संत ईश्वर के सच्चे भक्त होते हैं। जिन्होंने संतों की शरण ली उनका ईश्वर के रंग में रंगना स्वाभाविक है। संत हमारा मार्गदर्शन करके हमारा व्यवहार और परमार्थ सुधारते हैं। संत संसार के सरताज होते हैं। वे अपने अलौकिक रहन सहन तथा सुंदर शिक्षाओं से संसार के मायाजाल में फंसे व्यक्तियों को परमात्मा से साक्षात्कार करवाते हैं। वे सबके लिए सुख की कामना करते हैं।
संत हृदय में बसत है, सबके सुख की चाह,
घट घट देखें अलख को, पूछें सब की राह।
विभाजन के समय सिंध छूटने के बाद सिंधी-हिन्दू भारत के कोने कोने में फैल गये। नये परिवेश से सामंजस्य स्थापित करने के लिये उन्हें बहुत मशक्कत करनी पड़ी। कई मुश्किलें उनके सामने आईं पर उन्होंने उनका डटकर मुकाबला किया। ज़मीन जायदाद, बंगले, व्यवसाय सब छोड़कर आने वाले समाज ने अपने साथ लाया संतों एवं सत्पुरूषों का आशीर्वाद । इनके आशीर्वाद ने ही सिंधी समाज को फर्श से अर्श पर पहुंचाया है। धर्म व मज़हब की सीमाओं से मुक्त ये महापुरूष सिंधी सभ्यता के प्रकाश स्तंभ हैं।
ऐसे ही महापुरूषों में परमात्मा के एक प्यारे भक्त हैं, देश के हृदय में बसे नागपुर शहर के संत आदरणीय अधि. माधवदास ममतानी जिन्होंने सिंध की पावन भूमि पर जन्म लिया। अखंड भारत का जब विभाजन हुआ तो वे छोटी सी उम्र में अपने माता पिता व परिजनों के साथ नाशिक के पास देवलाली कॅम्प में रहे। 2-3 साल के उपरांत उनका परिवार नागपुर आ बसा ।
गुरू नानक देव जी के परम भक्त अधि. माधवदास ममतानी (वकील साहिब) का रुझान बचपन से ही प्रभु भक्ति में लीन रहा। जब वे पाठशाला में पढ़ते थे उसी समय से ही वे भजन गाया करते थे। पेशे से वकील अधि. माधवदासजी को सब लोग प्यार से “वकील साहिब” कहकर पुकारते हैं।
भगत करे पाताल में प्रकट होइ आकाश ।।
रजब तीनों लोक में छिपे न हरि का दास ।।
वकील साहिब उन संतों में हैं जो आडंबर से ओतप्रोत इस दुनिया से दूर शांतिप्रिय माहौल में ईश्वर भक्ति में लीन रहते हैं। आज उनकी प्रसिद्धि पूरे देश में फैल चुकी है। संतों के सारे गुण उनके व्यक्तित्व में समाए हुए हैं, पर वह स्वयं को कभी संत नहीं मानते। ना ही संतनुमा वेशभूषा पहनते हैं। वे सिंधी समाज की महान विभूति हैं।
ऐसे महापुरुष के सेवाकार्यों को उनके जीवन चरित्र के माध्यम से पाठकों के समक्ष पहुंचाने का पुनीत कार्य कर रहे हैं सिंधी समाज के बेहतरीन उद्घोषक, पत्रकार, लेखक, आर्गनाइज़र, कलाकार और निर्देशक तुलसी अंगनोमल सेतिया। तुलसी जी सिंधी समाज की उन गिनी चुनी शख्सियतों में से एक हैं जिन्हें अपनी भाषा, अपनी सभ्यता तथा अपनी संस्कृति के लिए विशेष लगाव है। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न एक अच्छे समाज सेवक तुलसी जी ने जब से होश संभाला है समाज सेवा में उत्तरोतर प्रगति करते जा रहे हैं। एक योग्य और समर्पित कायकर्ता के रूप में उन्होंने सिंधी सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में एक विशेष मुकाम हासिल किया है। एंकर या मंच उद्घोषक के रूप में मैंने उन्हें सिंधी समाज एवं अन्य समाजों के कई धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक कार्यक्रमों में मंच संचालन करते हुए देखा है।
तुलसी जी बहुत अच्छे लेखक, पत्रकार एवं कवि भी हैं। उनके सामाजिक मुद्दों पर लिखे कई लेख और कविताएं विभिन्न पत्रिकाओं में शामिल हो चुके है। उन्होंने कई पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं जैसे कि “टोकरी टहकनजी” “वसणशाह जो दुलारो साईं सुखरामदास प्यारो” “सोच मटिण जी जरूरत”। सिंधी समाज की कई स्मरणिकाओं का संपादन भी किया है जिनमें साहित्यिक पत्रिका “सुरहाण सिंधुड़ीअ जी” प्रमुख है। नागपुर के वरिष्ठ कलाकार लक्ष्मण थावाणी और तुलसी जी ने मिलकर प्रमुख साहित्यकार स्व. जयकुमार मोतियानी के लिखे हुए बैले “संत कंवरराम” को पुस्तक के रूप में लाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।
तुलसी जी बहुत अच्छे आर्गनाइज़र भी हैं। नागपुर के सिंधी रंगमंच के कलाकारों के साथ मिलकर उन्होंने सन् 1996 में सिंधी रंगमंच के संवर्धन एवं उत्थान के लिए “सिंधुड़ी नाट्य संस्था” बरपा की। तत्पश्चात् युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से कुछ साथियों के साथ मिलकर “सिंधुड़ी यूथ विंग” का गठन किया ताकि हमारे समाज के नौजवान अपनी भाषा और अपनी संस्कृति की सुगंध का आनंद ले सकें। कुछ समय पश्चात् मातृशक्ति को भी जोड़कर “सिंधुड़ी सहेली मंच” का भी गठन किया। यह उनके कुशल नेतृत्व, अथक परिश्रम, लगन, दूरदर्शिता व उचित मार्गदर्शन का ही परिणाम है कि “सिंधुड़ी” नाम की तीनों अनुषंगी इकाइयां नागपुर के सांस्कृतिक क्षेत्र में बेहतरीन कार्य कर रही हैं। सिंधू देश को प्यार से “सिंधुड़ी” कहा जाता है।
नाट्य निर्देशक के रूप में तुलसी जी ने “सिंधुड़ीअ जो सरताज कंबर”, “जागंदी रहे ज्योत झूलण जी सदाईं”, “वतन लाइ जान घोरी” जैसे ऐतिहासिक, “तोभां तोभां भगवान बचाए” जैसे कामेडी तथा “असां वदनि जो कमु आहे सलाह दियणु” और “परवरिश” जैसे सामाजिक नाटकों का निर्देशन कर सिंधी समाज में एक मिसाल कायम की है। इन सभी नाटकों के नागपुर तथा अमरावती के साथ देश के कई शहरों में भी मंचन हो चुका है। तुलसी जी ने इन सभी नाटकों में विभिन्न भूमिकाएं भी अदा की हैं।
इनके निर्देशित किये हुए दो महानाटक, इष्टदेव झूलेलाल जी के जीवन पर आधारित “जागंदी रहे ज्योत झुलण जी सदाईं” तथा सिंधी समाज के सिरमौर भगत अमर शहीद भगत कंवरराम जे जीवन पर आधारित “सिंधुड़ीअ जो सरताज कंवर”, आडियो विजुअल फारमेट में गीत संगीत से भरपूर बैले याने नृत्य नाटिकाओं के रूप में बने हैं जो कुछ पर्दे पर तथा कुछ लाइव सीन दिखाकर पेश किये जाते हैं। इनमे नई तकनीक का भरपूर इस्तेमाल किया गया है।
सन् 2004 में तुलसी जी के संयोजन में साहित्य एवं कला को समर्पित पूरे देश की जानी मानी संस्था अखिल भारत सिंधी बोली ऐं साहित सभा ने “सिंधुड़ी नाट्य संस्था” के साथ मिलकर तीन दिन तक नागपुर में अखिल भारतीय नाट्य महोत्सव का आयोजन किया तथा सन् 2005 में समाज की युवा पीढ़ी में नृत्य प्रतिभा को निखारने की दिशा में प्रसिद्ध नृत्यांगना अनिला सुंदर द्वारा नृत्य वर्कशाप आयोजित किया। रंगमंच के क्षेत्र में उनकी सेवाओं को देखते हुए अखिल भारत सिंधी बोली ऐं साहित्य सभा ने उन्हें कार्यकारिणी में शामिल किया तथा सिंधियत के संवर्धन हेतु किए गए उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हे अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड से भी सम्मानित किया।
नागपुर की हर संस्था जैसे कि भारतीय सिंधू सभा, ज्येष्ठ मित्र मंडल, विदर्भ सिंधी विकास परिषद, सिंधी सोशल फोरम द्वारा उनकी समाज को समर्पित सेवाओं के लिए सत्कार किया जा चुका है। साहित्य एवं कला के क्षेत्र में उनके कार्यो को देखते हुए महाराष्ट्र राज्य सिंधी साहित्य अकादमी ने भी उन्हें अपना सदस्य मनोनित किया था। नाटक विषय पर उनकी लिखित पुस्तक “रंग रंगीलो रंगकर्मी” पर उन्हें महाराष्ट्र राज्य सिंधी साहित्य अकादमी ने साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया।
व्यवसाय के सिलसिले में तुलसी जी नागपुर छोड़कर अमरावती में जा बसे हैं। वहां जाने के पश्चात् भी वे अपनी भाषा को नहीं भूले। सिंधी समाज के बीच रहकर उन्होंने सिंधियत की मशाल जलाए रखी। तुलसी सेतिया भाग्यशाली है जो नागपुर में रहते हुए उन्हें वकील साहिब जैसी पुण्यात्मा का सानिध्य, प्यार और आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। बचपन से ही वे उनके प्रवचन सुनते आए हैं और उनकी दरबार में निस्वार्थ सेवा करते आए हैं।
“प्रभुभक्त व समाजसुधारक संतश्री माधवदास ममतानी (वकील साहिब)” नामक प्रस्तुत पुस्तक में तुलसी जी ने बड़े ही सुंदर ढंग से वकील साहिब के जीवन प्रसंगो को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में उन्होंने साफ सुथरी, सरल और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किया है। तुलसी जी की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता है सरलता। वे अपनी बात को सरलता एवं सुगमता से प्रस्तुत कर श्रोताओं और पाठकों का मन मोह लेते हैं।
तुलसी जी पर ईश्वर की कृपा बनी रहे, वे साहित्य के क्षेत्र में और आगे कदम बढ़ाएं। उनकी यह पुस्तक पाठकों की संख्या भी बढ़ाए। अनेकों शुभकामनाओं के साथ…
किशोर लालवाणी
पूर्व सदस्य, महाराष्ट्र राज्य सिंधी साहित्य अकादमी, मुंबई
पूर्व सदस्य, सिंधी भाषा सलाहकार समिती, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली