गुरपूरब मनाने का आधार श्री गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णित बारामाह हैं। गुरु नानक देवजी व श्री गुरु अरजनदेवजी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब में बारह माहा का वर्णन किया हैं जैसे चेतु, वैसाखु, जेठु, आसाडु, सार्वाण, भादउ, असुनि, कतकि, मंघर, पोखि, माधि, फलगुनि जो गुरु नानक देव जी व श्री गुरु अरजन देव जी ने लिखे हैं अतः हमारा यह परमकर्तव्य हो जाता है कि गुरुओं की आज्ञा के अनुसार हम श्री गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णित बारहा माहा की तिथियों को ही गुरुपूरब की आधार तिथि मानकर व उसकी समकक्ष अंग्रेजी तिथी को ही गुरुपूरब की तारीख मानें। गुरुपूरब के वेद व्यास भाई गुरदास जी ने भी अपनी वार में व गुरप्रताप सूरजग्रंथ के रचियेता कवि चूड़ामणि संतोष सिंघ जी ने भी हमारे गुरुओं के गुरपूरब बारामाह में वर्णित तिथियों के अनुसार दर्शाए हैं।
दसम गुरु नानक श्री गुरु गोबिंदसिंग जी ने चौपाई जो कि रहिरास साहिब में गाई जाती है में कहा है “चौपाई ॥ संबत सत्रह सहस भणिजै ॥ अरध सहस फुनि तीनि कहिजै ॥ भाद्रह सुदी असटमी रवि बारा । तीर सकुँद्रव ग्रंथ सुधारा ॥ ” में विशेष रुप से हिंदू तिथी “भाद्रह सुदी अष्टमी” का वर्णन किया है। हालांकि उस समय अंग्रेजी तारीखें थी फिर भी गुरुजी ने हिंदू तिथियों का वर्णन कर उन्हें मान्यता दी है। तखत सचखंड श्री हजूर साहिब एवं तखत श्री हरिमंदरजी (पटना) की श्री दुष्ट दमन जंत्री में भी गुरपूरब का आधार हिंदू तिथियां ही है व उसी की समकक्ष अंग्रेजी तारीखों पर गुरुपूरब मनाते हैं। अतः हम सहजधारी संगत भी गुरुओं की आज्ञा के अनुसार हिंदू तिथियों के समकक्ष अंग्रेजी तारीखों पर गुरुपूरब मनाते हैं जो कि गुरु नानक देव जी के समय से चला आ रहा है।