श्री गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णित शब्दों का सिमरन करने से अनेक दुखों का निवारण होता है जैसा कि श्री गुरु अरजन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग सं. 218 पर गउड़ी म. 5 मांझ में फरमाया है “दुख भंजनु तेरा नामु जी”
श्री गुरु अरजन देव ने भी श्री सुखमनी साहिब में फरमाया है-
“सरब रोग का अउखदु नामु, कलिआण रुप मंगल गुण गाम”
अर्थात सभी रोगों की औषधि हरि परमात्मा के नाम का सिमरन करना
श्री गुरु ग्रंथ साहिब के पृष्ठ सं. 661-662 पर “जीउ तपतु है बारोबार” यह शब्द श्री गुरु नानक देवजी ने भोपाल शहर में एक कोढ़ी के समक्ष आचरण कर उसको आरोग्यता बख्शी। यह पवित्र स्थान श्री टेकड़ी साहब गुरुद्वारा, ईदगाह हिल्स के नाम से भोपाल में प्रसिद्ध है।
जब पूरे कलकत्ता शहर में पेट दर्द की बीमारी फैली तब श्री गुरु नानक देवजी ने “आतम महि रामु राम महि आतमु” (भैरउ असटपदीआ महला 1. घरु 2, श्री गुरु ग्रंथ साहिब अंग सं. 1153) शबद का उच्चारण कर नगरवासियों को आरोग्यता प्रदान की।
इस तरह गुरु नानक देवजी के काल से ही रोगों के निवारण हेतु गुरबाणी के शब्द (मंत्र) उच्चारण करने की प्रथा है। अतः दुखों के निवारण के लिए गुरबाणी के शब्द उच्चारण करना गुरुओं की आज्ञा के अनुकूल है।
श्री गुरु अरजन देव जी ने भी रोग निवारण के लिए गुरु को ही वैद्य कहा है-
“मेरा बैदु गुरु गोविंदा हरि हरि नामु,
अउखधु मुखि देवै काटे जम की फंधा” (सोरठि म. 5)
अर्थात मेरा गुरु ही मेरा वैद्य है जो हरि नाम की औषधि देकर मामूली बीमारी तो क्या मुझे जम के फंदे से भी बचाता है।
गुरु नानक देवजी ने श्री जपुजी साहिब में कहा है- “नानक भगता सदा विगासु, सुणिझै दूख पाप का नासु” अर्थात परमात्मा के नाम सुनने से भाग्य में लिखे हुए दुखों और पापों का नाश होता है। श्री गुरु अरजन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग संख्या 742 रागु सूही म. 5 में कहा है-
“अनिक वींग दास के परहरिआ ।।
करि किरपा प्रभि अपना करिआ।।
तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ।।
उरझि परिओ जालु जगु सुपना ।।1।। रहाउ ।।
परवत दोख महा विकराला ।।
खिन महि दूरि कीए दइआला ।।2।।”
अर्थात् दयालु परमात्मा के नाम ने परबत जैसे महा भारी दुख क्षण मात्र में दूर कर दिए। श्री गुरु अरजनदेव जी ने अनंद साहिब की बाणी को वर देते हुए फरमाया है-
“अनदु सुणहु वड़ भागीहो सगल मनोरथ पूरे।।
पारब्रहमु प्रभु पाइआ उतरे सगल विसूरे।।
दूख रोग संताप उतरे सुणी सची वाणी।।
संत साजन भए सरसे पूरे गुर ते जाणी।।”
अर्थात अनंद साहिब की बाणी के सुनने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं एवं इसके सुनने से सभी प्रकार के दुख, रोग व संताप उतर जाते हैं।
श्री गुरु अरजन देवजी ने श्री सुखमनी साहिब को वर दिया है कि “दूख रोग बिनसे भै भरम” अर्थात जो श्री सुखमनी साहिब का नित नेम से पाठ करेगा उसके दूख, रोग एवं भ्रम नष्ट हो जाएंगे।
इस तरह यदि हम श्री गुरु ग्रंथ साहिब की आज्ञा के अनुकूल किसी को अनंद साहिब की पौड़ी, श्री सुखमनी साहिब या गुरु ग्रंथ साहिब के कोई शब्द दुख निवारण के लिए देते हैं तो यह गुरबाणी व श्री गुरु ग्रंथ साहिब की आज्ञा व मर्यादानुसार ही है।
श्री चीपई साहिब के पाठ को श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी ने वर दिया है कि ‘सुनै गुंग जो याहि सु रसना पावई।। सुनै मूड़ चित लाइ चतुरता आवई।। दूख दरद भौ निकट न तिन नर के रहै।। हो जो याकी एक बार चौपई को कहै‘ अर्थात जो गूंगा भी इसे सुनेगा तो उसे जबान प्राप्त होगी अर्थात वह बोल सकेगा, जो मूर्ख भी चित लगाकर इसे सुनेगा उसे चतुरता आएगी। जो एक बार भी इस चौपाई को कहेगा उसके निकट दुख दर्द नहीं आएंगे और वह तातार देश के निवासियों के समान बलवान हो जाएगा। अतः श्री गुरु गोबिंदसिंग जी महाराज ने दुख दर्द दूर करने के लिए गुरबाणी के शब्दों (मंत्रों) का सिमरन/गायन करने की आज्ञा की है।
श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी ने अरदास में फरमाया है कि “तेग बहादर सिमरीजै, घरि नव निधि आवै धाइ ॥” अर्थात श्री गुरु तेग बहादर का सिमरन करने से घर में नवनिधियां आ जाएंगी। गुरुजी आगे फरमाते हैं -“स्री हरि क्रिशन धिआईपै, जिस दिठे सभु दुख जाइ ॥” अर्थात श्री गुरु हरिक्रिशन देवजी को देखकर ध्यान करने से भाग्य में लिखे हुए सभ दुख मिट जाएंगे अतः यदि भाग्य में लिखे हुए दुख मिटाने हैं तो श्री गुरु हरि क्रिशन देवजी का ध्यान करना चाहिए पर उन्हें देखना जरुरी है। यह दो तरीकों से हो सकता है या तो श्री गुरुजी को सावधान (प्रत्यक्ष) अपने सामने देखें या उसकी मूर्ति को देखें। श्री गुरुजी को प्रत्यक्ष देखने वाले विरले ही होंगे अतः उसका दूसरा विकल्प गुरु मूर्ति को देखना ही है। ऐसे में यदि हम किसी को श्री गुरु तेग बहादर व श्री गुरु हरि क्रिशन देवजी की मूर्ति देखकर उनका ध्यान करने के लिए कहते हैं तो यह श्री गुरु गोबिंदसिंग जी की आज्ञा के अनुकूल ही है।
श्री गुरु अरजन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णित शब्दों को मंत्र की संज्ञा दी है- गुर की मूरति मन महि धिआनु गुर के सबदि मंत्र मनु मान।।
अर्थात गुरुसिख को गुरु की मूर्ति का मन में धिआन कर गुरु के शब्दों को मंत्र मान कर जाप करना चाहिए। मंत्र चिकित्सा प्राचीन काल से चली आ रही है वेदों में भी इसका उल्लेख है और कहा भी है कि “कुछ दवा कुछ दुआ”। साधना या तपस्या हेतु मंत्रों का प्रयोग होता ही है परंतु दुखों व रोगों के निवारण हेतु भी मंत्र चिकित्सा प्रभावी चिकित्सा है। वैसे भी दुखों में प्रभु परमात्मा के नाम का सिमरन करने से फायदा होगा ही होगा न कि कोई नुकसान होगा।
यह प्रमाणित सत्य है कि मंत्रों में असीम और अपरिमित शक्ति विद्यमान होती है व उनमें एक प्रकार की आध्यात्मिक ऊर्जा का वास होता है। मंत्रों का महत्व वैज्ञानिक रुप से प्रमाणित है। मंत्रों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर यह तथ्य पाया गया है कि मंत्र प्रयोग से मस्तिष्क की चेतना शक्ति विकसित होती रहती है। मंत्र मन को प्रभावित करते हैं. उनमें इतनी अधिक ऊर्जा होती है कि ऊर्जा के कारण व्यक्ति के दिमाग व स्नायुओं पर प्रभाव पड़ता है। मंत्र की शक्ति का परिणाम उसके शब्दों, स्वरों, वर्ण, आवृत्ति, उच्चारण, ध्वनि की तीव्रता पर निर्भर करता है। मंत्रों के द्वारा भौतिक शक्तियां सरलता से प्रभावित होती हैं। इसलिए मंत्रों द्वारा अनेक रोगों की चिकित्सा भी की जा सकती है। वेद, पुराण, उपनिषद तथा वेदांग में मंत्रों की प्रचुरता दृष्टिगोचर होती है। मंत्रों के प्रभाव को हम संगीत के सुरों से विशेषतः मेघ, मल्हार तथा दीपक राग से समझ सकते हैं। ऐसी मान्यता है कि तानसेन जब राग मल्हार छेड़ते थे तो पानी बरसने लगता था और जब दीपक राग की तान छेड़ते थे तो दीपक जल उठते थे। वस्तुतः ऐसा सुरों की विशेष आवृत्ति के कारण ही संभव होता था। अतः मंत्रों द्वारा उत्पन्न स्वर, आवृत्ति व कंपन ही चमत्कारी प्रभाव दिखाती हैं और इसी से इच्छित फलों की प्राप्ति होती है। सच तो यह है कि मंत्रों की अनेक समस्याओं के निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
व्यवहारिकता में भी देखा गया है कि विशिष्ट आचरण का विशिष्ट प्रभाव पड़ता है. जैसे कोई रसमय कीर्तन-आयोजन होता रहे तो मन भी रसमय हो जाता है और बैठने का जी चाहता है। वहीं किसी आनंदमय वातावरण में सब लोग स्वादिष्ट खाना खाने की तैयारी कर रहे हों और उसी समय आयोजकों को बुरी खबर का संदेश मिला। संदेश में उच्चारण किए गए शब्दों ने उस आनंदमय वातावरण को दुखमय वातावरण में बदल दिया। अतः उच्चारण किए गए शब्द इस जीव पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव डालते हैं और उनके सुनने से यह जीव कभी सुखी व कभी दुखी हो जाता है। हमारे पौराणिक शास्त्र बतलाते हैं कि मंत्रोच्चार से असाध्य रोगों से पीड़ित रोगियों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है। इस तथ्य को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकारता है तथा दश-विदेश में कई विख्यात डॉक्टरों द्वारा इस संबंध में शोध कार्य जारी है। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि अपने मुख से किए गए हरी कीर्तन, संगीत श्रवण व गायन तथा मंत्रों के उच्चारण से शरीर के अवयवों पर निश्चित ही प्रभाव पड़ता है, फलस्वरूप रोगी की काया निरोगी व स्वस्थ हो जाती है। शोध अनुसार पाया गया है कि ‘ओम’ के उच्चारण से ब्लडप्रेशर संतुलित, मानसिक शांति इत्यादि मिलती है। अथर्ववेद व आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी कई रोगों के निवारण के लिए मंत्र चिकित्सा का उल्लेख है।
अतः गुरबाणी व उपरोक्त व्यवहारिक तथ्यों से स्पष्ट है कि दुखों के निवारण के लिए मंत्र चिकित्सा प्रभावी व प्रचलित है।