भगत करे पाताल में, प्रगट होड़ आकास,
रजब तीनों लोक में, छिपे न हरि का दास ।
सिंध को संतों महापुरुषों व ऋऋषियों की जन्म स्थली कहा गया है।
सिंध के संतों ने मानव मात्र को प्रभु सिमरन, प्रभु भक्ति व अध्यात्म से जोड़कर मानव सेवा का मार्ग दर्शाया। सिंधी समाज के इष्टदेव झूलेलाल जी हैं लेकिन सिंधी समाज सभी देवी देवताओं की पूजा अर्चना करता है। गुरु नानक देव जी के प्रति अगाध श्रद्धा भाव होने के कारण सिंघ के कई मंदिर टिकाणों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब विराजमान थे, अब भी हैं।
संतों ने सिंध में तो गाँव गाँव जाकर प्रभु भक्ति की अलख जगाई। विभाजन के उपरांत विभाजित भारत देश के कई शहर, गाँव में मंदिर, गुरुद्वारे व सत्संग मंडल स्थापित कर प्रभु से यहां के नागरिकों को जोड़ा। इतना ही नहीं उन्हें मानव सेवा की ओर प्रेरित किया ।
संतों के बताये मार्ग का ही प्रतिफल है कि सिंधी समाज ने धंधे व्यापार के साथ साथ समाज सेवा में भी अपनी पहचान बनाई है।
हिमालयं समारभ्यम यावत् सरोवरम् ।
तं देव निर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।
हिमालय पर्वत से शुरू होकर भारतीय महासागर तक फैला ‘हिन्दुस्तान’ यही वह देश है, जहां ईश्वर समय समय पर जन्म लेते हैं और सामाजिक सभ्यता की स्थापना करते हैं। हिन्दुस्तान को ही भारत कहा गया है। भारत देश जगत गुरु रहा है। चूंकि भारत की ही सिंधू नदी के तट पर वेदों की रचना उस परम् पिता परमेश्वर की कृपा से ही ऋषि मुनियों ने की। इन वेदों के आधार से ही संसार को ज्ञान देने का कार्य ऋषियों मुनियों व साधू संतों के द्वारा किया गया। सिंधू सभ्यता व संस्कृति के द्वारा ही मानव जाति को जीवन जीने की कला का बोध हुआ। भारत ही ऐसा देश है जिसकी पावन पवित्र भूमि पर ऋषियों मुनियों व संतों ने जन्म लेकर संसार को प्रभु परमात्मा की भक्ति व सत्संग से जोड़ने का मार्ग प्रदर्शित किया।
गुरु महाराज की कृपा व पूजनीय वकील साहिब के आशीर्वाद से लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। मेरी कलम में वो ताकत नहीं है कि वंदनीय वकील साहिब के बारे में लिख सकूं। गुरु महाराज, मां शारदा व वकील साहिब मेरी कलम को आज्ञा दें कि मैं कुछ लिख सकूं यही करबद्ध प्रार्थना।
हे! सर्वव्यापी परमात्मा आपकी बनाई हुई प्रकृति में चंद्रमा आपकी कृपा से ही चमक रहा है, सूर्य की किरणों से यह जग जगमगा रहा है। अजीब तेरी लीला है कि बिना तेल व बिना बाती के यह तेरे बनाये गये चंद्रमा, सूर्य व तारे अविराम सब को रोशन कर रहे हैं. जल, थल व आकाश में हर जगह तू ही तू बसा हुआ है। हर प्राणी में तू ही तू समाया हुआ है। गुरवाणी भी फरमाती है कि-
जिहवा एक कवन गुन कहीऐ ।
बेसुमार बेअंत सुआमी तेरो
अंतु न किन ही लहीऐ ।। (अ.ग.674) रहाउ ॥
हे! परमपिता परमात्मा आपकी महिमा का गुणगान करना असंभव है, उसी प्रकार आपके भक्तों के बारे में बखान करना बहुत कठिन है। कारण,
साध की महिमा बेद न जानहि
जेता सुनहि तेता वखिआनहि
हे परमात्मा ! आपकी असीम कृपा व गुरु महाराज की आशीर्वाद से एक छोटासा प्रयास करने की प्रेरणा हुई है कि संतनुमा जीवन व्यतीत करने वाले लेकिन अपने नाम के आगे संत की उपाधि न लगानेवाले हजारों लोगों को प्रभू भक्ति से जोड़कर, नाम सिमरन कराकर परोपकार का पथ प्रदर्शन करने वाले श्री कलगीधर सत्संग मंडल के संस्थापक संयोजक अधि. माधवदास ममतानी (वकील साहिब) के जीवन के संदर्भ में संकलित अनुभवों को एक पुस्तक में सम्मिलित करूं।
संत – संत की परिभाषा या अर्थ हम सामान्यतः यह मानते हैं कि जो सब मोह माया त्यागकर लोगों को ज्ञान बांटते रहे, जनमानस को प्रभु भक्ति से जोड़े और अपना संपूर्ण जीवन परोपकार व भलाई में लगा दे।
तितिक्षवः करुणिकाः सहृद सर्वदेहिनाम ।
अजतशत्रवः साधवः साधूभूषणः ।।
अर्थात संत वह है जो तितिक्षु हो, सहनशील हो, मान सम्मान अपमान में तुल्य हो। किसी ने माला पहनाई तो खुश ना हो. और किसी ने अपमान भी कर लिया तो दुखी ना हो। किसी भी संत की परिभाषा बहुत ही कठिन है। संत शब्द का प्रयोग दो अर्थों में मिलता है।
1) सामान्य
2) रूढ़ अर्थात संकुचित
व्यापक परिपेक्ष्य में संत का तात्पर्य है पवित्रात्मा, परोपकारी, सदाचारी. त्यागी, ईश्वर भक्त व धार्मिक पुरुष। संत का अर्थ है जो जिस क्षेत्र में भी हो, प्रकृति के नियमों व सिद्धांतो का आदर करता हो। समाजसुधारक हो, समाज के हितार्थ भाव रखकर सबके भले की कामना रखकर परमात्मा की भक्ति करता हो।
संत होना एक स्वभाव है, संत किसी एक समाज का नहीं होता। संत मौलिक गुण है, वह सभी के लिए समभाव रखता है। वह भेद भाव से मुक्त रहता है। परमात्मा का एक प्यारा भक्त है जिसमें यह सब गुण समाये हुए हैं, पर वह स्वंय को कभी संत नहीं मानता। ना ही संतनुमा वेशभूषा पहनते हैं। वह तो हमेशा यही कहता है-
करण कारण प्रभु एकु है
दूसर नाही कोइ । (अ.ग. 276)
ऐसे महापुरूष का नाम है आदरणीय अधि. माधवदास ममतानी मैं भाग्यवान हूं कि ऐसे संत से मेरे व्यक्तिगत व पारिवारिक संबंध है। “संत का संग बडभागी पाइएै”
जैसा कि मैने ऊपर लिखा ही है कि मुझमें वह सामर्थ्य नहीं है कि मैं ऐसे महापुरुष के द्वारा आध्यात्मिक तथा सामाजिक सुधार के कार्यों पर तथा जीवन से जुड़े प्रसंगों को समावेश कर सकूं। जब मैंने इस पुस्तक के प्रकाशन के संदर्भ में अधि. माधवदासजी ममतानी से आज्ञा लेनी चाही तो उन्होने मुझे यह कहा कि, “मैं क्या हूं? कुछ भी नहीं। सब गुरु नानक देव करते हैं। सब उनकी कृपा से ही होता है। मेरे जीवन पर किताब मत छापो ।”
कुछ वक्त के लिए मेरा उत्साह व उमंग ठंडे पड़ गये लेकिन फिर प्रेरणा हुई और मेरे अंदर का पत्रकार जाग उठा। मैंने किताब लिखने का संकल्प ले लिया और लिखना आरंभ कर दिया, इसे मूर्त रुप देने में लग गया। अब यह किताब आपके हाथों में है।
इस पुस्तक में मैंने वकील साहिब के संदर्भ में उनके परिवार वालों से, बुजुर्गों से, सेवादारियों के अनुभवों व अपने अनुभवों को समाविष्ट करने का प्रयास किया है। निःसंदेह कुछ गलतियां हो गयी होंगी कृपया उन्हें नजरअंदाज कर क्षमा करें। अपनी राय प्रदान करअनुग्रहित करेंगे। मैं ऐसी महान शख्सियत के चरणों में सादर प्रणाम करता हूं। कुछ टूटे फूटे शब्दों को जोड़कर एक पुस्तक का रूप देकर पूरे श्रद्धाभाव से पूजनीय अधिवक्ता माधवदासजी ममतानी को सादर समर्पित करता हूं।
तुलसी अंगनामल सेतिया सदस्य
महाराष्ट्र राज्य सिंधी साहित्य अकादमी
मुंबई