मूर्ति पूजा आदि काल से चली आ रही है। इस जीव को परमेश्वर से जोड़ने, लक्ष्य प्राप्ति व मनोकामना पूर्ति का एक अभिन्न माध्यम है। जैसे महाभारत (द्वापर युग) में एकलव्य ने श्री गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति का ध्यान कर तीरंदाजी में श्रेष्ठता प्राप्त की। इसी प्रकार रामायण (त्रेता युग) में जब श्री रामचंद्र ने सीता का त्याग किया था तब यज्ञ के समय माता सीता की स्वर्ण मूर्ति बनाकर श्री रामचंद्र के साथ रखकर यज्ञ पूरा किया गया। इस तरह अनेक ऐसे ऐतिहासिक दृष्टांत मिलते हैं जिसमें मूर्ति को ही उनका साक्षात प्रतिबिंब मान कर लक्ष्य प्राप्ति व मनोकामना पूर्ति हेतु लाभ उठाया गया है।
मूर्ति पूजा का वर्णन कलियुग में श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी है। गुरुओं ने मूर्ति का ध्यान कर प्रभु सिमरन करने की आज्ञा की है क्योंकि साधना पूरी होने पर परमेश्वर का सरगुण रुप उसी मूर्ति से प्रगट होता है। श्री गुरु अरजन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 864 राग गोंड महला 5 में आज्ञा की है-
गुर की मूरति मन महि धिआनु गुर के सबदि मंत्रु मनु मान।।
हमारा मन सिर्फ सिमरन में ही जुड़े इस हेतु गुरु के शब्दों को मंत्र मानकर गुरुमूर्ति का ध्यान करना चाहिए। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि कई लोग गुरुजी की मूर्ति को श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्शन करने के लिए कहते हैं परंतु उक्त शब्द में गुरुजी ने स्पष्ट रुप से शब्द और मूरत को अलग-अलग कहा है।
मूर्ति में से परमेश्वर का सरगुण रुप प्रगट होने संबंधी दृष्टांत श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग क्र. 1163 पर राग भैरव में भगत नामदेव जी फरमाते है – “दूधु कटोरै गडवै पानी”। एक बार भगत नामदेव जी के नाना बाहर जाते वक्त उन्हें ठाकुर जी को दूध का भोग लगाने को कह गए। (हिंदू धर्म में ठाकुर जी की मूर्ति को भोग लगाने की पुरातन मर्यादा है और जो अब तक चली आ रही है) सरल स्वभाव के बालक नामदेव प्रत्यक्ष रुप से ठाकुर जी को दूध पिलाने लगे। ठाकुरजी की मूर्ति के दूध नहीं पीने पर भगत नामदेव जी कहने लगे-
एकु भगतु मेरे हिरदे बसै, नामे देखि नराइनु हसै, (श्री गुरु ग्रंथ साहिब अंग 1163)
अर्थात नामदेव जी ठाकुरजी की मूर्ति से कह रहे हैं कि मेरे हृदय में तो आपकी भक्ति बस रही है। फिर आप दूध क्यों नहीं पीते। नामदेव जी की अगम्य भक्ती देखकर नारायण जी प्रसन्न होकर हंस पड़े और कहते हैं कि कभी पत्थर ने भी दूध पीया है? भगत श्री नामदेव जी कहते हैं यदि पत्थर दूध नहीं पीते तो अभी तक क्या कोई पत्थर बोला भी है, हंसा भी है? नामदेव जी के भोलेपन पर प्रसन्न हो गए ठाकुर जी और जब वे सारा दूध पीने लगे तो नामदेवजी ने विनम्र होकर ठाकुर जी की बांह पकड़ी और प्रार्थना की कि थोड़ा सीत प्रसाद मुझे भी देने की कृपा करें क्योंकि मेरे नानाजी आपका सीत प्रसाद घर में वर्ताते (बांटते) हैं। जो प्रार्थना भगवान ने स्वीकार की। इस प्रकार भगत नामदेव जी ने ठाकुर जी की मूर्ति में ध्यान लगाकर साक्षात परमात्मा के दर्शन किए-
दूधु पीआइ भगतु घरि गइआ, नामे हरि का दरसनु भइआ ।। (श्री गुरु ग्रंथ साहिब अंग क्र. 1163-64)
अतः श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बाणी के अनुसार मूर्ति पूजा से मनोकामना पूर्ण होकर साक्षात परमात्मा के दर्शन होते हैं।
(उपरोक्त प्रसंग का उल्लेख सिख पंथ के वेद व्यास भाई गुरदास जी ने भी अपनी वार दसवीं पद ग्यारवां में किया है)
भगत धंने को पत्थर में से परमात्मा के दर्शन-
श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 488 पर श्री गुरु अरजन देव जी ने एक अन्य प्रसंग का वर्णन इस प्रकार किया है कि धंने भगत को पत्थर में से प्रत्यक्ष परमात्मा के दर्शन हुए हैं “इह बिधि सुनि के जाटरो उठि भगती लागा ॥ मिले प्रतखि गुसाईआ धंना बडभागा ॥ ” भगत घंने को पत्थर में से परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन किस प्रकार हुए इसका विस्तृत वर्णन गुरु घर के वेद व्यास भाई गुरदास जी ने भी अपनी वार 10 पउड़ी 13 में प्रसंग इस प्रकार दर्ज किया है:
“ब्राह्मण पूजें देवते धंना गऊ चरावण आवै ॥ धंने डिठा चलित एह पुछै ब्राह्मण आख सुणावै ॥ ठाकुर दी सेवा करै जो इछे सोई फल पावै ।। धंना करदा जोदड़ी मैं भि देह इक जे तुधु भावै ॥ पँथर इक पलेट कर दे धंने नो गैल छदावै ॥ ठाकुर नों नहावालके छाहि रोटी ले भोग चड़हायै ।। हथ जोड़ मिंनत करे पैरों पे पै बहुत मनावै । हउं भी मुंह न जुठालसां तूं रुठा मैं किहु न सुखावै ॥ गोसाई परतेंख होइ रोटी खाहि छाहि मुहि लाये ॥ भोला भाउ गोबिंद मिलावै ॥ “
अर्थात एक बार भगत धने ने गाय चराते समय ब्राम्हण को देवता (ठाकुर) की पूजा करते हुए देखा तब उनसे पूछा कि आप यह क्या कर रहे हैं? इस पर ब्राम्हण ने कहा कि ठाकुर की सेवा करने से सभी मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। यह सुनकर भगत धंने ने बिनंती की कि कृपया मुझे यह ठाकुर की मूर्ति दें जिससे मेरा भी भला हो। भगत धंने के जिद करने पर ब्राम्हण ने अपना पिंड छुड़ाने के लिए एक पत्थर कपड़े में लपेट कर भगत धंने को दे दिया। भोले भाव वाले भगत धंने ने उस पत्थर को नहला-धुलाकर भोग लगाने हेतु भोजन लाया। लेकिन पत्थर भोजन कैसे खाए ? भगत धंने को लगा कि ठाकुर जी रुठ गए हैं इसलिए भोजन का भोग नहीं लगा रहे हैं। इस पर भगत धंना बार-बार हाथ जोड़, पैर पड़कर बिनंती करने लगा, अंत में हार कर कहने लगा कि ठाकुर जी यदि आप मुझसे रुठ गए हैं तो मैं भी भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। भगत धंने के इस भोलेपन पर प्रसन्न होकर परमात्मा ने उस पत्थर में से प्रत्यक्ष प्रगट होकर भोजन का भोग लगाया। इस प्रकार भगत धने ने भावना रखकर पत्थर से परमात्मा के दर्शन किए तो हम भी निश्चित ही भावना रखकर गुरमूर्ति की पूजा-अर्चना, ध्यान कर मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं।
श्री गुरु तेगबहादर द्वारा स्वयं की तस्वीर बनाकर बूढ़ी माता को पूजा करने हेतु भेंट देना
(भाषा विभाग पंजाब (चण्डीगढ़) श्री कवि चूड़ामणि संतोखसिंघ द्वारा रचित गुरप्रताप सूरज ग्रंथ में से पृष्ठ संख्या 468 से 470)
श्री गुरु तेगबहादर तीर्थ यात्रा के दौरान ढाका शहर पहुंचे जहां उनका प्रेमी सिख बलाकीदास मसंद रहता था। उसकी बूढ़ी मां को गुरु महाराज के दर्शन की बड़ी प्यास थी। प्रेम में भरकर उसने गुरु महाराज के लिए एक सेज बनवाई और वहां बिस्तर बिछाकर उस सेज की नित्य बड़ी प्रेम से सुबह-शाम पूजा करती थी। यही इच्छा थी कि गुरुजी इस सेज पर बैठें और मैं उनके चरणों की धूर मस्तक पर लगाऊं। उसकी सच्ची श्रद्धा जानकर अंतर्यामी गुरुजी उनके घर पहुंचकर उसका मनोरथ पूर्ण किया। अपने हाथों से बनाई पोषाक माता ने गुरुजी की भेंट की जो कि गुरुजी ने पहनी। भाई बलाकीदास ने पूरे शहर की संगत एकत्रित की और संगत गुरु महाराज के दर्शन करने आई व कीर्तन आरंभ हो गया। भाई बलाकीदास ने धूप, दीपक जलाकर गुरुजी की आरती की एंव फूलों का हार पहनाया। इस प्रेम को देखकर गुरु महाराज ने वचन फरमाया कि ढाका हमारी सिखी का कोठा (गढ़) है-
“किरपा धार ऐसे कहि वाका। इन सिक्खी को कोठा ढाका।।
दीपक बारि आरती करी। धूप थुखाए अगारी धरी ।।
फूलनि माला पर पहराई। अधिक सुगंध ढिग छिरकाई।”
जब गुरु महाराज वहां से आगे की यात्रा पर जाने लगे तब माता गुरुजी के कदमों पर सिर धरकर बेनती करने लगी कि आप हमेशा यहां बस जाइए। जिससे मुझे आपके नित्याप्रती दर्शन हों। गुरुजी ने कहा तुम्हारी उम्र अभी पूरी होने वाली है. तुम हमारी तस्वीर पोशाक सहित बनाकर इस सेज पर रखना व प्रेम से उसकी पूजा करना और उसको मेरा दूसरा शरीर समझकर नित्याप्रति दर्शन करके फल पाना। इस तरह अंत में मुझमें मिल जाना।
लिहु लिखाइ मेरी तसबीर। है अबि जथा सचीर शरीर ॥38।।
तिस प्रयंक पर राखि टिकाइ। हुइ पुनीत पूजहु करि भाई ।
जथा करी अवि मेरी पूजा। तथा शरीर जानि मम दूजा ।।39॥
नित दरशन के फल को पाइ। अंत समैं मुझ सों मिलि जाई ।
माता ने शीघ्र चित्रकार को बुलाया और चित्रकार ने गुरुजी को नमस्कार कर बड़े ध्यान से गुरुजी की तस्वीर बनाना शुरु किया पर वह गुरुजी के सुंदर मुख व नेत्रों का स्वरुप नहीं निकाल सका। जिसे गतदायक सतिगुरु ने उससे कलम लेकर अपने हाथों से अपने मुख का चित्र निकाला और वह तस्वीर तैयार कर बूढ़ी माता को दी। माता तस्वीर लेकर आनंद से देखने लगी। माता ने देखा तस्वीर में दोनों आखों की पलकें बंद थी फिर देखते ही देखते दोनों पलकें खुल गई। माता विचारने लगी कि गुरु की मूरत में शक्ती है और दिड़ भरोसा कर उस सुंदर गुर तस्वीर को सेज पर रखा व दर्शन कर आनंद प्राप्त करती रही।
इस तरह गुरु की इस साखी से यह सिद्ध होता है कि गुरुजी आरती व मूर्ति पूजा के पक्ष में हैं।
अतः उपरोक्त वर्णित साखियों (भगत नामदेव, भगत धना व बूढ़ी माता) के अनुसार भावना से मूर्ति पूजा कर मनोकामना पूर्ण होकर साक्षात परमात्मा के दर्शन होते हैं।
कई संप्रदाय व गुरु के कई सिख मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते हैं, हमारा उद्देश्य किसी को गलत साबित करना कदापि नहीं है सभी अपनी जगह सही हैं परंतु जो भावना से गुर मूर्ति पूजा करते हैं ये भी उपरोक्त साखियों के आधार पर गलत नहीं हैं।
गुरमूर्ति के बारे में आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब व श्री दसम ग्रंथ में वर्णित बाणीयां
1) सलोक महला 4 (श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 303)
जो चितु लाइ पूजे गुर मूरति सो मन इछे फल पावै।
चौथे गुरु नानक श्री गुरु रामदास जी ने फरमाया है कि जो जीव मन लगाकर गुर मूरति की पूजा करते हैं वो मनोवांछित फल पाते हैं।
2) गोंड महला 5 वां (अंग 864 श्री गुरु ग्रंथ साहिब)
गुर की मूरति मन महि धिआनु गुर के सबदि मंत्र मनु मान।।
अर्थात गुरु अरजन देव जी हमें सिमरन करने की पद्धति समझा रहे हैं कि अक्सर सिमरन करते वक्त हमारा मन इधर-उधर अन्य बातों में भटकते रहता है। हमारा मन उस समय सिर्फ सिमरन में ही जुड़े इस हेतु गुरुदेव हमें समझाते हैं कि हे गुरुसिखा सिमरन करते वक्त गुरु के शब्दों को मंत्र मान और गुरुमूर्ति का ध्यान कर। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि शब्द और मूरत अलग-अलग कहे गए हैं।
3) मलार म. 5 (अंग 1268 श्री गुरु ग्रंथ साहिब)
प्रीतम साचा नामु धिआइ ॥
दूख दरद बिनसे भव सागरु गुर की मूरति रिदै बसाइ ।।।। रहाउ ।।
अर्थात गुरुजी की मूरति को हृदय में बसा कर नाम जपने से दूख दर्द ना होते हैं।
4) सांरग महला 5 चउपदे घरु । ओंकार सतिगुर प्रसादि (श्री गुरु ग्रंथ साहिब साहिब क्र. 1202)
सतिगुर मूरति कउ बलि जाउ ।।
अर्थात श्री गुरु अरजनदेवजी आज्ञा करते हैं कि गुरसिख को गुरमूरति पर बलिहार जाना चाहिए।
अंतरि पिआस चात्रिक जिउ जल की ॥
सफल दरसनु कदि पाँउ ।।1।। रहाउ ।।
अर्थात जिस तरह चात्रिक पक्षी को स्वाति नक्षत्र की पहली बूंद की प्यास रहती है, ठीक उसी तरह गुरसिख को गुरमूरत देखने से सफल दरसन पाने की प्यास होती है।
5) धनासरी महला 3 (श्री गुरु ग्रंथ साहिब अंग 661)
नदरि करे ता सिमरिआ जाइ ॥ आतमा द्रवे रहे लिव लाइ ।।
सतिगुर की मूरति हिरदै वसाऐ। जो इछे सोई फलु पाए।।
अर्थात सतिगुरुओं की मूर्ति हृदय में वसाने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
6) दसम ग्रंथ अरदास (दसम ग्रंथ 119)
1 ओंकार वाहिगुरु जी की फते ।।
स्री हरि क्रिशन धिआईझै जिस डिठे सभि दुखि जाइ।।
श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी द्वारा वर्णित दसम ग्रंथ में लिखित अरदास में श्री गुरु जी की आज्ञा है कि “श्री हरि क्रिशन धिआईओ जिसु डिठे सभि दुखि जाइ ॥” अर्थात श्री गुरु हरि क्रिशन जी को देखकर ध्यान करने से भाग्य में लिखे हुए सभ दुख मिट जाएंगे। अतः यदि भाग्य में लिखे हुए दुख मिटाने हैं तो श्री गुरु हरि क्रिशन जी को देखकर ध्यान करना चाहिए। यह दो तरीकों से हो सकता है, या तो श्री गुरुजी को प्रत्यक्ष अपने सामने देखे या उनकी मूर्ति को देखे। श्री गुरुजी को प्रत्यक्ष देखने वाले विरले ही होंगे। अतः एव उसका दूसरा विकल्प गुरु मूर्ति को ही देखना है।
गुरमूरत की पूजा के बारे में भाई गुरदास के विचार
भाई गुरदास गुरुपंथ के वेद व्यास हैं। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के रचियेता श्री गुरु अरजन देव जी ने भाई गुरदास की वार को वर दिया है कि हमारी बाणी ‘ताला’ और आपकी वाणी उसकी ‘कुंजी’ है अर्थात जिस किसी को भी गुरबाणी समझनी है उसे भाई गुरदास की वार का अध्ययन करना अति आवश्यक है क्योंकि भाई गुरदास की वार गुरबाणी की कुंजी है।
7) भाई गुरदास की वार 3 री पउड़ी 10 (पृष्ठ 84)
गुर मूरत कर धिआन सदा हजूर है।
अर्थात गुर मूर्ति का ध्यान कर, वह सदा तुम्हारे साथ है।
8) भाई गुरदास की वार 40 वीं, पउड़ी 21 (पृष्ठ 677-678)
सौ विच वरते सिख संत इकोतर सौ सतिगुर अबिनासी ॥
बिन दरसन गुरु मूरतो भ्रमति फिरै लख जून चउरासी ।।
अर्थात गुरु मूर्ति के दर्शन के बिना व्यक्ति चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता रहता है।
9) भाई गुरदास की वार 40 वीं, पउड़ी 22 (पृष्ठ 678-679)
धिआन मूल मूरति गुरु पूज मूल गुरु चरण पुजाए।
अर्थात ध्यान का मूल गुरु स्वरुप (जो निर्गुण एवं सगुण दोनों है) और पूजा का मूल गुरु के चरण हैं।
इस प्रकार आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब, श्री दसम ग्रंथ व भाई गुरुदास की वाणियों से यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक गुरसिख को श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बाणी को गुरुजी की आज्ञा मानकर गुरमूरति का ध्यान एवं पूजा करनी चाहिए जिससे मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है-
जो चित लाइ पूजे गुर मूरति सो मन इछे फल पावै ॥ (श्री गुरु ग्रंथ साहिब अंग 303)