अधि. माधवदासजी की रुचि प्रभू भक्ति में रहने के कारण उनमें भजन गाने की लालसा थी। ईश्वर की कृपा से आवाज भी सुरीला था। उस वक्त मंदिरों व धार्मिक आयोजनों में रामाणी म्युजिकल पार्टी को आमंत्रित किया जाता था। स्व. गंगाराम रामाणी व हरीचंद लालवानी इस पार्टी के प्रमुख थे। वे श्री माधवदास को भजन गाने हेतु साथ लेकर जाया करते थे। माधवदासजी जब दसवीं में पढ़ते थे तब स्व. श्री विशनाराम ठकुर ने इनकी मुलाकात संत बाबा हकीम थांवरदासजी से करवाई।
साध के संगि अगोचरु मिलै।
साध के संगि सदा परफुलै ।।
साध के संगि आवहि बसि पंचा।
साधसंगि अम्रित रसु भुंचा।। (गुरु ग्रंथ साहिब अंग 271)
जब उसकी कृपा हो जाती है तब ही किसी महान संत या साधू का संग प्राप्त होता है। संत का संग करने से परमात्मा की प्राप्ति होती है, और जब सच्चे संत या साधू के संग में आते हैं तो पांचों विकार वश में आ जाते हैं। जीव सदा प्रफुल्लित रहता है और अमृत रुपी नाम को प्राप्त कर लेता है।
हकीम थांवरदासजी के संपर्क में आने के उपरांत इनका रुझान गुरबाणी की ओर होने लगा। समय अपनी रफ्तार से चलता रहा। एक ओर पारिवरिक जवाबदारी तथा दूसरी ओर भक्ति, दोनों का ताल मेल बिठाना अतिआवश्यक था. इंकमटैक्स इंसपेक्टर की बंधन वाली ड्यूटी में बंधकर रहना कुछ कठिन साबित हो रहा था, इसलिए वह नौकरी छोड़ दी। उसके उपरांत वकील साहब ने भोपाल स्थित एडवोकेट पंजवानी के यहां स्टेनोटायपिस्ट का काम किया और वकालत सीखी। नागपुर स्थित सूत मार्केट में अपनी ऑफिस शुरू करने के पूर्व स्व. जयरामदास संगतानी के दुकान में ऑफीस खोली और वकालत का कार्य किया।