों से करता है। वह पारब्रम्ह परश्मेवर समय-समय पर अपने अवतार धारण कर दीन दुखियों व संतों पर आई हुई तकलीफों को दूर कर जनमानस में परमात्मा के प्रति विश्वास को दृढ़ कर अधर्म का नाश करता है, जैसे द्वापर में श्री कृष्णजी, बेता में श्री रामचंद्रजी, देवताओं की रक्षा के लिए मां भगवती का अवतार, श्री झूलेलालजी अवतार इत्यादि। इन सरगुण अवतारों के भिन्न-भिन्न प्रांतों में पूजा करने के अलग-अलग तरीके हैं लेकिन कोई किसी के पूजा के तरीके में हस्तक्षेप नहीं करता। इसी प्रकार कलियुग में गुरु नानक देव जी से श्री गुरु गोबिंद सिंग जी ने समाज में फैले अधर्म व घृणा भाव को दूर कर लोगों को समझाया कि-
“एकु पिता एकस के हम बारिक”
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 611-12)
इसी प्रकार भगत कबीरजी फरमाते-
“अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे
एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे।।1।।”
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1349)
अर्थात गुरबाणी के संदेश हमें यही समझाते हैं कि प्रभु परमात्मा एक है और हम सब उस परम पिता परमेश्वर की एक ही संतान हैं-
“मानस की जाति सबै एकै पहिचानबो”
(श्री गुरु गोबिंद सिंग जी दसम ग्रंथ)
इतिहास साक्षी है कि कलियुग में गुरु नानक देव जी ने संपूर्ण विश्व का भ्रमण कर विभिन्न धर्म-प्रांत-समुदाय के लोगों को परमात्मा के नाम से जोड़कर उद्धार किया है। इसलिए भाई गुरदास जी ने गुरु नानक देव जी को ‘कलितारणि गुरु नानक आइआ ।’ कहा है।
श्री गुरु रामदास साहिब जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहब के अंग 733 पर गुरु नानक देवजी को जगत गुर बताया है।
“जिसु घर विरती सोई जाणे जगत गुर नानक पूछि करहु बीचारा।।”
भाई गुरदास ने भी अपनी वार में लिखा है “जाहर पीर जगतु गुर बाबा” अर्थात गुरु नानक देव जी पूरे जगत के गुरु हैं याने कि सभी समुदायों के गुरु हैं।
श्री गुरु तेगबहादर जी ने कश्मीरी ब्राम्हणों व हिंदू धर्म के तिलक और जनेऊ की रक्षा व पूजा परिपाटी के लिए अपनी बलिदानी दी। उसी प्रकार श्री गुरु गोविंदसिंग जी ने अधर्म के नाश के लिए संवत 1756 बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की और तब से बाकी संगत सहजधारी संगत कहलाती है।
गुरु गोबिंदसिंघ ने फरमाया है कि-
“वै प्रकार मम सिख है सहजी, चरणी, खंड ।”
मेरे सिख तीन प्रकार के हैं- सहजधारी, चरणी (चरणामृत ग्रहण करने बाले) व खंडी (खंडे का अमृत ग्रहण करने वाले)। गुरु की सहजधारी संगत में सिंधी, उदासिन, रामानुज समाज, सेन समाज, निम्बार्क समाज, वाल्मिक समाज, खत्री, मुस्लिम व अन्य जातियों के लोग श्रद्धाभाव से गुरुनानक की पूजा अर्चना सहजधारी मर्यादा में अपने-अपने तरीकों से करते आ रहे हैं।
सर्वधर्म समभाव प्रेमी सिंधी समाज आज से नहीं बल्कि गुरु नानक देव जी के काल से ही गुरु नानक देव जी के साथ ही साथ अन्य देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करता आया है। पुरातन समय से ही सिंध प्रांत में गुरु ग्रंथ साहिब विभिन्न मंदिरों (टिकाणों) में हमारे विभिन्न देवी-देवताओं, संतों की मूर्तियों के साथ विराजमान रहते आए हैं। सिंधी समुदाय सहजधारी रुप से गुरु नानक देव व श्री गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु मानकर श्रद्धाभाव से हिन्दू धर्म की पूजा परिपाटी के अनुसार पूजा अर्चना करता आया है। इस तरह हम एक दूसरे के धर्म की पूजा परिपाटी इत्यादि में हस्तक्षेप न कर आपस में प्रेमभाव से रहते आए हैं, जैसे श्री गुरु अरजन देव जी ने मुसलमान धर्मावलंबी मीयां मीर को श्री हरिमंदिर साहिब की नींव रखने के लिए निमंत्रित किया और उन्हें अपने साथ बिठाया।
दसम गुरु नानक श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी ने अकाल उसतति 3/255 में सभी जातियों, देशों, प्रांतों के उद्धार के लिए कहते हैं-
“बंग के बंगाली, फिरहंग के फिरंगा वाली,
दिली के दिलवाली तेरी आगिआ मै चलत हैं।।
रोह के रुहेले माघ देस के मघेले बीर
बंगसी बुंदेले पाप पुंज को मलत हैं।।
गोखा गुन गावै चीन मचीन के सीस नयावै।
तिवती धिआइ दोख देह को दलत हैं।।
जिनै तोहि धिआइओ तिनै पूरन प्रताप पाइओ
सरव धन धाम फल फूल सों फलत हैं।”
अर्थात गुरुजी ने बंगाल के बंगाली, अंग्रेज, दिल्ली वाले, बुंदेली, गोरखा, चीनी, तिब्बती, फारसी इत्यादि को परमात्मा के नाम से जोड़कर सभी के पाप, दुख दर्द दूर कर धन-धान्य में फले फूले ऐसी कामना की हैं हालांकि इन सब की पूजा परीपाटी भिन्न-भिन्न थीं।
अतः जाहर पीर गुरु नानक देव जी, हिंदू धर्म के रक्षक श्री गुरु गोबिंदसिंघ व वर्तमान गुरु श्री गुरु ग्रंथ साहिब संपूर्ण विश्व के गुरु (जाहर पीर जगतु गुर बाबा) हैं और संपूर्ण विश्व के विभिन्न समाजों को उनकी यथायोग्य मानमर्यादा को ध्यान में रखकर अपने-अपने ढंग से पूजा अर्चना करने का स्वतंत्र पूर्णाधिकार है।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब सभी धर्मावलंबियों के पूजनीय
हमारे गुरुओं ने जात-पात के भेद को त्याग कर समाज के विभिन्न वर्गों को अपने साथ मिलाया और बैठाया है। श्री गुरु अरजन देव जी ने आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में अनेक हिंदू व मुसलमान संतों की बाणी दर्ज की है। जैसे सर्वश्री भगत कबीर, रविदास, नामदेव, मीरा जी, धन्ना, शेख फरीद, श्री सते बलवंते की वार, श्री मरदाना, सूरदास, त्रिलोचन, जैदेव, बेनी, भीखन, सदना, रामानंदजी (भगत कबीर के गुरु), पीपा सैण, परमानंद और श्री सुंदरजी इत्यादि इत्यादि। अतः इन सभी भक्तों के अनुयायी भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब की मान मर्यादा रखकर अपने-अपने ढंग से पूजा अर्चना कर सकते हैं क्योंकि उनके ईष्ट भक्तों के नाम गुरुओं ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मान के साथ दर्ज किए हैं।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में 36 महापुरुषों, संत व भक्तों की वाणी जिसमें क्षत्रीय, ब्राहमण, जुलाहा, चमार, मुसलमान आदि विभिन्न सम्प्रदायों के संतो की वाणियां शामिल है। इसी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में हिंदू अवतारों के नाम जैसे हरि, राम, कृष्ण, गोपाल, पारब्रम्ह, गोबिंद, नरसिंघ, गोवर्धनधारी, नाराइण, मधु सूदन, दामोदर, बावन (वामन अवतार) दाता, अल्लाह, बीठला इत्यादि इत्यादि 36 देव शक्तियों का उल्लेख है। अतः श्री गुरु ग्रंथ साहिब सभी धर्मावलंबियों के भी पूजनीय हैं।
अतः हमें व्यक्तिगत संकीर्णता को त्यागकर समाज के विभिन्न वर्गों को अपने साथ मिलाना चाहिए यही “जाहर पीर जगतु गुर बाबा” गुरु नानक देव जी एवं आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब के सही उपदेश हैं। यदि हम आज सभी गुरुजी के अनुसार धार्मिक वैमनस्य, जात-पात, ऊंच-नीच को त्यागकर आपस में प्रेम भाव से रहें तो निश्चित ही पूरे राष्ट्र में एकता का खुशहाली वाला माहौल आएगा।