जीवन परिचय

तरूवर फल नहीं खात है, सरवर पीये न नीर ।
कहे रहीम पर काज हित संतनि धरियो सरीर ।।

जिस प्रकार वृक्ष अपना फल नहीं खाता है और नदी अपना जल नहीं पीती उसी प्रकार संत, महापुरुष व परमात्मा के प्यारे अपना जीवन अपने लिए नहीं जीते हैं। उनका जीवन तो मानव कल्याण व परोपकार के लिए ही होता है।

कुछ लोग संसार में केवल अपना जीवन जीने के लिए आते हैं। मैं, मेरा परिवार, मेरा बेटा, मेरी बेटी, मेरा धंधा बस इसी को अपना जीवन मान लेते हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो गृहस्थ जीवन को निभाते हुए प्रभु-परमात्मा की भक्ति के मार्ग पर चल पड़ते हैं। इस मार्ग को अपनाना सभी के बस की बात नहीं है। सुखमनी साहिब में फरमाया गया है कि-

आपि जपाए जपै सो नाउ ।
आपि गावाए सु हरि गुन गाउ ॥

प्रभु परमात्मा की कृपा होती है और अंतर्मन में जब प्रभु का वास हो जाता है तब परमात्मा स्वयं ही नाम सिमरन करवाता है। परमात्मा चाहे तब ही हम प्रभू की भक्ति कर सकते हैं। उसका गुणगान कर सकते हैं और जब आम इंसान प्रभु भक्ति के रंग में रंगता है तो कहीं न कहीं न चाहते हुए भी वैराग्य के मार्ग को इख्त्यिार करता जाता है। एक आम आदमी के लिए दो नावों पर पैर रखना बहुत कठिन कार्य हो जाता है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि सिंधी समाज में ज्यादातर वही लोग इस दिशा में आगे आते हैं जो कि संत घराने से हो या जिनकी दरबारें सिंध में या हिंद में हों, अथवा वे किसी दरबार के पीठाधीश हों या उस स्थान के सेवक हो।

लेकिन मैं उस आम आदमी की बात करने जा रहा हूं जिसका ना तो किसी दरबार से, ना तो संत घराने से वास्ता रहा। जी हां मैं बात कर रहा हूं पेशे से वकील अधि. माधवदासजी ममतानी जी की। यह वह नाम है जो गुरू नानक देव जी के परम भक्त के नाम से जाने जाते हैं। न केवल प्रभु भक्ति अपितु समाज सेवा की भावना व सामाजिक सुधारों के प्रति रुझान उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य रहा है। उन्होंने सिंधी समाज के हज़ारों ज़रूरतमंदो को मदद की व ग़रीब परिवार की बेटियों की शादी में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। सिंधी समाज के युवक धार्मिक व सामाजिक कार्यों में रुचि नहीं लेते है। इस बात की ओर अधि. माधवदास ममतानी का ध्यान गया और उन्होंने सिंधी समाज के युवकों को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से जोड़ा, इतना ही नहीं सिंधी समाज के युवकों को व्यसन मुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी हैं। उनकी प्रेरणा से हज़ारों युवक व्यसनमुक्त हो चुके हैं।

अधि. माधवदास ममतानी का रुझान बचपन से प्रभु भक्ति की ओर रहा। जब वे पाठशाला में पढ़ते थे तब वे वहां पर परमात्मा के भजन गाया करते थे। कक्षा की मेज़ को दोनों हाथों से बजाते थे। सिंध के प्रसिद्ध कवि “सामी” साहब अपनी वाणी में फरमाते हैं कि

विरले माउजणे को प्रेमी पुटु गर्भ मां,
सुपिरींन जी जहिंखे भगत वणे ।
जाण विञाए पहिंजी, सभजो दासु बणे ।।
लेखा कीन गणे, दिसे अलख अखियुनि सां।। (सामी)

प्रभु परमात्मा द्वारा बनाई गयी इस सृष्टि में आम आदमी जन्म लेता है और धीरे-धीरे संसार के बंधनों में बंधता जाता है। संसार में कुछ ऐसे महापुरुष भी जन्म लेते हैं जो सांसारिक बंधनों के दायरे में रहकर उस परमात्मा की स्वयं तो भक्ति करते ही हैं साथ साथ लाखों लोगों को भी प्रभु का नाम सिमरन करवाते हैं अर्थात् प्रभु भक्ति की अलख जगााकर आम आदमी को जगाते हैं। ऐसे महान पुरुषों में एक नाम बड़े श्रद्धाभाव से लिया जाता है। वह नाम अधि. माधवदास ममतानी का है जो श्री कलगीधर सत्संग मंडल के संयोजक हैं।

जननी जने तो भक्त जन, के दाता, के सूर।
नहीं तो जननी वांझ रहे, काहे गंवाए नूर।

‘प्रभू का सिमरन वह भी अनुशासन व श्रद्धा भाव से हो’

वकील साहिब की प्रेरणा से हर साल प्रभात फेरी का आयोजन होने लगा। श्रद्धालुओं की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी होने लगी। प्रातः काल में परमात्मा का सिमरन करना अपने आप में फलदायी है लेकिन यह तब फलदायी है जब अनुशासन व श्रद्धा भाव से हो।

प्रभ की उसतति करहु संत मीत ।
सावधान एकागर चीत ।। (अंग 294)

सुखमनी साहिब में भी फरमाया गया है कि प्रभु की स्तुति करें लेकिन सावधान होकर, मन लगाकर। श्री कलगीधर सत्संग मंडल के संयोजक अधिवक्ता माधवदासजी ममतानी प्रभातफेरी में शामिल हजारों श्रद्धालुओं से कहते हैं कि आप अगर स्कूल में जाते हैं, वहां के अनुशासन व नियमों का पालन करते हैं तो सिमरन के समय निर्धारित अनुशासन नियमों का भी पालन करना अनिवार्य है। और उनके कार्यक्रमों में अनुशासन देखने को मिलता भी है। सभी का माथा ढंका रहता है। हजारों श्रद्धालु एक लय, सुर व ताल में गाकर सिमरन करते हुए चलते हैं। आपस में बातचीत भी नहीं करते। रास्ते में श्रद्धालुओं द्वारा केवल पानी का वितरण किया जाता है।
अनुशासनबद्ध तरीके से निकलने वाली इस अनूठी प्रभात फेरी में अलग-अलग समाज के संत महापुरुष व देश की जानी-मानी हस्तियाँ शामिल होकर गुरु महाराज का आशीर्वाद पाते हैं।

‘स्वागत सत्कार की परंपरा नहीं’

जैसा कि उपर लिखा गया है कि दिग्गज हस्तियाँ श्री कलगीधर सत्संग मंडल द्वारा आयोजित गुरु नानक देव जयंती व श्री गुरु गोबिंद सिंग जयंती में पधारते हैं और वे गुरु महाराज की मूर्ति पर माल्यार्पण करते हैं। अधिवक्ता माधवदास ममतानी ने शुरु से एक परंपरा का निर्वाह कर रखा है कि गुरु महाराज के अलावा किसी का भी स्वागत सत्कार नहीं किया जाएगा. चूंकि हम सभी गुरु महाराज से आशीर्वाद लेने आते हैं।

‘अंम्रित वेला सचु
नाउ बडिआई वीचारु’

अध्यात्म की या भक्ति के संदर्भ में जब कभी भी हम पढ़ते हैं या सत्संग में सुनते हैं तो प्रभात के समय सिमरन करने का अलग ही महत्व बताया जाता है। गुरबाणी में भी अमृत वेला के समय उस परमपिता परमात्मा के सिमरन व गुणगान को अधिक महत्व दिया गया है। इसी बात को ध्यान में रखकर अधिवक्ता माधवदास ममतानी ने श्री कलगीधर सत्संग मंडल नागपुर से प्रातः 4 बजे प्रभातफेरी का आरंभ 1970 में आज से 55 वर्ष पूर्व आरंभ किया। प्रारंभिक दौर में कुछ लोग ही जुड़ पाए, था भी कठिन कार्य चूंकि अक्टूबर व नवम्बर का कड़ाके की ठंड बाला महीना और वह भी सुबह 4 बजे, वह भी सत्संग कीर्तन के लिए, लेकिन जब वकील साहब जैसा व्यक्ति मन में ठान लेता है तो कठिन लगने वाला कार्य भी परमात्मा के आशीर्वाद से सहजता से होने लगता है।

और हुआ भी ऐसा ही। अधिवक्ता माधवदासजी ममतानी ने उस समय संकल्प लेकर रखा था कि आम नागरिकों को प्रातः काल में जगाकर भक्ति से जोड़ना है। सेवाधारी भी जुड़ते गए। उस समय मोबाइल नहीं थे कि घंटी बजा दी कि लोग उठ गए, उस समय पहले वकील साहब लोगों से स्वयं मिलते थे, उन्हें प्रभातफेरी के लिए प्रेरित करते थे। फिर वे एरिया वाइज सेवाधारियों को उनके नाम लिखाते थे और सेवाधारी प्रातः तीन बजे उठकर उनको जगाते थे।

‘मैं तो अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया’

कुछ ही समय में गुरु नानक देव जी के आशीर्वाद से वकील साहब के मार्गदर्शन में निकलने वाली प्रभातफेरी में हजारों श्रद्धालुगण जुड़ चुके थे। प्रभातफेरी का आरंभ श्री जपुजी साहिब के पाठ से होता है, वाह गुरु नानक देव, वाह गुरु अंगद देव, वाह गुरु अमरदास, वाह गुरु रामदास, वाह गुरु अरजन देव, वाह गुरु हरगोबिंद साहिब, वाह गुरु हरिराय साहिब, वाह गुरु हरिक्रिशनदेव, बाह गुरु तेग बहादर, वाह गुरु गोबिंद सिंग, वाह गुरु ग्रंथ साहिब का गुणगान किया जाता है। उपरांत गुरवाणी के कीर्तन से प्रभु परमात्मा की भक्ति से श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ गाते हुए चलते हैं। किसी ने खूब कहा है-

‘कर्म करो तो फल मिलता है’
‘आज नहीं तो कल मिलता है’
‘जितना गहरा अधिक हो कुआं’
‘उतना मीठा जल मिलता है’

यह चंद पंक्तियां अधिवक्ता माधवदास ममतानी के संकल्प और किए गए प्रयासों को चरितार्थ करती हैं। वकील साहिब नागपुर वाले के नाम से प्रसिद्ध अधिवक्ता माधवदास ममतानी का जन्म सिंध पाकिस्तान के भिरिया साहिती गांव नवाबशाह जिले में 12 फरवरी 1941 को हुआ। उनकी माताजी का नाम देवकीदेवी व पिताजी का नाम श्री बंसीराम था। माता देवकी व बंसीरामजी के विवाह को किसी संत के आशीर्वाद में फल देने के 8 वर्षों के उपरांत पुत्र रत्न माधवदास की प्राप्ति हुई.

एक पुत्र गुणवान सुभ, सौ सुत अवगुण अकाम ।
एक सस ही तम को हरे, तारे कोटि कि काम ।।

किसी ने कहा है कि एक गुणवान पुत्र, अवगुण युक्त सौ पुत्रों से बेहतर है। एक चंद्रमा काफी है अंधकार मिटाने के लिए, जबकि करोड़ों तारे भी नाकाम हो जाते हैं। कौन जानता था कि पेशे से वकील उस परमात्मा की वकालत करेगा और हजारों लाखों लोगों को परमात्मा की भक्ति से जोड़ेगा और बतायेगा कि इस संसार की अदालत के ऊपर भी एक अदालत है जो तेरे कर्मों के हिसाब से ही तेरा फैसला करेगी। गुरबाणी भी फरमाती है कि

हुण वतै हरि नाम न बीजिओ अगै भुखा किआ खाए ।।

सिंध पाकिस्तान में अधिवक्ता माधवदास के पिताजी श्री बंसीलाल पेशे से ठेकेदार थे लेकिन आय ज़्यादा नहीं थी। माता देवकी कपड़ों की सिलाई किया करती थीं। अखंड भारत का जब विभाजन हुआ, 15 अगस्त 1947 को वकील साहिब अपने माता पिता व परिजनों के साथ नाशिक के पास देवलाली कैम्प में रहे। 2-3 साल के उपरांत नागपुर आए। पहले नागपुर के तुलसीबाग में आए। वहां से भालदारपुरा में आकर रहने लगे। सिंधी हिंदी विद्या समिति द्वारा लेंडी तलाव स्थित सिंधी हिंदी स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। बचपन से ही इनका रुझान प्रभु भक्ति की ओर रहा, प्रतिदिन हनुमानजी की स्तुति करते और हनुमानजी की मूर्ति के समक्ष अखण्ड ज्योति जलाते थे।

भालदारपुरा स्थित दरबार में अक्सर जाया करते थे और वहां भजन आदि गाया करते थे। स्कूल में खाली समय में भजन गाते और टेबल को दोनों हाथों से बजाया करते थे। स्कूल में कई बार भजन गाने हेतु उन्हें मंच पर बुलाते और इनाम भी दिया जाता था। तुलसीबाग में खुद का दुकान था। दसवीं कक्षा उतीर्ण करने के उपरांत जरीपटका निवासी श्री किशनचंद सोभोमल खिलनानी के साथ सिरपुर (कागज नगर) गये जहाँ पर होटल में मैनेजर की नौकरी की। वहां पर करीब 5-6 महिने रहे। उल्लेखनीय है कि अप्रैल 1957 में एस.एस.सी. उत्तीर्ण की तथा 1959 में एच.एस.एस.सी. उतीर्ण की।

“संघर्ष की राहों में कठिनाईयां तो आयेंगी,
जीवन का सच यही हमें बतलाएंगी ।
बढ़ाते रहना कदम सब कुछ सहते हुए,
एक दिन जिदगी खुशियों से सज जायेगी ।।

इसी लक्ष्य को लेकर माधवदासजी ने शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। 27 जुलाई 1961 को बिंजाणी सिटी कॉलेज महल नागपुर युनिर्वसिटी से B.A. Final उतीर्ण की। बी.ए. के बाद एल.एल.बी. की पढ़ाई शुरु की। पढ़ाई के चलते इन्होंने मेडीकल कॉलेज के Indian Council of Medical Research Department में L.D.C. (Lower Division Clerk) के रुप में नौकरी की। प्रमोशन होने पर स्टेनोटाईपिस्ट हुए। उस समय इनकी स्पीड (Shorthand में 100 w.p.m.) जून 1967 में नागपुर युनिवर्सिटी से L.L.B. की फाईनल परीक्षा उतीर्ण कर वकालत की डिग्री हसिल की।

इसके उपरांत Indian Council of Medical Research Departmentकी नौकरी छोड़कर इंन्कम टैक्स ऑफीस में स्टेनोटायपिस्ट बने। तत्पश्चात इंकमटैक्स इंस्पेक्टर के रुप में नियुक्ति हुई। तब वे जरीपटका स्थित खटवारी दरबार गली में माता शांतिबाई (भुगड़ीअ माउ) के निवास में किराए पर रहते थे। अधि. ममतानीजी का विवाह 2.5.1963 को बैरागढ़ भोपाल निवासी दयाली हरीसिंघानी (लक्ष्मीदेवी) के साथ हुआ। महान संत हिरदाराम साहिब ने उनका नाम “साहूकारी” रखा था। उल्लेखनीय है कि लक्ष्मीदेवी ममतानी सिंधी समाज के मूर्धन्य साहित्यकार स्व. कीमतराय हरीसिंघानी की बहन थीं।

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